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महिंद्रा एंड मोहम्मद से महिंद्रा एंड महिंद्रा तक, बंटवारे ने कैसे बदली इस ब्रांड की कहानी

महिंद्रा एंड महिंद्रा से महिंद्रा एंड मोहम्मद तक का सफर एक जज्बे की कहानी बन गया. जहां एक संस्थापक के अलग हो जाने के बाद भी महिंद्रा भाइयों ने कंपनी के विजन को आगे बढ़ाया. उन्होंने इसे भारत के प्रमुख ऑटोमोबाइल समूहों में बदल दिया. और एक ऐसी विरासत खड़ी की, जो आज भी लगातार आगे बढ़ रही है.

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दिलचस्प बात यह है कि बंटवारे के बाद भी रिश्ते खत्म नहीं हुए (Photo: ITG)
दिलचस्प बात यह है कि बंटवारे के बाद भी रिश्ते खत्म नहीं हुए (Photo: ITG)

भारत के बंटवारे की दर्दभरी आवाजें जब दोनों देशों में गूंज रही थीं. लोग अपने घर छोड़ने और नई पहचान चुनने को मजबूर थे. उसी उथल-पुथल के बीच एक छोटी सी कंपनी भी अपने भविष्य के मोड़ पर खड़ी थी. यह वही पल था जिसने आगे चलकर उसकी दिशा तय कर दी.

साल 1945 में पंजाब के लुधियाना में दो भाई कैलाश चंद्र महिंद्रा और जगदीश चंद्र महिंद्रा ने अपने दोस्त गुलाम मोहम्मद के साथ मिलकर एक स्टील ट्रेडिंग कंपनी की शुरुआत की. इस साझेदारी में भरोसे और बराबरी को दिखाने के लिए कंपनी का नाम रखा गया महिंद्रा एंड मोहम्मद.

यह उस दौर की शुरुआती भारतीय कंपनियों में से एक थी. जहां तीनों साझेदारों की पहचान बराबर मानी गई. भले ही निवेश और हिस्सेदारी अलग-अलग रही हो. उस समय यह सिर्फ एक स्टील का कारोबार था. और देश अभी भी ब्रिटिश शासन के अधीन था. किसी को अंदाजा नहीं था कि यह छोटी कंपनी आगे चलकर भारत के सबसे बड़े बिजनेस समूहों में शामिल हो जाएगी.

1947. जब देश बंटा. कंपनी भी मोड़ पर आई

फिर आया साल 1947. भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के साथ न सिर्फ देश दो हिस्सों में बंटा. बल्कि इस साझेदारी में भी बदलाव आ गया. यह बदलाव किसी विवाद की वजह से नहीं. बल्कि परिस्थितियों के कारण हुआ.

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गुलाम मोहम्मद नए बने पाकिस्तान चले गए. जहां उन्होंने आगे चलकर देश के पहले वित्त मंत्री और बाद में गवर्नर-जनरल के रूप में काम किया. वहीं महिंद्रा भाइयों ने भारत में रहकर अपने बिजनेस को आगे बढ़ाने का फैसला किया.

अब सबसे बड़ा सवाल था. कंपनी के नाम का क्या किया जाए?

तब तक 'M&M' नाम कंपनी के दस्तावेज़ों. लेटरहेड और बिलों पर छप चुका था. नए सिरे से शुरुआत करने के बजाय. महिंद्रा भाइयों ने उसी पहचान को बनाए रखने का फैसला किया. उन्होंने नाम का फुल फॉर्म बदल दिया. लेकिन 'M&M' को कायम रखा. इसी तरह महिंद्रा एंड महिंद्रा का नाम सामने आया.

दिलचस्प बात यह है कि बंटवारे के बाद भी रिश्ते खत्म नहीं हुए. साल 1955 में जब गुलाम मोहम्मद भारत आए. तो उनका महिंद्रा परिवार से संपर्क बना रहा.

शुरुआती साल, दोस्ती से बिजनेस तक

महिंद्रा एंड महिंद्रा की नींव सिर्फ 1945 में नहीं पड़ी थी. बल्कि इससे पहले ही इसकी बुनियाद तैयार हो चुकी थी. जगदीश चंद्र महिंद्रा और गुलाम मोहम्मद. टाटा स्टील में साथ काम कर चुके थे.

यहीं से उनके बीच भरोसा और समझ विकसित हुई. जिसने उन्हें अपना खुद का बिजनेस शुरू करने के लिए प्रेरित किया. जेसी महिंद्रा ने जरूरी संसाधन जुटाए. जबकि उनके छोटे भाई केसी महिंद्रा ने सक्रिय भूमिका निभाई. गुलाम मोहम्मद कंपनी के वित्तीय मामलों को संभालते थे. और एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में काम करते थे.

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ट्रेडिंग से मैन्युफैक्चरिंग तक का सफर

शुरुआत स्टील ट्रेडिंग से हुई थी. लेकिन जल्द ही कंपनी ने मैन्युफैक्चरिंग की ओर कदम बढ़ाया. साल 1947 में ही कंपनी ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में एंट्री की. और Willys Jeeps को असेंबल करना शुरू किया.

1949 में इस बदलाव ने और स्पष्ट रूप लिया. जब 75 Willys Jeeps भारत लाई गईं. ये जीप्स पूरी तरह तैयार नहीं थीं. बल्कि CKD (Completely Knocked Down) किट के रूप में आई थीं. इन्हें मुंबई के मजगांव में असेंबल किया गया. यही कदम आगे चलकर कंपनी के ऑटोमोबाइल बिजनेस की मजबूत नींव बना.

1950 का दशक और तेजी से बढ़ा कारोबार

1950 के दशक में कंपनी लगातार आगे बढ़ती रही. 15 जून 1955 को Mahindra & Mahindra पब्लिक कंपनी बनी. और 1956 में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट हुई. इससे कंपनी को पूंजी जुटाने और विस्तार करने का नया मौका मिला.

1960 का दशक. खेती से जुड़ा बड़ा कदम

1960 के दशक की शुरुआत में कंपनी ने ट्रैक्टर सेक्टर में कदम रखा. इसके लिए उसने International Harvester के साथ साझेदारी की. उस समय भारत में खेती और ग्रामीण विकास को बढ़ावा दिया जा रहा था. और यह कदम उसी दिशा में अहम साबित हुआ.

1963 में केशुब महिंद्रा के चेयरमैन बनने के बाद कंपनी ने अपने बिजनेस को और विस्तार देना शुरू किया. Mitsubishi और Peugeot जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी कर नए सेक्टर में भी कदम रखा गया.

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1962 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने MUSCO फैक्ट्री का दौरा किया

एक खास पल. जब दुनिया ने देखा महिंद्रा

1964 में कंपनी के लिए एक खास मौका आया. जब पोप पॉल VI के भारत दौरे के दौरान एक खास Mahindra Jeep का इस्तेमाल किया गया. इस दौरान उन्होंने हजारों लोगों का अभिवादन किया. यह पल कंपनी के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बन गया.

आज की पहचान. लेकिन जड़ें वहीं

समय के साथ Mahindra & Mahindra ने कई सेक्टर में अपना विस्तार किया. लेकिन इसकी असली कहानी उसी दौर से जुड़ी है. जब देश खुद को नए सिरे से बना रहा था.यह सिर्फ एक कंपनी की सफलता की कहानी नहीं है. बल्कि उस पहचान की कहानी है. जो बंटवारे जैसे कठिन समय में भी कायम रही.

M&M ने एक खास Jeep तैयार की थी.

जो शुरुआत Mahindra & Mohammed के रूप में हुई थी. वही आगे चलकर Mahindra & Mahindra बनी. यह बदलाव किसी योजना का हिस्सा नहीं था. बल्कि हालात का नतीजा था.

आज भी कंपनी के शुरुआती साल हमें याद दिलाते हैं कि जैसे लोगों की जिंदगी बंटवारे से बदली. वैसे ही कारोबार भी उस दौर से प्रभावित हुए. Mahindra & Mahindra की कहानी उसी इतिहास की एक जीवंत मिसाल है.
 

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रिषभ चौहान
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