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'हिन्दी दिवस' पर खास: 3 पीढ़ियों से हिन्दी की सेवा कर रहा है यह परिवार, राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है ख्याति

भारतीय डाक विभाग में वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्ट मास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव भी उन्हीं चंद लोगों में शुमार हैं, जो लगातार हिन्दी की सेवा करते चले आ रहे हैं.

 3 पीढ़ियों से हिन्दी की सेवा कर रहा है यह परिवार 3 पीढ़ियों से हिन्दी की सेवा कर रहा है यह परिवार
स्टोरी हाइलाइट्स
  • हिन्दी की सेवा कर रहे कृष्ण कुमार यादव
  • आधा दर्जन से ज्यादा लिख चुके हैं किताबें

हिन्दी दिवस न केवल देश में, बल्कि विश्व के कोने-कोने में हिन्दी भाषियों के बीच एक पर्व के रूप में मनाया जा रहा है, लेकिन ऐसे बहुत कम लोग हैं, जो हिन्दी की सेवा में न केवल एक पीढ़ी, बल्कि 3-3 पीढ़ियों से लगे हुए हैं. भारतीय डाक विभाग में वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्ट मास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव भी उन्हीं चंद लोगों में शुमार हैं, जो लगातार हिन्दी की सेवा करते चले आ रहे हैं और उन्हें इसकी प्रेरणा अपने पिता से मिली और अब उनकी दोनों बेटियां भी अपनी लेखनी के जरिए मातृभाषा और राजभाषा के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं. पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जाने पहचाने हिन्दी ब्लॉगर के रूप में है और उन्होंने अपनी नौकरी में रहते हुए आधा दर्जन से ऊपर हिन्दी पर किताबें लिख दिए हैं और तो और उनके ऊपर खुद भी एक किताब लिखी जा चुकी है. उनकी बच्ची को भी मात्र साढ़े 4 साल की उम्र में ही सबसे कम उम्र की ब्लॉगर के रूप में राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है. 

आज जब बच्चे और युवा हाथ मोबाइल पर सोशल मीडिया गेम और यूट्यूब से जकड़े देखने को मिल जाते हैं तो वही नौवीं में पढ़ने वाली अक्षिता अपने खुद के हिन्दी ब्लॉग 'पाखी की दुनिया' के लिए न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया में भी सराही जाती है और लगातार ब्लॉक पर लिखने के अलावा अन्य प्लेटफॉर्म पर भी लिखती रहती है. मात्र साढे 4 साल की उम्र में ही अक्षिता को सबसे कम उम्र की ब्लॉगर के लिए राष्ट्रीय बाल पुरस्कार भी मिल चुका है. अक्षिता की छोटी बहन अपूर्वा भी कम नहीं है. वह भी कहानियों से लेकर कविताएं भी लिखती रहती हैं और कोरोना पर भी उन्होंने नन्ही उम्र में कविता काफी वाहवाही लूटी है. दरअसल यह दोनों बच्चियां तीसरी पीढ़ी है उस परिवार की जो लगातार हिन्दी भाषा के क्षेत्र में सेवारत है. अक्षिता और अपूर्वा के पिता कृष्ण कुमार यादव भारतीय डाक विभाग में क्लास वन के अफसर हैं और वाराणसी परिक्षेत्र में सबसे सर्वोच्च पद पोस्ट मास्टर जनरल पर है. 

भारतीय डाक विभाग
भारतीय डाक विभाग

'दादा, पापा-मम्मी से मिली हिन्दी में लिखने की प्रेरणा'
अक्षिता बताती हैं कि उनको हिन्दी में लिखने की प्रेरणा अपने दादा, पापा और मम्मी से मिली है. छोटी सी उम्र में बड़ी सोच रखने वाली अक्षिता बताती है कि बहुत ज्यादा समय इंटरनेट और वर्चुअल दुनिया में बिताने पर रचनात्मकता खत्म होने लगती है. इसके साथ ही उन्हें अपनी मातृभाषा पर काफी गर्व और सम्मान महसूस होता है. अक्षिता बताती हैं कि वह भले ही कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रही हैं, लेकिन इसके साथ ही उन्हें हिन्दी में लिखना पढ़ना काफी अच्छा लगता है और वह दोनों भाषाओं का संतुलन बना कर चलती हैं. तो वही तीसरी पीढ़ी की सबसे कम उम्र की नन्ही अपूर्वा बताती हैं कि उन्हें हिन्दी में कविता लिखना काफी अच्छा लगता है और उन्होंने कोरोना पर भी कविता लिखी है जिसे काफी सराहा गया.

अक्षिता को प्रथम अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन, नई दिल्ली में भारत के पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने ‘श्रेष्ठ नन्ही ब्लॉगर‘ सम्मान से अलंकृत किया, तो अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका (2015) में भी अक्षिता को “परिकल्पना कनिष्ठ सार्क ब्लॉगर सम्मान” से सम्मानित किया गया. अपूर्वा ने भी कोरोना महामारी के दौर में अपनी कविताओं से लोगों को सचेत किया.

पूर्वांचल के जौनपुर जनपद के मछली शहर तहसील के छोटे से गांव सरावां से आने वाले भारतीय डाक विभाग में वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव नहीं अपनी शिक्षा हिन्दी माध्यम से ही गांव से शुरुआत की थी इसके बाद आगे की शिक्षा उन्होंने आजमगढ़ से पूरी की और फिर इलाहाबाद में रहकर उच्च शिक्षा को प्राप्त किया लेकिन अंग्रेजी की जरूरतों ने उनकी हिन्दी के प्रेम को कभी कम नहीं होने दिया क्योंकि हिन्दी में लिखते रहने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता राम शिव मूर्ति यादव से मिली जो स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी के तौर पर सरकारी नौकरी में थे. पिता की प्रेरणा के अलावा उनकी पत्नी आकांक्षा यादवभी हिन्दी में लेखन किया करती हैं और अब तक तीन किताबों को भी लिख चुकी हैं.

भारतीय डाक विभाग के वरिष्ठ अधिकारी एवं सम्प्रति वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव के परिवार में उनके पिता राम शिव मूर्ति यादव के साथ-साथ पत्नी सुश्री आकांक्षा यादव और दोनों बेटियाँ अक्षिता और अपूर्वा भी हिन्दी को अपने लेखन से लगातार नए आयाम दे रहे हैं. देश-विदेश में तमाम सम्मानों से अलंकृत यादव परिवार की रचनाएं प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के साथ रेडियो और दूरदर्शन पर भी प्रसारित होती रहती हैं. हिन्दी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में इस परिवार का नाम अग्रणी है. 

कृष्ण कुमार यादव का परिवार
कृष्ण कुमार यादव का परिवार

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन पश्चात वर्ष 2001 में हिन्दी माध्यम से अपने प्रथम प्रयास में ही भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन पश्चात कृष्ण कुमार यादव सूरत, कानपुर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, प्रयागराज, जोधपुर, लखनऊ व वाराणसी में विभिन्न पदों पर पदस्थ रहे हैं. 

प्रशासनिक सेवा के दायित्वों के निर्वहन के साथ कृष्ण कुमार यादव की अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने, अनुभूतियाँ और विमर्श (निबंध संग्रह), क्रांति यज्ञ : 1857-1947 की गाथा, जंगल में क्रिकेट (बाल गीत संग्रह) एवं 16 आने - 16 लोग सहित कुल सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक - साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता व प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु शताधिक सम्मान प्राप्त श्री यादव को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल भी सम्मानित कर चुके हैं.

कृष्ण कुमार यादव के पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव हिन्दी में निरंतर लेखन कार्य कर रहे हैं. वहीं पत्नी आकांक्षा यादव की भी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज द्वारा प्रकाशित आधी आबादी के सरोकार इनकी चर्चित पुस्तक है. 'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दम्पति' सम्मान से विभूषित यादव दम्पति को नेपाल, भूटान व श्रीलंका में आयोजित 'अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन' में “परिकल्पना ब्लॉगिंग सार्क शिखर सम्मान” सहित अन्य सम्मानों से नवाजा जा चुका है. जर्मनी के बॉन शहर में ग्लोबल मीडिया फोरम (2015) के दौरान 'पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड' श्रेणी में सुश्री आकांक्षा यादव के ब्लॉग 'शब्द-शिखर' को हिन्दी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग के रूप में भी सम्मानित किया जा चुका है. कृष्ण कुमार यादव बताते हैं कि आज डिजिटल दुनिया में हिन्दी भाषा ने नए आयाम गढ़े हैं. चाहे सोशल मीडिया हो चाहे व्हाट्सएप हो हिन्दी का अपना ही एक महत्व है.

 

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