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निरंजनी अखाड़े के रविंद्र पुरी बने अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष, नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत के बाद से ख़ाली था पद

निरंजनी अखाड़े के सचिव रविंद्र पुरी महाराज को अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुना गया. प्रयागराज में हुई अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की बैठक के बाद इसकी घोषणा की गयी. इस चुनाव के लिए अखाड़ा परिषद दो भागों में बंट गया था.

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Akhada parishad elects New President
Akhada parishad elects New President
स्टोरी हाइलाइट्स
  • रविंद्र पुरी बने अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष
  • चुनाव के लिए हुआ था अखाड़ा परिषद का दो फाड़

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष के चुनाव को लेकर विवाद बढ़ने के बाद अब निरंजनी अखाड़े के सचिव रविंद्र पुरी महाराज को अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुना गया. प्रयागराज में हुई अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की बैठक के बाद इसकी घोषणा की गयी. निरंजनी अखाड़े के मुख्यालय में ये बैठक हुई थी. बैठक में 7 अखाड़े के प्रतिनिधि मौजूद रहे. बैठक में मौजूद संतों ने कहा कि एक अखाड़े ने चिट्ठी के जरिए अपना समर्थन दिया है. जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा, आवाहन अखाड़ा, नया उदासीन अखाड़ा प्रतिनिधि बैठक में शामिल हुए. जबकि निर्मल अखाड़े का बागी गुट भी बैठक में शामिल हुआ. निर्वानी अणि अखाड़े के बारे में कहा गया कि उन्होंने पत्र भेजकर समर्थन दिया है. 

हरिद्वार में हुई बैठक में महानिर्वाणी अखाड़े के रविंद्र पुरी को अध्यक्ष चुना गया था. उस समय मौजूद अखाड़ों में से कुछ ने ये आरोप लगाया था कि अखाड़ा परिषद के मौजूदा महामंत्री हरिगिरि उनकी बात को नहीं सुनते. उसके बाद से सुलह समझौते की कोशिश जारी थी. आज बैठक के बाद ये कहा गया कि 13 अखाड़ों में से 7 अखाड़े आज की बैठक के फैसले के समर्थन में हैं इसलिए निरंजनी अखाड़े के रविंद्र पुरी अध्यक्ष हैं. बैठक के बाद अग्नि अखाड़े की तरफ से शामिल सोमेश्वरानंद ने कहा कि 'सर्वसम्मति से रविंद्र पुरी का चुनाव किया गया है, उम्मीद है कि वो सबको साथ लेकर चलेंगे.'

नरेंद्र गिरि की मौत के बाद खाली हुआ था पद 

20 सितम्बर को नरेंद्र गिरि की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद बाघंबरी गद्दी के महंत के लिए विवाद चला. बलवीर गिरि के बाघाम्बरी गद्दी का महंत चुने जाने के बाद ये विवाद खत्म हुआ तो अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पद के लिए विवाद गहरा गया. अध्यक्ष पद को लेकर अखाड़ों में दो फाड़ हो गया और 7 अखाड़ों ने महानिर्वाणी अखाड़े के रविंद्र पुरी को अध्यक्ष घोषित कर दिया है. ये उस समय हुआ जब अखाड़ा परिषद के महामंत्री हरि गिरि ने 25 अक्टूबर की तारीख की घोषणा चुनाव को लेकर पहले ही कर दी थी. इससे एक बार फिर अखाड़ों में प्रतिद्वंद्विता और मतभेद उभर कर सामने आ गए हैं. 

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हरिद्वार में पहले गुट की बैठक में निर्मोही, निर्वानी, महानिर्वानी, दिगम्बर, अटल, बड़ा उदासीन और निर्मल अखाड़ा शामिल हुए थे. 25 तारीख तय होने के बाद पहले क्यों चुनाव किया इस पर उनका कहना था कि ‘अखाड़ा परिषद के चुनाव में उनको नज़रंदाज किया जाता रहा है.’आज की बैठक के बाद महामंत्री हरि गिरि ने कहा कि जल्दी ही अखाड़ा परिषद में जो मतभेद है वो दूर कर लिए जाएंगे.

आज की बैठक- निर्मल अखाड़े का बागी गुट शामिल

आज प्रयागराज में निर्धारित बैठक में महामंत्री हरि गिरि के नेतृत्व में अध्यक्ष चुना जाना तय हुआ. आज की बैठक में  जूना अखाड़ा, निरंजनी,आवाहन,अग्नि अखाड़ा, आनंद अखाड़ा और बड़ा उदासीन अखाड़ा के प्रतिनिधि शामिल रहे. वहीं निर्मल अखाड़े का एक गुट शामिल हुआ. उनका कहना था कि कोर्ट ने एक मामले में उसी गुट को वैध ठहराया है.

ऐसे होता है अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष का चुनाव 

अखाड़ा परिषद के चुनाव में सभी 13 अखाड़ों के 2-2 प्रतिनिधि शामिल होते हैं. इसमें अध्यक्ष पद के लिए कोई एक प्रतिनिधि किसी के नाम का प्रस्ताव करता है, फिर उस पर वोटिंग होती है. वोटिंग वोट डालकर या हाथ उठाकर भी हो सकती है. आम तौर पर ये पहले से ही तय हो जाता है कि कौन बनेगा अध्यक्ष और उसके बाद उसके नाम पर मुहर चुनाव के द्वारा लगती है. पर एक से ज्यादा दावेदार होने की स्थिति में ये चुनाव की प्रक्रिया होती है. तब जिनको ज़्यादा वोट पड़ते हैं वो अध्यक्ष मान लिया जाता है.

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ताकत और राजनीतिक रसूख दोनों की वजह से इस पद के लिए अखाड़े हमेशा कोशिश करते हैं. अखाड़ा परिषद का गठन कुम्भ के दौरान ढहाई स्नान में अखाड़ों के विवाद के निपटारे और एक समन्वय बनाने के लिए किया गया था. अखाड़ा परिषद की ताक़त का अंदाज़ा इस बात से लागया जा सकता है कि ये लोग किसी संत महंत के बहिष्कार तक ही घोषणा करते हैं तो वहीं बड़े बड़े फ़ैसले भी करते हैं. कुम्भ में साधु संतों के लिए व्यवस्था करने का सरकार पर दबाव भी अखाड़ा परिषद का होता है. इसीलिए इसके अध्यक्ष पद पर काबिज होने के लिए जोर आजमाइश होती है और अकसर ये विवाद का विषय बनता है.

नरेंद्र गिरि खुद अध्यक्ष बने थे तब भी विवाद हुआ था. महंत ज्ञानदास उनके मुकाबले में खड़े हुए थे. तब नरेंद्र गिरि को 7अखाड़ों का समर्थन मिला था जबकि ज्ञानदास को सिर्फ एक कम 6 अखाड़ों का समर्थन मिला था. इससे नरेंद्र गिरि को अध्यक्ष मान लिया गया था.

 

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