प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से अपने भाषण में लोगों को एक साल के लिए सोना नहीं खरीदने की बात कही है. तब से कई तरह की चर्चाएं हो रही है. पीएम मोदी के इस भाषण ने अमेरिका के उस दौर की याद दिला दी, जब महामंदी के दौरान वहां आम लोगों से सरकार ने सोना वापस ले लिया था. सोना घर में रखने का अधिकार खत्म कर दिया गया था. हालांकि, भारत में ऐसी कोई स्थिति नहीं है. फिर भी जानते हैं कि आखिर उस वक्त अमेरिका में लोगों को सोना घर में न रखकर बैंक में जमा करने को क्यों कहा गया था?
1933 में अमेरिका ने गोल्ड स्टैंडर्ड यानी सोने पर आधारित मुद्रा व्यवस्था को खत्म कर दिया था. वहां लोगों को घर में सोना रखना मना कर दिया गया था. तब वहां की सरकार ने लोगों से सारा सोना वापस ले लिया था. यह फैसला उस दौर में लिया गया, जब पूरी दुनिया महामंदी यानी ग्रेट डिप्रेशन की मार झेल रही थी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई थी.
11 अप्रैल 1933 को अमेरिकी कांग्रेस ने एक संयुक्त प्रस्ताव पास किया, जिसके बाद लोगों का यह अधिकार खत्म कर दिया गया कि वे सरकार या बैंकों से डॉलर के बदले सोना मांग सकें. इसके साथ ही अमेरिका धीरे-धीरे गोल्ड स्टैंडर्ड सिस्टम से बाहर निकल गया.
क्यों लोगों से अमेरिकी सरकार ने वापस ले लिया था सोना
दरअसल, गोल्ड स्टैंडर्ड एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था थी, जिसमें किसी देश की मुद्रा की कीमत उसके पास मौजूद सोने के भंडार पर निर्भर करती थी. यानी लोग चाहें तो अपने कागजी डॉलर के बदले तय मात्रा में सोना ले सकते थे. अमेरिका 1879 से इसी व्यवस्था का पालन कर रहा था.लेकिन 1930 के दशक में आई ग्रेट डिप्रेशन ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हिला दिया.
बड़ी संख्या में बैंक बंद होने लगे और लोगों का बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा टूटने लगा. डर के कारण लोग तेजी से अपने डॉलर के बदले सोना निकालने लगे और उसे घरों में जमा करने लगे. इससे सरकार और बैंकों के सामने सोने की भारी कमी का संकट खड़ा हो गया.
कीन्सियन आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, आर्थिक मंदी से निपटने के सबसे अच्छे तरीकों में से एक बाजार में मुद्रा की मात्रा बढ़ाना है. ऐसे में फेडरल रिजर्व के पास मौजूद सोने की मात्रा बढ़ने से उसकी मुद्रा आपूर्ति बढ़ाने की क्षमता भी बढ़ जाती. इसी तरह के आर्थिक दबावों का सामना करते हुए ब्रिटेन ने 1931 में गोल्ड स्टैंडर्ड व्यवस्था छोड़ दी थी और राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने इस बात पर ध्यान दिया था.
उस समय अर्थशास्त्रियों का मानना था कि मंदी से बाहर निकलने के लिए बाजार में ज्यादा पैसा लाना जरूरी है. लेकिन गोल्ड स्टैंडर्ड की वजह से सरकार जितना सोना रखती थी, उतनी ही मुद्रा छाप सकती थी. ऐसे में सरकार को लगा कि अगर इस व्यवस्था को खत्म किया जाए तो ज्यादा पैसा छापकर अर्थव्यवस्था को गति दी जा सकती है.
राष्ट्रपति बनते ही फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने सख्त कदम उठाए. मार्च 1933 में उन्होंने पूरे देश में बैंक बंदी यानी बैंक मोरेटोरियम लागू कर दिया ताकि लोग घबराकर बैंकों से पैसा और सोना न निकालें. इसके साथ ही बैंकों को सोना देने और विदेश भेजने पर भी रोक लगा दी गई.
बैंक में सोना जमा करने का जारी कर दिया आदेश
5 अप्रैल 1933 को राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने एक बड़ा आदेश जारी किया. इसके तहत लोगों को 100 डॉलर से अधिक मूल्य के सभी सोने के सिक्के, गोल्ड सर्टिफिकेट और सोने की ईंटें सरकार को जमा करानी पड़ीं. बदले में उन्हें 20.67 डॉलर प्रति औंस की तय कीमत पर कागजी मुद्रा दी गई. लोगों को 1 मई तक अपना सोना फेडरल रिजर्व में जमा कराने का आदेश दिया गया था.
सरकार ने कुछ ही हफ्तों में करोड़ों डॉलर का सोना अपने नियंत्रण में ले लिया. इसके बाद जून 1933 में कांग्रेस ने उन नियमों को भी खत्म कर दिया, जिनमें कर्ज चुकाने के लिए सोने में भुगतान करना जरूरी होता था. फिर 1934 में अमेरिकी सरकार ने सोने की कीमत बढ़ाकर 35 डॉलर प्रति औंस कर दी. इससे फेडरल रिजर्व के पास मौजूद सोने का मूल्य अचानक बढ़ गया और सरकार को ज्यादा मात्रा में मुद्रा छापने की ताकत मिल गई.
अमेरिका ने कई दशकों तक इसी बदली हुई व्यवस्था को जारी रखा. लेकिन 15 अगस्त 1971 को राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने ऐलान कर दिया कि अब अमेरिका डॉलर को तय कीमत पर सोने में नहीं बदलेगा. इसके साथ ही अमेरिका ने पूरी तरह गोल्ड स्टैंडर्ड सिस्टम को छोड़ दिया.इसके कुछ साल बाद 1974 में राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड ने एक कानून पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद अमेरिकी नागरिकों को फिर से निजी तौर पर सोना रखने की अनुमति मिल गई.