आंध्र प्रदेश को काटकर अलग तेलंगाना राज्य पर कांग्रेस और यूपीए की मुहर लगने के बाद बाकी जगहों से भी अलग राज्य की मांग जोर पकड़ रही है. ऐसी ही मांगों में लंबे समय से चली आ रही बुंदेलखंड राज्य की मांग भी शामिल है.
तेलंगाना पर फैसला होने के बाद बुंदेलखंड राज्य के समर्थन में नेताओं के बयानों की झड़ी लग गई है. लेकिन ये मांग कितनी हवा-हवाई है इसे नेताओं के संसद में किए आचरण से देखा जा सकता है.
मौजूदा लोकसभा में बुंदेलखंड क्षेत्र के बारे में 14 सवाल पूछे गए, लेकिन उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड वाले इलाके के एक भी सासंद ने लोकसभा में अलग बुंदेलखंड राज्य बनाने के विषय पर कोई सवाल नहीं किया.
झांसी के कांग्रेस सांसद प्रदीप जैन आदित्य केंद्र में मंत्री हैं. हाल ही में बीएसपी से निलंबित हुए हमीरपुर के सांसद विजय बहादुर सिंह और सपा के जालौन और बांदा से सांसद क्रमश: घनश्याम अनुरागी और आरके सिंह पटेल ने इस बारे में लोकसभा में एक भी सवाल नहीं पूछा, जबकि मीडिया से बातचीत में इनमें से कोई भी नेता बुंदेलखंड राज्य का विरोध नहीं करता.
उधर, राज्यसभा में बुंदेलखंड से जुड़े तीस सवाल पूछे गए. इसमें बीएसपी के पूर्व राज्यसभा सांसद गंगाचरण राजपूत ने ही दिसंबर 2009 में एक बार अलग बुंदेलखंड राज्य के बारे में सरकार से सवाल किया था. 31 जुलाई से झांसी से अलग बुंदेलखंड की मांग नए सिरे से उठाने जा रहे राजपूत ने 2011 में इस बारे में प्राइवेट मेंबर बिल भी पेश किया था.
लेकिन निर्णायक मंच पर सांसदों की इस चुप्पी के भरोसे क्या वाकई बुंदेलखंड राज्य कभी बन पाएगा? या इस इलाके की 1.5 करोड़ जनता सिर्फ चुनावी पैकेजों की राजनीति ही झेलती रहेगी.