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जब पहली बार लोच नेस में 'मॉन्सटर' को देखा गया, अब तक बना है रहस्य

आज के दिन ही 20वी सदी की सबसे सनसनीखेज और रहस्यमय दावे से जुड़ी घटना का जन्म हुआ. जब स्कॉटलैंड के लोच नेस झील में एक पौराणिक जलीय जीव देखे जाने का दावा किया. इसकी आजतक खोज जारी है, लेकिन फिर कभी यह जीव दोबारा किसी को नहीं दिखा.

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पहली बार लोच नेस मॉन्सटर को देखने की घटना सामने आई थी (Photo - Getty)
पहली बार लोच नेस मॉन्सटर को देखने की घटना सामने आई थी (Photo - Getty)

2 मई 1933 को लोच नेस मॉन्स्टर की किंवदंती का जन्म हुआ था. यह एक ऐसी घटना थी, जिसका रहस्य आज भी बरकरार है. उस वक्त इस घटना ने  स्थानीय समाचारों में सुर्खियां बटोरीं. स्कॉटलैंड के लोच नेस झील में एक विशालकाय जानवर देखे जाने का दावा किया गया था और इसकी तस्वीर भी ली गई थी. यह तस्वीर आज भी एक रहस्य है. दशकों तक इस दावे की पुष्टि के लिए दर्जनों वैज्ञानिक और खोजकर्ता लगे रहे, लेकिन कुछ निष्कर्ष नहीं निकला.  

लोच नेस को नेसी नाम से भी जाना जाता है. स्कॉटलैंड में प्रचलित लोककथाओं के मुताबिक, लोच नेस में एक पौराणिक जलीय जीव देखा गया था. इस राक्षसकाय जीव लोक मान्यताओं के मुताबिक, किसी जमाने में अस्तित्व हुआ करता था. आज भी लोच नेस मॉन्सटर या राक्षस को लेकर अफवाहें फैलती रहती है और उस झील में उसे देखने का दावा किया जाता है. 

तब इनवरनेस कूरियर अखबार ने एक स्थानीय दंपति के बयान को प्रकाशित किया, जिन्होंने दावा किया कि उन्होंने एक विशालकाय जानवर को झील की सतह पर  गोता लगाते देखा था. यह कहानी मीडिया में तब सनसनी बन गई थी. लंदन के अखबारों ने स्कॉटलैंड में संवाददाता भेजे और एक सर्कस ने उस जानवर को पकड़ने के लिए 20,000 पाउंड स्टर्लिंग का इनाम घोषित किया.

2 मई को अखबार में यह खबर छपने के बाद, लोगों की दिलचस्पी लगातार बढ़ती गई, खासकर तब जब एक अन्य दंपति ने जमीन पर जानवर को देखने का दावा किया. शौकिया खोजकर्ताओं ने दशकों से तक निरंतर निगरानी रखी है और 1960 के दशक में कई ब्रिटिश विश्वविद्यालयों ने झील में सोनार अभियान शुरू किए.

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फिर भी कोई निर्णायक सफलता खोज में नहीं मिली. हालांकि, प्रत्येक अभियान में सोनार ऑपरेटरों ने किसी न किसी प्रकार की बड़ी, गतिशील जलमग्न चीज का पता लगाया. 1975 में, एक अन्य अभियान ने लोच नेस में सोनार और जलमग्न फोटोग्राफी को मिलाकर किया. परिणामस्वरूप एक तस्वीर प्राप्त हुई, जिसे संवर्धित करने के बाद, उसमें एक जलीय जीव के विशाल पंख जैसी कोई आकृति अस्पष्ट रूप से दिखाई दी.

1980 और 1990 के दशक में किए गए आगे के सोनार अभियानों से भी कोई परिणाम प्राप्त नहीं हुए. 1994 में यह खुलासा हुआ कि 1934 की प्रसिद्ध तस्वीर पूरी तरह से फर्जी थी, लेकिन इससे लोच नेस के पौराणिक जीव के प्रति पर्यटकों और जांचकर्ताओं का उत्साह थोड़ा ही कम हुआ. आज भी इसकी खोज जारी है.

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