उर्दू शायरों ने अपनी रचनाओं में होली के रंग को मजहबी नहीं होने दिया. होली पर उर्दू में बहुत लिखा गया. लेकिन ये 5 शेर बेहद कीमती हैं.
क्यों मो पे रंग की मारी पिचकारी,
देखो कुंवरजी दूंगी मैं गारी.
-बहादुर शाह ज़फ़र
आओ साकी, शराब नोश करें,
शोर-सा है, जहां में गोश करें.
आओ साकी बहार फिर आई,
होली में कितनी शादियां लाई.
-मीर
दैय्या रे मोहे भिजोया री, शाह निजाम के रंग में,
कपड़े रंग के कुछ न होत है, या रंग में तन को डुबोया री.
-अमीर खुसरो
तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचौली,
मगर अब साजन कैसी होली.
-वसीम बरेलवी
फ़स्ल-ए-बहार आई है होली के रूप में,
सोला-सिंघार लाई है होली के रूप में.
पिचकारियाँ लिए हुए देवी नशात की,
हर घर में आज आई है होली के रूप में.
-साग़र निज़ामी
हम से नज़र मिलाइए होली का रोज़ है,
तीर-ए-नज़र चलाइए होली का रोज़ है.
बच्चे गली में बैठे हैं पिचकारियाँ लिए,
बच बच के आप जाइए होली का रोज़ है.
-जूलियस नहीफ़ देहलवी
विश्व मनाएगा कल होली!
घूमेगा जग राह-राह में आलिंगन की मधुर चाह में,
स्नेह सरसता से घट भरकर, ले अनुराग राग की झोली!
विश्व मनाएगा कल होली!
-हरिवंश राय बच्चन
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की,
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की.
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की,
ख़ुम, शीशे, जाम, झलकते हों तब देख बहारें होली की.
-नज़ीर अकबराबादी
मुंह पर नक़ाब-ए-ज़र्द हर इक ज़ुल्फ़ पर,
गुलाल होली की शाम ही तो सहर है बसंत की.
-माधव राम जौहर
गुलजार खिले हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो,
कपड़ों पर रंग की छींटों से खुशरंग अजब गुलकारी हो,
मुँह लाल गुलाबी आँखें हों और हाथों में पिचकारी हो,
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो,
तब देख नजारे होली के.
-नज़ीर अकबराबादी