scorecardresearch
 

बोलने लगीं व्यापम की मौतें...

घोटाले से जुड़े लोगों की मौत के मामले जिस तेजी से बढ़े हैं उससे बचे हुए आरोपी, गवाह और जांच अधिकारियों को अपनी जान की फिक्र सताने लगी है.

शि‍वराज सिंह चौहान की फाइल फोटो शि‍वराज सिंह चौहान की फाइल फोटो

मध्य प्रदेश के रीवा के विजय पटेल इंदौर से 100 किमी उत्तर-पूर्व में शाजापुर जेल में फार्मासिस्ट था. उसे पहले व्यापम के तहत हुए दुग्ध संघ परीक्षा फर्जीवाड़े में गिरफ्तार किया गया था और बाद में पुलिस कांस्टेबल और नापतौल भर्ती परीक्षा में भी आरोपी बनाया गया. 2009 में सामने आए व्यापम घोटाले में हुई 1,700 से अधिक गिरफ्तारियों में से यह भी एक गिरफ्तारी थी, लिहाजा उसे भोपाल जेल भेज दिया गया.

इन्हीं में से एक मामले में जमानत मिलने पर अप्रैल 2015 में जेल से रिहा होने के बाद वह पत्नी से मिलने कांकेर गया, लेकिन वहां एक होटल में उसकी लाश मिली. पुलिस अपने तरीके से मामले की जांच कर रही है, लेकिन विजय के पिता छोटेलाल पटेल इससे खासे असंतुष्ट हैं. उनका कहना है, 'अदालत में गवाही देने से पहले ही विजय की हत्या कर दी गई. वह कई बड़े नामों का खुलासा करने वाला था.' अपने दावे के समर्थन में वे कहते हैं कि जेल से छूटने के बाद विजय को अपने वकील से मिलना था, लेकिन वकील से मिलने की बजाए वह कांकेर क्यों पहुंच गया? होटल में अगर वह अकेला रुका था तो उसने चार बेड वाला सुइट क्यों बुक कराया? घटनास्थल से विजय का मोबाइल गायब मिला और पुलिस ने अब तक उसके मोबाइल की कॉल डिटेल क्यों नहीं निकालीं?

मेहताब सिंह डामोर जब इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में पढऩे वाली 19 साल की अपनी बेटी नम्रता की मौत की कहानी सुनाते हैं, तो दर्द पलकों की कोरों से आंसू बनकर टपक आता है. जनवरी 2012 में नम्रता की लाश सड़ी-गली हालत में उज्जैन में रेल की पटरी के पास पड़ी मिली थी. पुलिस ने लाश को लावारिस मानकर दफना दिया था. बाद में परिजनों के आने पर उन्हें शव के अवशेष सौंपे गए. पुलिस का कहना है कि नम्रता ने ट्रेन से कूदकर आत्महत्या की थी. लेकिन यह दलील दो वजहों से संदिग्ध हो जाती है. एक-इंदौर क्राइम ब्रांच को व्यापम के एक सरगना डॉ. जगदीश सागर की एक सीडी मिली थी. इस सीडी में दर्ज डॉ. सागर और नम्रता की बातचीत से पता चलता है कि पीएमटी 2010 में नम्रता ने पास होने के लिए डॉ. सागर के गिरोह का सहारा लिया था लेकिन मेडिकल एडमिशन होने के बाद भी डॉ. सागर को पूरे पैसे नहीं दिए. यानी मौत से पहले नम्रता व्यापम के ठेकेदारों के दबाव में थी. दूसरे, उसके पिता डामोर पूछते हैं कि आत्महत्या करने के लिए क्या कोई रिजर्वेशन कराकर ट्रेन में बैठता है? वे  मुख्यमंत्री और राज्यपाल को भी मामले की जांच कराने की अर्जी दे चुके हैं, लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं आया.

वैसे राज्यपाल रामनरेश यादव भी क्या करें, वे तो खुद व्यापम के भुक्तभोगी भी हैं और दागी भी. राज्यपाल और उनके बेटे शैलेश यादव के खिलाफ फरवरी 2015 में व्यापम घोटाले में धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज की गई थी. शैलेश से पूछताछ हो पाती इससे पहले ही लखनऊ के माल एवेन्यू एरिया में यादव परिवार के बंगले में शैलेश की लाश मिली. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत के संदिग्ध माने जाने के बावजूद परिवार इस मामले में और कोई जांच नहीं चाहता.

अब तक का सबसे खतरनाक घोटाला
इन तीनों मौत के अलावा 28 जून को ग्वालियर के बिरला अस्पताल में डॉ. राजेंद्र आर्य और इंदौर जेल में नरेंद्र सिंह तोमर की मौत ने व्यापम की संदिग्ध मौतों के आंकड़े को 25 तक पहुंचा दिया. हालांकि विपक्षी कांग्रेस इस आंकड़े को 50 के करीब बता रही है. इतनी बड़ी संख्या में संदिग्ध मौतें सामने आने से व्यापम घोटाला हाल के वर्षों का सबसे खतरनाक घोटाला बन जाता है. इस घोटाले में मौतों की संख्या और पैटर्न पर नजर डालें तो यह घोटाला बिहार में लालू प्रसाद यादव के दौर में हुए चारा घोटाले, उत्तर प्रदेश में मायावती की पिछली सरकार में हुए नेशनल रुरल हेल्थ मिशन (एनआरएचएम) घोटाले और पश्चिम बंगाल •ी ममता बनर्जी सरकार में चल रहे शारदा चिट फंड घोटाले से कहीं खतरनाक है.

ज्यादातर मौतों में परिवार वाले किसी न किसी साजिश का अंदेशा जता रहे हैं, तो अधिकारी इन दावों को दरकिनार कर रहे हैं. लेकिन अगर शैलेश यादव का ही मामला लें तो अगस्त 2013 से मामले की जांच कर रहे स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के सूत्र बताते हैं कि शैलेश राजभवन से फर्जी नियुक्तियों का धंधा चला रहे थे और इस काम में उसने अपने पिता का लेटरहेड भी इस्तेमाल किया. सामान्य तौर पर संदिग्ध मौत के मामले में परिवार वाले गहन जांच की मांग करते हैं लेकिन परिवार यहां चुप लगा गया. यही नहीं, नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद जहां मनमोहन सिंह सरकार में तैनात किए गए ज्यादातर राज्यपाल हटा दिए गए वहीं, दागी होने के बावजूद यादव को पद से नहीं हटाया गया.

दूसरी दिलचस्प या यों कहें, रोंगटे खड़ी करने वाली बात यह है कि व्यापम में अब तक मारे गए सभी लोग छोटी मछलियां हैं. दूसरी तरफ कुछ बड़े शिकार जैसे पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, उनके पूर्व ओएसडी ओ.पी. शुक्ल, राज्यपाल के पूर्व ओएसडी धनराज यादव, कथित तौर पर मुख्यमंत्री के करीबी कहे जाने वाले खनन कारोबारी सुधीर शर्मा, व्यापम के सूत्रधार जगदीश सागर, नितिन मोहेंद्र और पंकज त्रिवेदी जेल में खामोशी से पड़े हैं. कांग्रेस के लिए इस सारे मायाजाल का सीधा मतलब है—छोटी मछलियों को साफ कर दो ताकि बड़े आरोपियों के खिलाफ सबूत जुटाने के लिए जांच दल के पास कुछ बचे ही नहीं. यहां यह जान लेना जरूरी है कि बड़े आरोपियों के खिलाफ अदालत में सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है. ऐसे में जब मुकदमा शुरू होगा, तब तक बहुत-से सबूत मिट चुके होंगे. जुलाई 2009 में ही इस मामले को मध्य प्रदेश विधानसभा में उठाने वाले तत्कालीन निर्दलीय विधायक पारस सकलेचा ने इंडिया टुडे को बताया, ''अब तक सिर्फ दो तरह के लोगों की बात हो रही है— एक वे जो मारे गए हैं और दूसरे वे जो आरोपी हैं. लेकिन अगर जांच की दिशा भटक गई तो व्यापम से चांदी काटने वाले हमेशा के लिए बेदाग निकल जाएंगे.” और प्रदेश में लोगों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार गृह मंत्री बाबूलाल गौर ने जिस तरह गीता के मंत्र का मजाक उड़ाते हुए कह दिया, ''जो आया है वह जाएगा, राजा, रंक, फकीर.” उससे तो सरकार के इरादे पर ही शक होने लगा. 

एसटीएफ अफसर भी सहमे
हालांकि घटना के बाद प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्र और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष नंद कुमार चौहान ने हाइकोर्ट के आदेश पर एसटीएफ की निगरानी कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआइटी) के मुखिया जस्टिस चंद्रेश भूषण से मुलाकात कर व्यापम की मौतों की पूरी जांच का आग्रह किया. वैसे इन दो मौतों के पहले ही एसआइटी ने मध्य प्रदेश हाइकोर्ट को भेजी रिपोर्ट में कहा था, ''मामले की जांच से जुड़े एसटीएफ अफसरों ने भी अपनी सुरक्षा को खतरा बताया है.” हाइकोर्ट को भेजी अपनी रिपोर्ट में एसआइटी ने कहा है कि इन मौतों के पीछे कोई सुनियोजित षड्यंत्र के अलावा जांच को प्रभावित करना भी एक वजह हो सकती है. एसटीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडिया टुडे को बताया, ''जेल अधिकारियों से हमें पता चला है कि कई आरोपी एसटीएफ अफसरों को निशाना बनाने की बातें कर रहे हैं. हमारे परिवार, निवेश, शौक यहां तक कि खान-पान की आदतों पर भी नजर रखी जा रही है. हम तो वर्दी में हैं लेकिन बाल-बच्चों की फिक्र तो सबको होती है. इसके अलावा फर्जी मामलों में फंसाने का भी डर है.”

रामभरोसे व्हिसलब्लोअर
आरोपी और अफसरों के बाद घोटाले की तीसरी कड़ी हैं व्हिसलब्लोअर. और इनकी सांस भी फूल रही है. जैसे, ग्वालियर की सड़क़ों पर पुलिसवाले को साइकिल पर बैठाए एक दुबला-पतला लडक़ा दिख जाएगा. यह हैं व्यापम के व्हिसल ब्लोवर आशीष चतुर्वेदी. सोशल वर्क में मास्टर डिग्री कर रहे आशीष को पैसे देकर डॉक्टर बनाने की मंडी का पता तब चला जब वे कैंसर से जूझ रही अपनी मां का इलाज करा रहे थे. यहां उन्हें पहली बार पता चला कि प्राइवेट कॉलेजों में किस तरह मेडिकल सीटें बेची जा रही हैं. उन्होंने स्टिंग ऑपरेशन के जरिए व्यापम घोटाले के इस रूप का खुलासा किया. इधर वे मेडिकल में धांधली के खिलाफ लड़ाई में आगे बढ़े उधर, उनकी मां कैंसर की लड़ाई हार गईं और 27 दिसंबर, 2012 को उनका निधन हो गया. व्यापम में कुछ बड़ी गिरफ्तारियां होने और इसका बार-बार ग्वालियर कनेक्शन आने के बाद सरकार ने 5 अगस्त, 2014 को उनकी सुरक्षा के लिए सिपाही तैनात कर दिया. लेकिन इन 10 महीने में उनके 70 गार्ड बदले जा चुके हैं. चतुर्वेदी कहते हैं, ''बहुत-से गार्ड तो कह देते हैं कि भइया कोई दिक्कत हो तो फोन पर बता देना, मैं आ जाऊंगा. सुरक्षा के नाम पर मेरा तमाशा बना दिया है.”

उधर व्यापम के व्हिसल ब्लोअर और इंदौर के क्षेत्रीय स्वास्थ्य प्रशिक्षण केंद्र में मेडिकल ऑफिसर डॉ. आनंद राय दोहरी कठिनाई में हैं. वे उसी सरकार के खिलाफ सारी लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसके वे मुलाजिम हैं. राय कहते हैं, ''मेरे ऊपर वरिष्ठ मंत्रियों से लेकर मध्य प्रदेश के सबसे रसूखदार बिल्डर तक का दबाव है कि मैं अपनी कई आरटीआइ अर्जियां वापस ले लूं.” राय की पत्नी डॉ. गौरी राय इंदौर के पास महू के सिविल अस्पताल में गाइनीकोलॉजिस्ट के पद पर तैनात हैं. उन्हें 7 जनवरी, 2015 से सस्पेंड कर दिया गया है. राय को हाइकोर्ट के निर्देश के बाद एक सुरक्षाकर्मी उपलब्ध कराया गया है. लेकिन यह सुरक्षाकर्मी भी दिन में केवल 6-7 घंटे ही उनके साथ रहता है. बाकी समय वे अकेले रहते हैं. 

इससे कठिन हाल में जी रहे हैं इंदौर के ही सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट प्रशांत पांडेय. प्रशांत शुरू में व्यापम घोटाले में कॉल ट्रेस करने, कंप्यूटर हार्ड डिस्क जांचने और कई तरह के आइटी मामलों में एसटीएफ की मदद किया करते थे. लेकिन जुलाई 2014 में इंडिया टुडे में व्यापम घोटाले पर प्रकाशित आवरण कथा “संकट में शिवराज” उनके लिए मुसीबत लेकर आ गई. पांडेय बताते हैं, ''इंडिया टुडे में एसटीएफ जांच के कई गोपनीय हिस्से प्रकाशित होने के बाद सरकार को शक हुआ कि मैंने ही दस्तावेज लीक किए हैं. इसके बाद पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और प्रताडि़त किया.” अप्रैल 2015 में इंदौर में उनकी कार को देर रात किसी वाहन ने टक्कर मारी, जिसमें उनकी कार पलट गई. उन्होंने अपनी जान को खतरा बताते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई. प्रशांत ने एक अन्य पीआइएल के माध्यम से व्यापम से जुड़े संवेदनशील साक्ष्य सुप्रीम कोर्ट में जमा करा दिए हैं. फिलहाल उन्हें और उनकी पत्नी को दो सुरक्षाकर्मी मिले हुए हैं.

इन परिस्थितियों के बावजूद स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्र कहते हैं, ''हमने एसआइटी से मौतों की विस्तृत जांच का निवेदन किया है. माननीय उच्च न्यायालय की निगरानी में जांच चल रही है. सरकार के पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है.”  कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पूछते हैं, ''छुपाने को कुछ नहीं है तो सीबीआइ से जांच क्यों नहीं कराते?”

इस राजनैतिक कलाबाजी से इतर छोटेलाल पटेल और मेहताब सिंह डामोर जैसे लोगों को अपने बच्चों की मौत के इंसाफ की जरूरत है तो हजारों लोगों के मन में यह खटका है कि कहीं उनका इलाज व्यापम की मंडी से निकला कोई मुन्नाभाई तो नहीं कर रहा है. ये सब चाहते हैं कि नीर-क्षीर विवेक करने वाली जांच हो और मामला जल्द खत्म हो.
—साथ में समीर गर्ग और शुरैह नियाजी

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें