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जोमैटो विवाद के बाद राइट टू च्वॉइस ऑफ फूड की बहस, जानिए क्या कहता है कानून

इस मामले में लॉ प्रोफेसर डॉ राजेश दुबे और एडवोकेट मार्कंडेय पंत का कहना है कि सभी को अपनी पसंद का खाना खरीदने और खाने का मौलिक अधिकार है. इसके अलावा कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 1986 के तहत कस्टमर को वस्तुओं को चुनने का अधिकार दिया गया है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

ऑनलाइन फूड वेबसाइट जोमैटो पर अमित शुक्ला नाम के शख्स ने खाना ऑर्डर किया, लेकिन जब उनको मैसेज के जरिए पता चला कि गैर हिंदू डिलीवरी ब्वॉय उनका खाना लेकर आ रहा है, तो उन्होंने खाने का ऑर्डर कैंसल कर दिया. इसके बाद जोमैटो ने रिफंड करने से इनकार कर दिया. अमित शुक्ला ने जोमैटो को टैग करते हुए इस मामले को ट्वीट कर दिया. साथ ही उन्होंने कहा कि जोमैटो फूड डिलीवरी लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है.

वहीं, जोमैटो ने रिफंड देने से इनकार करते हुए कहा कि खाना का कोई धर्म नहीं होता है. यह अपने आप में धर्म है. देखते ही देखते इस मामले ने तूल पकड़ लिया और राइट टू च्वॉइस ऑफ फूड बनाम धार्मिक भेदभाव को लेकर बहस छिड़ गई. इस मसले के सामने आने के बाद से सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी कस्टमर को यह अधिकार है कि वो इसका चुनाव कर सके कि उसको किससे खाना खरीदना है और किससे नहीं खरीदना है?

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इस मामले में लॉ प्रोफेसर डॉ राजेश दुबे और एडवोकेट मार्कंडेय पंत का कहना है कि सभी को अपनी पसंद का खाना खरीदने और खाने का मौलिक अधिकार है. इसके अलावा कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 1986 के तहत कस्टमर को वस्तुओं को चुनने का अधिकार दिया गया है. कोई दुकानदार या ऑनलाइन वेबसाइट किसी को कोई खाना या सामान खरीदने और डिलीवरी लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है.

लॉ प्रोफेसर डॉ राजेश दुबे का कहना है कि अमित शुक्ला को खाना के ऑर्डर को कैंसल करने का कानूनी अधिकार है और जोमैटो उनको खाना लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है. हालांकि अगर अमित शुक्ला ने खाना की डिलीवरी लेने से इसलिए इनकार कर दिया, क्योंकि डिलीवरी ब्वॉय मुस्लिम था, तो यह धर्म के आधार पर भेदभाव माना जा सकता है. संविधान में धर्म के आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं है.

अमित शुक्ल ने 30 जुलाई को जो ट्वीट किया उसमें लिखा था 'अभी-अभी जोमैटो पर एक ऑर्डर कैंसल कर दिया क्योंकि वे एक गैर-हिंदू राइडर को खाना पहुंचाने मेरे पास भेज रहे थे. उन्होंने कहा कि वे राइडर चेंज नहीं कर सकते और ऑर्डर कैंसल करने पर रिफंड भी नहीं करेंगे. मैंने कहा कि आप मुझे डिलीवरी लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकते. मैं रिफंड नहीं चाहता हूं, बस कैंसल कर दीजिए'

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लॉ प्रोफेसर डॉ राजेश दुबे का कहना है कि सभी को राइट टू च्वॉइस ऑफ फूड का अधिकार है, लेकिन इसकी आड़ में किसी को दूसरे के धार्मिक अधिकारों के हनन की इजाजत नहीं दी जा सकती है. डॉ राजेश दुबे और एडवोकेट मार्कंडेय पंत के मुताबिक अगर ऐसा करने से दो समुदाय के बीच सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की आशंका पैदा होती है, तो मामले में पुलिस आईपीसी की धारा 153B के तहत कार्रवाई कर सकती है. इस धारा के तहत तीन साल जेल की सजा और जुर्माना दोनों का प्रावधान किया गया है.

अमित शुक्ला को पुलिस ने भेजा नोटिस

इस मामले में पुलिस ने अमित शुक्ला को नोटिस जारी किया है. जबलपुर के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि डिलीवरी ब्वॉय के धर्म को लेकर फूड ऑर्डर कैंसल करने वाले अमित शुक्ला को नोटिस जारी किया गया है. उनको चेतावनी दी जाएगी. अगर अमित शुक्ला कोई ऐसा ट्वीट करते हैं, जो संविधान के आदर्श के खिलाफ है, तो उनके खिलाफ एक्शन लिया जाएगा. उन पर निगरानी रखी जा रही है.

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