Health and Ageing: माना जाता है कि मनुष्य का स्वास्थ्य जेनेटिक्स पर भी निर्भर करता है. ऐसी कई बीमारियां हैं जो जींस से आती हैं, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि ये केवल कुछ बीमारियां हैं सभी नहीं. नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक हालिया ब्रिटिश स्टडी इस बात को साबित करती है कि इंसानों के स्वास्थ्य पर उनके जेनेटिक्स से कई ज्यादा उनकी लाइफस्टाइल से जुड़ी आदतों का असर पड़ता है.
लाइफस्टाइल और पर्यावरण का असर जीन से कई गुना ज्यादा
ब्रिटिश स्टडी से पता चलता है कि आपकी लाइफस्टाइल और पर्यावरण जिसमें आप रहते हैं आपके स्वास्थ्य और बुढ़ापे पर जेनेटिक्स से कहीं ज्यादा प्रभाव डालते हैं. इस स्टडी में लगभग 5 लाख लोगों का डेटा इकट्ठा किया गया. 22 मुख्य बीमारियों के लिए जेनेटिक रिस्क स्कोर और 164 एनवायरमेंटल फैक्टर्स की जांच की गई. नतीजों में पाया गया कि लाइफस्टाइल और पर्यावरण मृत्यु के जोखिम को करीब 17% तक प्रभावित करते हैं, जबकि जीन का असर सिर्फ 2% से भी कम होता है.
25 फैक्टर्स की पहचान
ब्रिटिश स्टडी ने 25 एनवायरमेंटल फैक्टर्स की पहचान की जो बुढ़ापे, गंभीर बीमारियों और समय से पहले मौत के खतरे को प्रभावित करते हैं. इनमें से 23 फैक्टर्स ऐसे हैं, जिन्हें सुधारा जा सकता है. धूम्रपान, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, फिजिकल एक्टिविटी और जीवन की परिस्थितियां सबसे बड़े फैक्टर रहे. खास बात यह है कि इन सभी को सुधारा जा सकता है.
बचपन की आदतें भी बढ़ा सकती हैं उम्र बढ़ने और मौत का खतरा
स्टडी में पाए गए परिणामों में धूम्रपान अकेले 21 बीमारियों से जुड़ा हुआ पाया गया. वहीं घर की इनकम, घर पर मालिकाना हक और नौकरी जैसी बातें 19 बीमारियों से जुड़ी थीं. वहीं, फिजिकल एक्टिविटी की कमी भी 17 बीमारियों का कारण बन सकती है. इसके अलावा, बचपन के कुछ फैक्टर्स, जैसे 10 साल की उम्र में बढ़ा हुआ वजन या मां के प्रेग्नेंसी के दौरान धूम्रपान करने जैसी आदतें भी भविष्य में (30 से 80 साल बाद) उम्र बढ़ने और समय से पहले मृत्यु के खतरे को बढ़ा सकती हैं.
किस पर किसका असर
पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं का फेफड़े, दिल और लिवर की बीमारियों पर ज्यादा असर पड़ा. वहीं, दिमागी बीमारी (जैसे डिमनिशिया) और ब्रेस्ट कैंसर जैसी बीमारियों में जीन का असर ज्यादा देखा गया.