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चार साल पहले BJP ने काट दिया था तीरथ सिंह रावत का टिकट, अब सौंपी उत्तराखंड की सत्ता

उत्तराखंड में चार साल पहले 2017 के विधानसाभ चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस से आए सतपाल महाराज के लिए तीरथ सिंह रावत का टिकट काट दिया था, लेकिन अब उन्हें राज्य की सत्ता ही पार्टी ने सौंप दी है. तीरथ सिंह रावत ने कभी बीएस खंडूरी की उंगली पकड़कर राजनीति सीखा था और राज्य की अब सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं.

तीरथ सिंह रावत तीरथ सिंह रावत
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सतपाल महाराज के चलते तीरथ सिंह का टिकट कटा था
  • बीएस खंडूरी की उंगली पकड़कर रावत सियासत में बढ़ें
  • 2019 के लोकसभा चुनाव में गढ़वाल से सासंद बने

उत्तराखंड में बीजेपी ने अपना सीएम बदल लिया है. त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह अब तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाने का पार्टी ने फैसला किया है. दिलचस्प बात यह है कि चार साल पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस से आए सतपाल महाराज के लिए तीरथ सिंह रावत का टिकट काट दिया था. इसके बावजूद उन्होंने न तो पार्टी छोड़ी और न ही पार्टी से बगावत की बल्कि सतपाल महाराज को जिताने में अहम भूमिका अदा की. इसी का नतीजा है कि बीजेपी ने उन्हें पहले लोकसभा का टिकट दिया और अब सीएम का ताज ही सौंप दिया. 

तीरथ सिंह रावत भले ही संघ से जुड़े रहे हैं और एबीवीपी से सियासी सफर शुरू किया हो, लेकिन सियासत में बीएस खंडूरी की उंगली पकड़कर आगे बढ़े हैं. खंडूरी पौड़ी-गढ़वाल सीट से जब भी लोकसभा चुनाव लड़े तो तीरथ सिंह रावत ने उनके चुनाव संयोजन का जिम्‍मेदारी संभाली. नब्बे के दशक से बीएस खंडूरी और तीरथ सिंह रावत के बीच नजदीकियां बढ़ीं और फिर एक दूसरे के राजनीतिक खेवनहार बन गए. 

1997 में बीएस खंडूरी ने तीरथ सिंह रावत को एमएलसी का टिकट दिलाने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया था, जिसके बाद वो जीतकर विधान परिषद पहुंचे थे. खंडूरी केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री थे और साल 2000 में उत्तराखंड का गठन हुआ. ऐसे में बीजेपी की राज्य में सरकार बनी तो नित्यानंद सीएम बने, जिसमें खंडूरी की पैरवी पर ही रावत को कैबिनेट में शामिल किया गया था. 

साल 2008 में परिसीमन के बाद चौबट्टाखाल सीट वजूद में आई. 2012 में विधानसभा चुनाव हुआ तो बीजेपी से तीरथ सिंह रावत मैदान में उतरे थे. विधानसभा बीजेपी के तमाम दिग्गज नेता हार गए थे, इतना ही नहीं मुख्यमंत्री रहे बीएस खंडूरी भी अपनी सीट नहीं जीत सके थे. ऐसे माहौल में तीरथ सिंह रावत चौबट्टाखाल से विधायक चुने गए थे. 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय सतपाल महाराज के बीजेपी में आने से तीरथ सिंह रावत का सियासी समीकरण बिगड़ गया. 

सतपाल महाराज ने चौबट्टाखाल सीट से टिकट की दावेदारी कर दी, जिसके चलते 2017 के विधानसभा चुनाव में तीरथ सिंह रावत का टिकट कट गया है. हालांकि, पार्टी ने संगठन में राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी सौंपी और हिमाचल प्रदेश का प्रभारी बना दिया. तीरथ सिंह ने चौबट्टाखाल सीट पर सतपाल महाराज को जिताने में अहम भूमिका अदा की. सतपाल महाराज जीतकर उत्तराखंड सरकार में पर्यटन मंत्री बने. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने तीरथ सिंह रावत को पौड़ी-गढ़वाल सीट पर प्रत्याशी बना दिया जहां उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु बीएस खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी को तीन लाख वोटों से मात दिया. 

तीरथ सिंह रावत के केंद्रीय राजनीति में अभी पहुंचे हुए डेढ़ साल ही गुजरे थे कि उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ विधायकों ने बगावत का बिगुल फूंक दिया. ऐसे में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने त्रिवेंद्र सिंह रावत की सीएम की कुर्सी से छुट्टी कर दी, जिसके बाद राज्य की सत्ता की कमान लेने वाले नेताओं में कई दिग्गजों के नाम चल रहे थे. ऐसे में बीजेपी आलाकमान ने संघ की पृष्ठभूमि के साथ-साथ संगठन और सरकार के अनुभव को देखते हुए तीरथ सिंह रावत को सीएम बनाने का फैसला किया. चार साल पहले विधानसभा का टिकट नहीं मिला था और अब पूरे राज्य की कमान पार्टी ने उन्हें सौंप दी है. 

 

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