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मुफ्त इंटरनेट बांटने के पीछे क्या है जकरबर्ग की चाल?

जिस देश के आधे से ज्यादा लोगों को इंटरनेट का 'आई' भी नहीं पता उनके लिए मुफ्त इंटरनेट लाने की मार्क जकरबर्ग की महात्वाकांक्षी योजना की लुटिया डूबती हुई दिख रही है. सवाल ये है कि जिस देश में आधे से ज्यादा लोग इंटरनेट का 'आई' भी न जानते हों उन्हें मुफ्त में इंटरनेट देकर जकरबर्ग अपना कौन सा मकसद पूरा करना चाहते हैं?

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फेसबुक के CEO मार्क जकरबर्ग
फेसबुक के CEO मार्क जकरबर्ग

जिस देश के आधे से ज्यादा लोगों को इंटरनेट का 'आई' भी नहीं पता उनके लिए मुफ्त इंटरनेट लाने की मार्क जकरबर्ग की महात्वाकांक्षी योजना की लुटिया डूबती हुई दिख रही है. सवाल ये है कि जिन लोगों के लिए जकरबर्ग इंटरनेट सुविधा देने की बात कह रहे हैं, क्या उन्हें वाकई इसकी जरूरत है? जिस देश में आधे से ज्यादा लोग इंटरनेट का 'आई' भी न जानते हों उन्हें मुफ्त में इंटरनेट देकर जकरबर्ग अपना कौन सा मकसद पूरा करना चाहते हैं?

जून तक के आंकड़ों के मुताबिक, देश में इंटरनेट के कुल यूजर करीब 35 करोड़ हैं और फेसबुक के करीब 12.5 करोड़ से ज्यादा यूजर हैं, जबकि देश की आबादी 1.28 अरब के आसपास है. अब सोचिए कि जब फेसबुक और कुल इंटरनेट यूजर्स के बीच इतना फासला है तो उन लोगों तक इंटरनेट कैसे पहुंचाएंगे, जिनकी इंटरनेट को लेकर समझ बिल्कुल भी नहीं है, वो भी 'फ्री' में.

ये कैसे इस्तेमाल करेंगे मुफ्त इंटरनेट?
दरअसल, सबके लिए इंटरनेट बांटने का बीड़ा उठाने से पहले जकरबर्ग को यह जान लेना चाहिए कि यहां लोग एक पाई नहीं खर्च करना चाहते और सारा मजा ले लेना चाहते हैं, फिर गांव-गांव में इंटरनेट पहुंचा भी देंगे तो क्या होगा? फ्री में लोग सिर्फ फेसबुक ही चला पाएंगे और बहुत होगा तो कैंडी क्रश डाउनलोड करके बाकियों का जीना हराम करेंगे. गांव में बैठा किसान जो फीचर मोबाइल पर नंबर डायल करना भी नहीं सीख पाया इतने सालों में, वह इंटरनेट का क्या करेगा? एक मिनट के लिए मान भी लें कि किसान की जगह उसका बेटा इंटरनेट का इस्तेमाल करेगा... लेकिन वह भी क्या करेगा. जिस देश के स्कूलों में पांचवीं क्लास का लड़का भी एबीसीडी न लिख पाता हो वो इंटरनेट पर क्या सर्च करेगा, यह तो समझ से परे है. जहां लोग एक टाइम खाने के जुगाड़ में पूरा दिन गुजार देते हैं, जहां लोग कई-कई दिन पानी पीकर सो जाते हैं, इनके लिए इंटरनेट का कोई मतलब नहीं है. बाकी जिसे जरूरत है, वो इसका इस्तेमाल कर रहा है, भले ही रो-धो कर ही सही.

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एक बात और, हमारे देश के लड़के हैं बहुत होशियार. अच्छे-अच्छे सर्वर में प्रॉक्सी डाल के अपने काम की चीज ढूंढ़ ही लेते हैं, तो इस मामले में कहां से चूकने वाले हैं. ये मत सोचिए कि वो लिमिटेड साइट्स में अटक जाएंगे और फेसबुक पर लाइक -लाइक खेलने लगेंगे. और अगर ये सोचते हैं कि कोई इंटरनेट का बिल भरेगा तो भूल जाइए, यहां बैलेंस से 1 रुपया कटने पर तो लोग PORT का मैसेज भेजकर मोबाइल कंपनी के प्राण संकट में डाल देते हैं, इंटरनेट का महंगा बिल कौन भरेगा?

रिलायंस भी है एक बाधा
internet.org के रास्ते में बाधा साथी नेटवर्क रिलायंस भी है. जिसका नेटवर्क शहरी इलाकों में भी ठीक से काम न करता हो, वह सुदूर गांवों में मुफ्त इंटरनेट कैसे दे देगा? यहां तो अच्छे-अच्छे ऑफिसों में इंटरनेट का हाल ऐसा है कि टैब पर सर्च सेलेक्ट करके लोग चाय पीने चले जाते हैं और लौट के आते हैं तो भी सर्चिंग वाला गोला घूमता मिलता है. तो गांवों और जंगल वाले इलाकों में इंटरनेट का क्या हाल होगा, ये भी सोचा जा सकता है.

इसमें कोई शक नहीं कि देश में मोबाइल यूजर बढ़ रहे हैं, लेकिन उसमें से कितने लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल स्मार्टली करते हैं, ये बता पाना मुश्किल है. और क्या है कि जकरबर्ग अपनी नई दुकान के जरिए फेसबुक का यूजर ट्रैफिक बढ़ाना चाहते हैं लेकिन दिन भर खेत में काम करने वाला आदमी, या रिक्शा चलाने वाला शख्स फुर्सत में अपने स्मार्टफोन से सिर्फ गाना सुन सकता है, फेसबुक पर लाइक-अनलाइक करने नहीं आएगा.

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internet.org क्या है?
internet.org, फेसबुक की ही एक अन्य कंपनी है. internet.org के जरिए गरीब तबके के लोगों को इंटरनेट से जोड़ना ही इस कंपनी का मकसद है. दुनिया भर में सुदूर गांवों में स्थानीय भाषाओं में इंटरनेट की सुविधा दी जाएगी, ऐसा इस कंपनी का दावा है और इसके लिए मोबाइल ऑपरेटर और सरकार के समर्थन की जरूरत है. इसमें हेल्थ, करियर, एजुकेशन जैसी जानकारियों के अलावा मैसेजिंग की सुविधा भी मुफ्त में मिलेगी. भारत के छह राज्यों में इसका इस्तेमाल शुरू किया गया है जिनमें- तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना शामिल हैं.

विवाद उठा तो जकरबर्ग ने दी सफाई
फेसबुक के मालिक मार्क जकरबर्ग ने जब internet.org को लॉन्च किया तब से लेकर अब तक यह विवादों में है. हाल ही में डि़जिटल इंडिया से इसे जोड़ने की मार्क जकरबर्ग की कोशिश नाकाम हो चुकी है. जकरबर्ग का मानना है कि दुनिया में हर किसी को इंटरनेट एक्सेस का अधिकार है और उसके पास इंटरनेट होना चाहिए, इसीलिए वह अपनी इस मुहिम के तहत लोगों को मुफ्त इंटरनेट उपलब्ध कराने की कोशिश में हैं.

सवाल ये है कि internet.org के जरिए जो कंपनी मुफ्त में इंटरनेट उपलब्ध कराएगी उसका क्या फायदा होगा? साथ ही उन लोगों और ऑपरेटरों का क्या होगा, जो इन इलाकों में पहले से सक्रिय हैं. 17 अप्रैल 2015 को मार्क जकरबर्ग ने अपने एक फेसबुक स्टेटस में लिखा था कि internet.org की वजह से नेट न्यूट्रलिटी को कोई खतरा नहीं है. उनका मानना है कि जो लोग इंटरनेट के इस्तेमाल से वंचित हैं अगर उन्हें मुफ्त में इंटरनेट एक्सेस दिया जा रहा है तो इसमें बुराई क्या है? जकरबर्ग ने यह भी कहा कि internet.org के जरिए कुछ वेबसाइट्स फ्री करने का उद्देश्य यह नहीं है कि यूजर कुछ और नहीं देख सकता. अगर यूजर को लगता है कि इससे इतर भी कुछ देखा जा सकता है तो वह देख सकता है. साथ ही इसके लिए सभी मोबाइल ऑपरेटर कंपनियों के भी दरवाजे खुले हैं.

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ये है जकरबर्ग का असली मकसद
इसी साल जुलाई में फेसबुक की सीओओ शेरिल सैंडबर्ग ने भारत का दौरा किया और तभी उन्होंने साफ संकेत दिए थे कि भारत में फेसबुक के लिए अपार संभावनाएं हैं. जिस रफ्तार से भारत में फेसबुक यूजर बढ़ रहे हैं, वह कंपनी के लिए काफी अच्छा है. सैंडबर्ग ने यह कहा भी था कि भारत में फेसबुक का सबसे बड़ा बाजार बनने की तमाम संभावनाएं उन्हें दिखती हैं. यानी फेसबुक हर संभव कोशिश के जरिए भारत पर सबसे बड़ा कारोबार स्थापित करना चाहता है. internet.org का मकसद भी यही है कि लोग मुफ्त के इंटरनेट के जरिए फेसबुक का इस्तेमाल करें और इससे भारत में फेसबुक का बाजार मजबूत हो.

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