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अखिलेश यादवः समझ आते आते बहुत देर कर दी

राजनीति में अक्सर ऐसा होता है कि नाक तक पानी आने के बाद हाथ चलाने वाले डूबते हैं. ऐसा कहने के परिपेक्ष्य में उत्तर प्रदेश की राजनीति का महाघमासान है. अखिलेश यादव चुनाव की दहलीज पर खड़े हैं और इस संक्रमणकाल में उन्हें अपनी रीढ़ की सुध हो आई है. शिवपाल यादव से मंत्रालय छीनकर अखिलेश संदेश देना चाह रहे हैं कि वो कोई असहाय और बंधे हाथों वाले मुख्यमंत्री नहीं हैं, गलत तो वो अपने कुनबे का बर्दाश्त नहीं करेंगे, बाकी के मंत्री, विधायक क्या चीज हैं.

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राजनीति में अक्सर ऐसा होता है कि नाक तक पानी आने के बाद हाथ चलाने वाले डूबते हैं. ऐसा कहने के परिपेक्ष्य में उत्तर प्रदेश की राजनीति का महाघमासान है. अखिलेश यादव चुनाव की दहलीज पर खड़े हैं और इस संक्रमणकाल में उन्हें अपनी रीढ़ की सुध हो आई है. शिवपाल यादव से मंत्रालय छीनकर अखिलेश संदेश देना चाह रहे हैं कि वो कोई असहाय और बंधे हाथों वाले मुख्यमंत्री नहीं हैं, गलत तो वो अपने कुनबे का बर्दाश्त नहीं करेंगे, बाकी के मंत्री, विधायक क्या चीज हैं.

लेकिन चेतना का सूर्य उगते-उगते इतनी देर हो गई है कि अब सुखाने के लिए कुछ बचा नहीं है. साढ़े चार साल से अखिलेश जिस छवि को अपने कंधे पर बोझ की तरह ढोते हुए आगे बढ़ रहे हैं वो है पंच परमेश्वर की सरकार में एक लाचार मुख्यमंत्री बने रहना. अपने प्रति इस धारणा को तोड़ने का सबसे बड़ा प्रयास उनका शिवपाल के साथ मोर्चा खोलना है. लेकिन अफसोस, साढ़े चार साल बाद.

ऐसा तब नहीं था जब वो साइकिल से सत्ता तक पहुंचे थे. 2012 से पहले अखिलेश ने काफी मेहनत करके अपने लिए ज़मीन तैयार की थी. इस मेहनत का फल 2012 के जनादेश के रूप में मिला. केंद्र की ओर उम्मीदों के चश्मे से देख रहे पिता ने सहज ही सूबे की बागडोर अपने बेटे को सौंप दी. अखिलेश बार-बार दोहराते आए थे कि पहले की गलतियों को भूल जाइए. यह युवा सोच और नेतृत्व का वादा था जो लोगों के बीच उम्मीद बनकर बहा था.

लेकिन अखिलेश के आने से लेकर अबतक लगातार सबकुछ वैसा होता रहा जैसा कि समाजवादी पार्टी का चरित्र रहा है. राज्य सरकार की छवि और कार्यशैली में अखिलेश कम और सपा ज़्यादा दिखाई देते रहे. एक जाति विशेष के प्रेम में बाकी वर्ग नाराज़ होते रहे. अखिलेश को घेरकर खड़े चाचा और मामा अपनी अपनी दिशा में अपने अपने रथ लिए बेलगाम बढ़ते रहे. यहां तक कि अखिलेश की इच्छा के विरुद्ध लोग पार्टी में वापस आए, पद पाते रहे, नियुक्तियां होती रहीं और इन सबके बीच काम करते हुए भी अखिलेश कमज़ोर ही बने रहे.

साख पर बट्टा
आज अखिलेश के पास तमाम कमियों वाली सरकार के बावजूद कुछेक उपलब्धियां भी हैं. ये उपलब्धियां खासकर उनके अपने प्रयासों की वजह से हैं. लेकिन उपलब्धियों का यह कालपात्र उनके लिए छवि निर्माण का काम नहीं कर सका. अखिलेश जिस बात को दोहराते हुए सत्ता में आए थे, वो ही उन्होंने खो दिया. एक नएपन का विश्वास, एक प्रतिबद्ध युवा नेतृत्व, नई सोच और नई दिशा का वादा इन साढ़े चार वर्षों में धूमिल पड़ता गया.

अखिलेश को यह एहसास होते होते बहुत देर हो चुकी है कि पानी अब उनके सिर चढ़ने लगा है. एक पिता बिना बताए या पूछे अन्य दबंग नेताओं को अपने साथ लाने के प्रयासों को हरी झंडी दिखाता रहा. अखिलेश के लिए इससे बड़ा अपमान क्या रहा होगा कि उनको प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के पहले बताया या पूछा तक नहीं गया. अखिलेश मुलायम सिंह यादव के केवल बेटे भर नहीं हैं, उनके उत्तराधिकारी भी हैं और राज्य के मुख्यमंत्री भी. इस कद और पद की मर्यादा को ऐसे रौंद दिया गया जैसे वो मिठाई के लिए मेले में जिद करते एक छोटे बच्चे हों.

इस तिलमिलाहट के खिलाफ अखिलेश मुखर हुए. संगठन पर सबसे मज़बूत पकड़ वाले हाथों से उन्होंने मंत्रालय छीन लिए. एक मज़बूत संदेश दिया कि वो और उनकी सरकार रिमोट से नहीं चल रही और न ही उनके फैसले लेने की क्षमता लकवाग्रस्त है. लेकिन अफसोस, अखिलेश गेंहू सुखाने के लिए तब छत पर खड़े दिख रहे हैं जब आसमान में घटाटोप छाया हुआ है. चुनाव दहलीज पर हैं. समाजवादी पार्टी भले ही ताज़ा संकट का कुछ समाधान निकाल ले, अखिलेश की छवि को खासा नुकसान हो चुका है. अबतक सब होते देने रहने और अब देर से सिर उठाने का खामियाजा अखिलेश टाल नहीं सकते.

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