गंगोरी के पास भरभरा कर टूट गए पुल की वजह से गंगोत्री धाम से और इंडो चीन बॉर्डर से जो संपर्क टूट गया था वो वैकल्पिक तौर पर बहाल कर दिया गया है. 15 घंटे में शुरू किए गए वैकल्पिक राष्ट्रीय राजमार्ग को 36 बॉर्डर रोड टास्क फोर्स (BRTF) प्रोजेक्ट शिवालिक ने पूरा किया. जिसमें प्रशासन की ओर से जिलाधिकारी और पुलिस अधिक्षक के अलावा अन्य एजेंसी का भी सहयोग रहा.
नदी के बीच बनाए गए इस पुल की मियाद वैसे बहुत लंबी नहीं है, क्योंकि अभी नदी में पानी कम है. लेकिन आने वाले वक्त में पानी बढ़ेगा. लिहाजा सरकारी तंत्र को तुरंत हरकत में आते हुए टूटे हुए ब्रिज को ठीक करना होगा.
कब टूटा था चीन सीमा को जोड़ने वाला ये ब्रिज
उत्तरकाशी के गंगोरी में गुरुवार सुबह करीब 7 बजे वैली ब्रिज के टूटने से जहां कई गावं और गंगोत्री धाम का संपर्क टूट गया था तो वहीं सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाली इंडो-चीन बॉर्डर से भी सड़क संपर्क टूट गया था. 2012 अगस्त के महीने में अस्सीगंगा क्षेत्र में आई आपदा के दौरान मुख्य पुल टूट जाने की वजह से इस वैली ब्रिज का निर्माण किया गया था. जिसमें एक समय में सिर्फ एक ही भारी वाहन को ले जाने की आज्ञा दी गई थी. जिससे इसके वजन के हिसाब से ही वाहन सुरक्षित पार जा सके. लेकिन गुरुवार को दो ट्रकों के एक साथ पुल के बीच में आ जाने की वजह से ये पुल भार सहन नहीं कर पाया और भरभरा कर नदी के बीचों बीच गिर गया. जिससे पूरी तरह से उत्तरकाशी जिले से लगती हुई इंडो-चीन सीमा से सड़क मार्ग टूट गया.
कब से है ये लापरवाही
3 अगस्त 2012 में अस्सीगंगा क्षेत्र में आई जबरदस्त आपदा भी 2013 जून की आपदा के समान ही हर किसी के जेहन में आज भी जिंदा है. उसी 3 अगस्त 2012 को ये पुल भी कागज़ की नाव की तरह बह गया था. जिसके बाद तमाम घोषणाओं के बाद भी इतना महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग का पुल पक्के तरीके से नहीं बन पाया. जबकि ये चारधामों में गंगोत्री धाम को तो जोड़ता ही है साथ ही चीन सीमा पर तैनात हमारे जाबांज जवानों को रसद भी इसी रास्ते से जाती है.

उत्तराखंड सचिवालय में बना है VIP पुल
भारत चीन सीमा पर भले ही मजबूत पुल न बना हो लेकिन हमारे उत्तराखंड में देहरादून सचिवालय की मुख्य बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग में जाने के लिए एक VIP पुल का निर्माण जरूर कर लिया गया है. सिर्फ 28 कदम की दूरी से बचने के लिए सरकारी बिल्डिंग को तोड़कर बीचों बीच एक ब्रिज खड़ा कर दिया गया है.
गौर करने वाली बात है कि एक पुल को जो सचिवालय में सिर्फ आराम तलबी के लिए बनाया गया वो सिर्फ 5 दिन में तैयार कर दिया गया. जबकि दूसरा पुल वो टूटे हुए 6 साल बीत गए और खानापूर्ति के लिए वैली ब्रिज बना दिया गया. अपने सही स्वरूप में आने के लिए वो आज भी इंतज़ार कर रहा है. जिससे सीधे तौर पर हमारी सुरक्षा जुड़ी है.
त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के लिए इस मुद्दे पर मंथन करने का समय जरूर है कि क्या जरूरी है. सरकारी आराम तलबी या फिर देश की सुरक्षा? क्योंकि एक तरफ शासन के वो अधिकारी हैं, जो कुछ कदम चलने से बचने के लिए इस निर्माण के जिम्मेदार हैं. दूसरी तरफ हमारे वो सैनिक हैं, जिनके लिए रसद समय पर पहुंचना सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है.