अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच जो कुछ चल रहा है, उसमें कई बातें छनकर सामने आ रही हैं, जो इस विवाद के मूल में है. पाकिस्तान बार-बार तालिबान पर आतंकी संगठनों को पनाह देने की बात कर रहा है और उसे असल विवाद की जड़ बता रहा है. ये समझना जरूरी है कि पाकिस्तान की लड़ाई सिर्फ अफगानिस्तान की तालिबान आर्मी से नहीं हो रही है. पाकिस्तान के सामने एक साथ कई मोर्चे खुल गए हैं. ऐसे में समझते हैं कि आखिर तालिबान के साथ और कौन पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है.
गुरुवार की रात दोनों देशों के बीच जो झड़प शुरू हुई उसकी वजह डूरंड लाइन का विवाद बताया जा रहा है. अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की सीमा को डूरंड रेखा कहा जाता है और इसकी लंबाई 2,611 किलोमीटर है. अफगानिस्तान औपचारिक रूप से इस सीमा को मान्यता नहीं देता है, क्योंकि उसका तर्क है कि यह एक थोपी गई औपनिवेशिक सीमांकन रेखा थी, जिसने दोनों देशों के बीच जातीय पश्तून क्षेत्रों को अवैध रूप से विभाजित किया था.
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच झड़प की वजह
अल-जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक,, डूरंड रेखा के अलावा आतंकवाद के मुद्दे पर इस्लामाबाद और काबुल के बीच मतभेद रहे हैं. इस्लामाबाद ने बार-बार अफगान के तालिबान शासन से आग्रह किया है कि वह अपनी जमीन को टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान)और उसके सहयोगी संगठन फितना अल-ख्वारिज (एफएके) और दाएश जैसे आतंकवादी संगठनों द्वारा इस्तेमाल होने से रोके. तालिबान के ये सहयोगी पाकिस्तान से सटे डूरंड रेखा के आसपास के इलाके में सक्रिय रहते हैं.
हाल ही में इस्लामाबाद, बाजौर और बन्नू में हुए आत्मघाती बम हमलों ने पाकिस्तान को दहला दिया था. इन हमलों को अफगानिस्तान स्थित संचालकों द्वारा अंजाम दिया गया था और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के उन तत्वों ने इसकी जिम्मेदारी ली थी जिनके संबंध फितना अल-ख्वारिज (एफएके) और दाएश से थे.
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अक्टूबर 2025 में, कतर और तुर्की की मध्यस्थता में हुई वार्ता के दौरान अफगानिस्तान और पाकिस्तान ने अपनी सीमा पर एक सप्ताह तक चले भीषण और घातक संघर्षों के बाद तत्काल युद्धविराम पर सहमति जताई थी. तब दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंध काफी बिगड़ गए थे. अक्टूबर में हुई घातक लड़ाई में दोनों तरफ से 70 से अधिक लोगों की मौत के बाद से 2,611 किलोमीटर लंबी डूरंड लाइन को बंद कर दिया गया है.
पाकिस्तान को तालिबान के अलावा इनसे भी मिल रही चुनौती
अब पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान, पाकिस्तान तालिबान (टीटीपी) जैसे सशस्त्र समूहों पर लगाम लगाए, जिनके बारे में उसका कहना है कि अफगानिस्तान उन्हें पनाह दे रहा है. टीटीपी का उदय 2007 में पाकिस्तान में हुआ था और यह अफगानिस्तान के तालिबान से अलग है, लेकिन इसके तालिबान के साथ गहरे वैचारिक, सामाजिक और भाषाई संबंध हैं.
तालिबान द्वारा 2021 में सत्ता संभालने के बाद से पड़ोसी देशों के बीच लगातार झड़पें होती रही हैं. दक्षिण और मध्य एशियाई सुरक्षा और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ सामी ओमारी ने अल जज़ीरा को बताया कि 2021 से अफगान और पाकिस्तानी सेनाओं के बीच 75 झड़पें हुई हैं - यह वही वर्ष है जब अमेरिकी और नाटो सेनाएं अफगानिस्तान से वापस चली गईं थीं.
इधर, अफगान तालिबान, टीटीपी पर गंभीरता से कार्रवाई करने के लिए अनिच्छुक प्रतीत होता है, जिसकी वजह दोनों समूहों के बीच पूर्व में बनी समानताएं हैं. साथ ही टीटीपी को अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी, इस्लामिक स्टेट खोरासान का उनके इलाके में शामिल होने का डर भी है, जिसे पाकिस्तान बढ़ावा देता रहा है.
अभी जो हालात है उसमें पाकिस्तान के खिलाफ सिर्फ तालिबान ही नहीं टीटीपी और उसके सहयोगी मिलिशिया भी मोर्चा खोले हुए हैं. इसके अलावा पाकिस्तान को बलूचिस्तान विद्रोहियों से भी डर है कि वो इनमें शामिल न हो जाए. क्योंकि, बलूच लिबरेशन आर्मी भी पाकिस्तान के खिलाफ टीटीपी से समय-समय पर रणनीतिक साझेदारी करती आई है.
बीएलए ने भी खोल रहा है पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा
हाल के वर्षों में पाकिस्तान में टीटीपी और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) द्वारा किए गए सशस्त्र हमलों में तेजी आई है. बीएलए संसाधन संपन्न बलूचिस्तान प्रांत में सक्रिय है. अफगानिस्तान की सीमा से लगे खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान इस हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. इसलिए पाकिस्तान का इन संगठनों से डरना लाजिमी है.
जियो न्यूज के मुताबिक, इस्लामाबाद ने कहा है कि जब तक तालिबान अपनी "गुरिल्ला मानसिकता" नहीं छोड़ देता, तब तक वह अफगानिस्तान के प्रति अपनी मौजूदा नीति को बरकरार रखेगा. गृह मामलों के राज्य मंत्री तलल चौधरी ने कहा है कि बिगड़ती स्थिति का कारण एक गैर-जिम्मेदार पड़ोसी और एक गैर-जिम्मेदार राज्य है.