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'सार्वजनिक हो रिव्यू कमेटी का आदेश', जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर बैन पर SC का केंद्र को आदेश

केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद 2019 में जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर प्रतिबंधों को कड़ा करना शुरू कर दिया था. पत्रकार अनुराधा भसीन ने प्रतिबंधों की समीक्षा की मांग करते हुए 2020 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. कोर्ट ने मई 2020 में केंद्र से जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर बैन की आवश्यकता का आकलन करने के लिए एक विशेष समिति गठित करने को कहा था.

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सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

जम्‍मू-कश्‍मीर में इंटरनेट पर केंद्र सरकार के नियंत्रण और इंटरनेट बैन को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस दौरान कोर्ट ने उस रिव्यू कमेटी के आदेश को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया, जिसके आधार पर इंटरनेट बैन किया गया. कोर्ट ने कहा कि रिव्यू सिर्फ एक औपचारिकता नहीं हो सकती. 

न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की तीन न्यायाधीशों वाली पीठ ने हालांकि यह भी कहा कि कमेटी के विचार-विमर्श को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा. दरअसल, इंटरनेट बैन को लेकर जम्मू कश्मीर प्रशासन का कहना था कि कमेटी ने आंतकवाद, सीमापार घुसपैठ, सुरक्षा जैसे पहलुओं के साथ-साथ बेहद संवेदनशील खूफिया इनपुट पर विचार कर ये फैसला लिया है.

जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि इस अदालत को हल्के में न लें. यह एक प्रथा बन गई है. सभी के साथ समान व्यवहार करना होगा. आप न्यायालय को हल्के में ले रहे हैं. हम बार के प्रति विनम्र हैं और इसका मतलब यह नहीं है कि बार हमारे प्रति असभ्य होगा. 

याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बात को ध्यान में रखते हुए कि रिव्यू आदेश से भी पार्टियों के अधिकार प्रभावित होंगे, हम अपनी प्रथम दृष्टया राय व्यक्त करते हैं कि रिव्यू विचार-विमर्श को प्रकाशित करना आवश्यक नहीं हो सकता है, हालांकि रिव्यू में पारित आदेशों को प्रकाशित करने की आवश्यकता है." 

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जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि समीक्षा आदेश एक आंतरिक तंत्र है, लेकिन इसे प्रकाशित करने में कोई बाधा नहीं है. 

याचिकाकर्ता फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कहा कि जिन राज्यों में कभी न कभी इंटरनेट पर बैन लगाए गए, उन्होंने रिव्यू ऑर्डर प्रकाशित किए हैं, लेकिन यह समझ से परे है कि केवल जम्मू-कश्मीर ऐसा क्यों नहीं कर रहा है. उन्होंने कहा, "मुझे आश्चर्य है कि जम्मू-कश्मीर विरोध कर रहा है. अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, मेघालय आदि सभी राज्यों ने इसे प्रकाशित किया है. इसके लिए कोई मान्य आदेश नहीं है."

फरासत ने कहा कि ये आदेश कानून द्वारा अनिवार्य हैं और ऐसा करने में विफलता अनुराधा भसीन मामले में शीर्ष अदालत के आदेश के साथ-साथ दूरसंचार निलंबन नियमों की भावना के खिलाफ है.

बता दें कि केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद 2019 में जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर प्रतिबंधों को कड़ा करना शुरू कर दिया था. पत्रकार अनुराधा भसीन ने प्रतिबंधों की समीक्षा की मांग करते हुए 2020 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. 11 मई, 2020 को शीर्ष अदालत ने जम्मू-कश्मीर में 4जी इंटरनेट सेवाओं की बहाली की याचिका पर विचार करने के लिए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष समिति गठित करने का आदेश दिया था, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकारों को ध्यान में रखते हुए संतुलित होने की जरूरत है. तथ्य यह है कि केंद्र शासित प्रदेश "आतंकवाद से त्रस्त" रहा है.

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2020 में, शीर्ष अदालत ने कहा था कि रिव्यू ऑर्डर अलमारी में रखे जाने के लिए नहीं हैं और प्रशासन से उन्हें प्रकाशित करने के लिए कहा था. शीर्ष अदालत ने कहा कि कोविड-19 महामारी और राष्ट्रीय लॉकडाउन के मद्देनजर जम्मू-कश्मीर में बेहतर इंटरनेट सेवाएं वांछनीय हैं. 10 जनवरी, 2020 को शीर्ष अदालत ने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ के फैसले में कहा था कि बोलने की स्वतंत्रता और इंटरनेट पर व्यापार करने की स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित है. इसने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से तत्काल प्रतिबंध आदेशों की समीक्षा करने को कहा था.

(पीटीआई के इनुपट के साथ)

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