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Sedition Law: राजद्रोह कानून पर SC में सुनवाई, जानें इसका इतिहास.. इंदिरा गांधी की सरकार में हुआ था बड़ा बदलाव

Sedition Law India: राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल ही सरकार से पूछा था कि आजादी के 75 साल बाद भी इस कानून की जरूरत क्यों है?

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देशद्रोह कानून को हटाने की मांग अक्सर होती रहती है. (फाइल फोटो-PTI) देशद्रोह कानून को हटाने की मांग अक्सर होती रहती है. (फाइल फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 1870 में भारत में लागू हुआ राजद्रोह कानून
  • आजादी के बाद भी ये कानून IPC में रहा
  • कोर्ट राजद्रोह कानून पर सवाल उठाती रही हैं

Sedition Law India: सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर से राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर सुनवाई होनी है. चीफ जस्टिस एनवी रमणा, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच इस पर सुनवाई करेगी. 

राजद्रोह कानून को लेकर पिछले साल जुलाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की थी. तब चीफ जस्टिस एनवी रमणा ने पूछा था कि आजादी के 75 साल बाद भी इस कानून की जरूरत क्यों है? उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, 'ये एक औपनिवेशिक कानून है. ये स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए था. इसी कानून का इस्तेमाल महात्मा गांधी और बाल गंगाधर के खिलाफ किया गया था. क्या आजादी के 75 साल बाद भी इस कानून की जरूरत है?'

तब सीजेआई रमणा ने कहा था कि सरकार कई सारे पुराने कानूनों को निरस्त कर रही है तो फिर धारा 124A को निरस्त करने पर विचार क्यों नहीं कर रही? इस पर अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि कानून को निरस्त करने की जरूरत नहीं है और गाइडलाइन बनाई जानी चाहिए, ताकि इसका कानूनी मकसद पूरा हो सके.

देश में देशद्रोह या राजद्रोह की धारा के इस्तेमाल को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि इस धारा का इस्तेमाल व्यक्तियों और पार्टियों के कामकाज के लिए गंभीर खतरा है. 

लेकिन ये कानून है क्या?

- भारतीय दंड संहिता की धारा 124A में राजद्रोह या देशद्रोह का उल्लेख है. ये धारा कहती है, 'अगर कोई व्यक्ति बोलकर या लिखकर या इशारों से या फिर चिह्नों के जरिए या किसी और तरीके से घृणा या अवमानना या उत्तेजित करने की कोशिश करता है या असंतोष को भड़काने का प्रयास करता है तो वो राजद्रोह का आरोपी है.'

- ये एक गैर-जमानती अपराध है और इसमें दोषी पाए जाने पर तीन साल की कैद से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है. साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

- अक्सर 'राजद्रोह' और 'देशद्रोह' को एक ही मान लिया जाता है, लेकिन जब सरकार की मानहानि या अवमानना होती है तो उसे 'राजद्रोह' कहा जाता है और जब देश की मानहानि या अवमानना होती है तो उसे 'देशद्रोह' कहा जाता है. अंग्रेजी में इसे Sedition कहते हैं. दोनों ही मामलों में धारा 124A का इस्तेमाल होता है.

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क्या है इस कानून का इतिहास?

- सबसे पहले ये कानून इंग्लैंड में आया था. 17वीं सदी में जब इंग्लैंड में वहां की सरकार और साम्राज्य के खिलाफ आवाजें उठने लगीं तो अपनी सत्ता बचाने के लिए राजद्रोह का कानून लाया गया. यहीं से ये कानून भारत में आया.

- भारत में ब्रिटेन के कब्जा करने के बाद थॉमस मैकॉले को इंडियन पीनल कोड यानी आईपीसी का ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी मिली. 1860 में आईपीसी को लागू किया गया. हालांकि, उस वक्त इसमें देशद्रोह का कानून नहीं था.

- बाद में जब अंग्रेजों को लगा कि भारतीय क्रांतिकारियों को शांत करने का कोई और उपाय नहीं बचा है तो उन्होंने आईपीसी में संशोधन किया और इसमें धारा 124A को जोड़ा. आईपीसी में ये धारा 1870 में जोड़ी गई. 

- इस धारा का इस्तेमाल स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने और सेनानियों को गिरफ्तार करने के लिए किया जाने लगा. इसका इस्तेमाल महात्मा गांधी, भगत सिंह और बाल गंगाधर तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ हुआ. 

- महात्मा गांधी को जब इस धारा के तहत गिरफ्तार किया गया, तब उन्होंने कहा, 'स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करने के लिए जो कानून बनाए हैं, उनमें ये सबसे हास्यास्पद और डरावना है. अगर किसी को सरकार की किसी बात से परेशानी है तो उसके पास इसे व्यक्त करने की आजादी होनी चाहिए. उसे ये आजादी तब तक होनी चाहिए, जब तक वो अपनी किसी बात से नफरत या हिंसा नहीं भड़काता.'

इंदिरा गांधी की सरकार में हुआ बड़ा बदलाव

- 1947 में आजादी मिलने के बाद कई नेताओं ने देशद्रोह के कानून को हटाने की बात कही. लेकिन जब भारत का अपना संविधान लागू हुआ तो उसमें भी धारा 124A को जोड़ा गया. 

- 1951 में जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत बोलने की आजादी को सीमित करने के लिए संविधान संशोधन लाया, जिसमें अधिकार दिया गया कि बोलने की आजादी पर तर्कपूर्ण प्रतिबंध लगाया जा सकता है.

- 1974 में इंदिरा गांधी सरकार में इस कानून से जुड़ा बड़ा बदलाव हुआ. इंदिरा गांधी की सरकार में देशद्रोह को 'संज्ञेय अपराध' बनाया गया. यानी, इस कानून के तहत पुलिस को किसी को भी बिना वारंट के पकड़ने का अधिकार दे दिया गया.

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जब अदालतों ने इस कानून पर उठाए सवाल

- आजादी के बाद 1951 में तारा सिंह गोपी चंद मामले में पहली बार किसी अदालत ने इस कानून पर सवाल उठाए. तब पंजाब हाईकोर्ट ने धारा 124A को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध माना था.

- बिहार के रहने वाले केदारनाथ सिंह पर भाषण देने पर राज्य सरकार ने राजद्रोह का केस दर्ज किया. इस मामले में 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना कर देने भर से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता. इस मामले में तभी दंडित किया जा सकता है जब उससे हिंसा भड़कती हो. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को आज भी धारा 124A से जुड़े मामलों के लिए मिसाल के तौर पर लिया जाता है.

- दिवंगत पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ हिमाचल प्रदेश में देशद्रोह का केस दर्ज किया गया था. जून 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इस केस को निरस्त कर दिया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ सिंह मामले का जिक्र करते हुए कहा था कि हर नागरिक को सरकार की आलोचना करने का हक है, बशर्ते उससे कोई हिंसा न भड़के.

कितनों को सजा हो पाती है?

- सरकारें लोगों पर देशद्रोह या राजद्रोह का केस दर्ज तो कर लेती हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर के खिलाफ आरोप साबित ही नहीं हो पाता. जानकार मानते हैं कि जब ज्यादातर लोग छोट रहे हैं तो इसका मतलब है कि मुकदमे गलत दायर हो रहे हैं.

- केंद्र सरकार की एजेंसी NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2016 से 2020 के बीच 5 सालों में देशद्रोह के 322 मामले दर्ज हुए थे. इनमें 422 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. लेकिन इसी दौरान सिर्फ 12 लोगों पर ही देशद्रोह का आरोप साबित हो सका और उन्हें सजा दी गई.

 

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