मौत हमेशा से ही इंसान के लिए सबसे बड़ा रहस्य रही है. कई लोगों ने देखा होगा कि जब किसी की मृत्यु हो रही होती है तो उसकी सांस धीमी या तेज हो जाती हैं, दिल की धड़कन कमजोर पड़ने लगती है, हाथ-पैर ठंडे होने लगते हैं, आंखें आधी खुली रह सकती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई इंसान इस स्थिति में पहुंचता है तो उसे क्या महसूस हो रहा होता है? क्या वाकई हमें कोई 'सफेद रोशनी' दिखती है या फिर उसकी पुरानी यादें किसी फिल्म की तरह आंखों के सामने घूमने लगती हैं? हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक स्टडी में इस रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश की है. तो आइए जानते हैं कि साइंस की नजर में किसी व्यक्ति को मरते समय अंदर से क्या महसूस होता है.
Metro.co.uk की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब शरीर काम करना बंद कर देता है, तब भी मस्तिष्क के कुछ हिस्से सक्रिय रहते हैं. रिसर्चर्स ने पाया कि मौत के ठीक पहले 'गामा ऑसिलेशन' (Gamma Oscillations) नामक मस्तिष्क तरंगें बढ़ जाती हैं. ये वही तरंगें हैं जो हमें सपने देखते समय, ध्यान लगाते समय या किसी पुरानी याद को ताजा करते समय महसूस होती हैं. यानी मौत के समय में व्यक्ति को अपने जीवन के सबसे अच्छे पल फ्लैशबैक की तरह दिखाई दे सकते हैं. इन एक्सपीरियंस को नियर-डेथ एक्सपीरियंस (एनडीई) कहते हैं जिनमें मरने वाला इंसान अपनों के चेहरे देखने की बात करता है.
ये खोज कार्डियक अरेस्ट के मरीजों के दिमाग की एक्टिविटी रिकॉर्ड करने से सामने आई है जो बताती है कि मौत कोई सिर्फ अंधेरा नहीं है बल्कि एक अच्छा सफर होता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि मौत के समय इंसान का दिमाग एक ऐसी अवस्था में चला जाता है, जिसे 'लाइफ रिकॉल' (Life Recall) कहा जाता है.
2023 में फ्रंटियर्स इन एजिंग न्यूरोसाइंस में पब्लिश स्टडी में भी दावा किया गया था कि मौत के ठीक पहले दिमाग बंद होने की जगह ओवरएक्टिव हो जाता है और हार्ट के रुकने के बाद भी कुछ समय के लिए एक्टिव बना रहता है.
अमेरिका के लुइसविले यूनिवर्सिटी में न्यूरोसर्जन डॉ. अजमल जेम्मार ने इस स्टडी को लीड किया था. जब 87 साल के मरीज को मिर्गी का दौरा पड़ा था और उसके लिए ईईजी (इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम) का इस्तेमाल किया जा रहा था. उस समय दिमाग की एक्टिविटी को रिकॉर्ड करते समय मरीज को दिल का दौरा पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई थी. जब उसकी धड़कन रुकने से 30 सेकंड पहले और बाद के समय की जांच की थी जिसमें न्यूरोलॉजिकल डिफरेंसेस देखने मिले थे.
डॉ. अजमल के अनुसार, 'स्टडी उन मरीजों के ईईजी (EEG) डेटा पर आधारित है जिनके मस्तिष्क की गतिविधियों को उनकी मृत्यु के समय मॉनिटर किया जा रहा था. रिसर्चर्स ने देखा कि कार्डियक अरेस्ट के बाद भी लगभग 30 सेकंड तक दिमाग में हाई-लेवल एक्टिविटी बनी रहती है.'
उन्होंने आगे कहा, 'मृत्यु के समय इंसान का दिमाग अचानक बंद नहीं होता, बल्कि उसमें अलग-अलग तरह की ब्रेन वेव्स एक्टिव हो जाती हैं जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में ऑस्सिलेशंस (Oscillations) कहा जाता है. इनमें गामा, थीटा, अल्फा और बीटा ब्रेन वेव्स शामिल हैं जो आमतौर पर सपनों, यादों और सोचने-समझने की प्रक्रिया से जुड़ी होती हैं.
डॉ. अजमल का कहना है, 'हमारा दिमाग संभवतः हमें मौत के लिए तैयार करता है और आखिरी समय में हमारे सबसे यादगार लम्हों को दोबारा जीने का मौका देता है. इसका मतलब यह हो सकता है कि मरने से ठीक पहले दिमाग जीवन की अहम घटनाओं और यादों को आखिरी बार दोहरा रहा होता है, ठीक वैसे ही जैसे कई लोग Near-death experience में फ्लैशबैक महसूस करने की बात कहते हैं.'
'ये निष्कर्ष हमारी इस समझ को चैलेंज करते हैं कि आखिर लाइफ खत्म कब होती है. क्या हार्ट रुकने के बाद ही लाइफ समाप्त हो जाती है या फिर उसके बाद भी लाइफ होती है. साथ ही ये स्टडी सवाल पैदा करती है कि अंगदान का सही समय क्या होना चाहिए.'
वैज्ञानिकों का कहना है, अक्सर 'नियर डेथ एक्सपीरियंस' (NDE) से गुजरने वाले लोग सुरंग जैसी अंधेरी गली और उसके आखिरी में तेज सफेद रोशनी देखने का दावा करते हैं. लेकिन जैसे ही हार्ट काम करना बंद करता है, दिमाग में खून जाना बंद होता है और ऑक्सीजन की कमी होने लगती है तो उस स्थिति में आंखों के रेटिना और दिमाग के विजुअल कॉर्टेक्स के बीच का संपर्क टूटने लगता है जिससे एक 'टनल विजन' (सुरंग जैसा दृश्य) पैदा होता है. यही कारण है कि लोगों को लगता है कि वे किसी अंधेरी सुरंग से उजाले की ओर जा रहे हैं.
रिसर्च में बताया गया है कि मौत के करीब पहुंचने पर दिमाग भारी मात्रा में एंडोर्फिन (Endorphins) और अन्य न्यूरोकेमिकल्स रिलीज करता है. ये कैमिकल शरीर में डर और दर्द को कम करने का काम करते हैं और यही वजह है कि जो लोग मरकर वापस जिंदा हुए हैं या जिन्हें होश आया है उन्हें एक अजीबो-गरीब शांति और सुकून महसूस होता है.