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बुंदेलखंड: 'गगरी न फूटे, चाहे खसम मर जाए..'

उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र के जंगली गांवों की हर वनवासी महिलाओं की जुबान से अनायास यह कहावत निकल जाती है, 'गगरी न फूटे, चाहे खसम मर जाए..'

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उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र के जंगली गांवों की हर वनवासी महिलाओं की जुबान से अनायास यह कहावत निकल जाती है, 'गगरी न फूटे, चाहे खसम मर जाए..'

दरअसल, पाठा क्षेत्र में पानी के लिए हाहाकार मचा है. तमाम सरकारी प्रयासों के बाद भी पेयजल संकट से निजात नहीं मिल पाई है. प्राकृतिक जलस्रोतों के सूख जाने से यहां के लोग बूंद-बूंद पानी के लिए पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के गांवों पर आश्रित हो गए हैं.

यह क्षेत्र हमेशा पेयजल संकट से जूझता रहा है. यहां पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल से एशिया की सबसे बड़ी पेयजल योजना की शुरुआत की गई, लेकिन यह योजना भी पाठावासियों को पर्याप्त पानी नहीं दे पाई. सबसे ज्यादा उन गांवों की हालत खस्ता है, जो पहाड़ियों के बीच में बसे हैं. यहां लोग प्राकृतिक जलस्रोतों के जरिए ही अपना हलक तर करते आए हैं.

मध्य प्रदेश की सरहद से लगे गोबरी, गोड़रामपुर, बघोलन, राजा डाड़ी, कारी डाड़ी, मवासी डेरा, मवइया, बिलरियामठ, जरैला जैसे करीब तीन दर्जन गांव के करीब नौ सौ वनवासी परिवार विंध्य पर्वत श्रेणी से निकलने वाले कणली नाला और बाण गंगा के झरने से पानी का इंतजाम करते आए हैं. हर साल की तरह ये दोनों झरने सूख चुके हैं.

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इन गांवों में लगवाए गए तकरीबन सभी सरकारी हैंडपंप पानी देना बंद कर चुके हैं. अब यहां के लोग सरहद पार कर मध्य प्रदेश के गांवों में बैलगाड़ी या साइकिल से जाकर पानी लाते हैं और अपनी जरूरतें पूरी करते हैं.

मवासी डेरा गांव के रहने वाले मइयादीन खैरगर ने बताया, 'पथरीली चट्टानों की वजह से गहराई तक बोर न कर बीस फीट तक की गहराई वाले हैंडपंप लगे हैं. इनमें से लगभग सभी हैंडपंप पानी के बजाय हवा फेंककर प्यासों का मुंह चिढ़ाते हैं.'

उन्होंने बताया, 'हम लोग तड़के से बैलगाड़ी या साइकिल के जरिए दो से तीन किलोमीटर का जंगली सफर तय कर मध्य प्रदेश के गांवों से पानी ढोते हैं.'

इसी गांव की महिला रतिया से जब पानी के संकट के बारे में पूछा गया तो उसकी जुबान से कहावत निकली, 'गगरी न फूटे, चाहे खसम मर जाए.' इस महिला की कहावत से स्पष्ट है कि वनवासी महिलाएं पेयजल संकट से कितनी दुखी हैं.

उपजिला अधिकारी अतर्रा सुनील वर्मा कहते हैं कि राजस्व अधिकारी व कर्मचारियों की टीम पाठा के इन गांवों में भेजी गई है, बिगड़े हैंडपंप सुधारे जा रहे हैं.

वहीं, अपर जिलाधिकारी बांदा (वित्त एवं राजस्व) केदारनाथ सिंह का कहना है कि जंगली गांवों में बसे वनवासियों को पानी उपलब्ध कराने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं, जरूरत पड़ी तो टैंकरों से पानी भेजा जाएगा.'

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