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जून में पहाड़ों पर मौसम की ऐसी मार क्‍यों?

उत्तराखंड में कुदरत ने जो तबाही मचाई, उससे कई सवाल खड़े हुए हैं. सबसे बड़ा सवाल ये पहाड़ों पर जो कुछ हुआ क्या उसका वक्त सही था? शायद नहीं, जून में कुदरत ने कभी ऐसा कहर नहीं ढाया. जून के महीने में बारिश ने कभी ऐसी बर्बादी नहीं मचाई.

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उत्तराखंड में कुदरत ने जो तबाही मचाई, उससे कई सवाल खड़े हुए हैं. सबसे बड़ा सवाल ये पहाड़ों पर जो कुछ हुआ क्या उसका वक्त सही था? शायद नहीं, जून में कुदरत ने कभी ऐसा कहर नहीं ढाया. जून के महीने में बारिश ने कभी ऐसी बर्बादी नहीं मचाई.

पहाड़ों पर जो कुछ हुआ उससे पूरी दुनिया हैरान रह गई और एक के बाद एक कई सवाल खड़े हुए. सवाल ये कि जून में क्यों बदला मौसम का मिजाज? जून में क्यों टूटा बारिश का रिकॉर्ड?

ऐसा नहीं है कि पहाड़ों पर भारी बारिश नहीं होती. ऐसा भी नहीं है कि पहाड़ों पर बाढ़ नहीं आती. सवाल कुदरत के खौफनाक चेहरे को लेकर नहीं बल्कि सवाल कुदरत के रौद्र रूप के वक्त को लेकर है.

करीब करीब हर साल पहाड़ों पर भारी बारिश होती है लेकिन इस बार जून में ही कुदरत ने तांडव मचा दिया. ऐसी बारिश हुई कि देखते ही देखते अलकनंदा अकड़ने मारने लगी. मंदाकिनी विकराल हो गई और भागीरथी खूंखार. ऐसे में सवाल खड़े हुए- जून में पहाड़ों पर बाढ़ क्यों? जून में कुदरत का कहर क्यों?

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स्थानीय लोगों को, सैलानियों को और चार धाम की यात्रा पर गए श्रद्धालुओं को शायद ही इस बात का इल्म रहा होगा कि इस बार मौसम के तेवर वक्त से पहले बदल जाएंगे और कुदरत कहर बरपा देगी. जिस बारिश और बाढ़ की आहट 15 दिनों बाद सुनाई देने वाली थी उसने वक्त से पहले ही हजारों जिंदगियों को अपनी चपेट में ले लिया और कहर ढाती रही.

सिर्फ पहाडों पर ही नहीं, मैदानी इलाकों में भी इस बार बारिश सालों के रिकॉर्ड तोड़ रही है. भोपाल में इस साल पिछले 75 सालों के रिकॉर्ड टूट गए. 1938 के बाद पहली बार भोपाल ने ऐसी बारिश देखी. देश के दूसरे हिस्सों में भी बारिश ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है. उम्मीद से ज्यादा और वक्त से पहले झमाझम बरसात हो रही है. लेकिन सवाल ये कि क्यों? क्यों मौसम का मिजाज बदल रहा है? कहीं ये आने वाले किसी बड़े खतरे का संकेत तो नहीं?

सिर्फ पहाड़ों पर नहीं मैदानी हिस्सों में भी मॉनसून मतवाला हो गया है. औसत से ज्यादा और वक्त से पहले झमाझम बारिश हो रही है. मौसम के जानकारों का कहना है कि 150 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है. आपको जानकर हैरानी होगी कि देश के 77 फीसदी हिस्से में ज्यादा बारिश दर्ज की गई है.

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चाहे देहरादून या फिर दिल्ली, भोपाल हो या फिर अमृतसर, श्रीनगर हो या फिर मुंबई. देश के हर कोने में इस साल जून में बारिश का रिकॉर्ड टूटा. उत्तराखंड के पहाड़ों पर पिछले दस सालों में जून के महीने में इतनी बारिश कभी नहीं हुई.

आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में 2004 में 359.3 मिमी बारिश हुई थी. 2008 में यहां 593.8 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई. 2011 में उत्तराखंड में 386.5 मिमी बारिश हुई और इस साल अब तक 401.8 मिमी बारिश रिकॉर्ड की जा चुकी है. जबकि बारिश के अभी दो महीने बाकी हैं. अमूमन जुलाई और अगस्त में झमाझम बारिश होती है लेकिन मौसम के जानकारों का दावा है कि इस साल अब तक देश भर में 77 फीसदी ज्यादा बारिश हो चुकी है जो पिछले 150 सालों का रिकॉर्ड है.

देश के दूसरे हिस्सों में भी बारिश के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि उत्तर-पश्चिम भारत में 120 फीसदी बारिश ज्यादा हुई है. मध्य भारत के तमाम इलाकों में 90 फीसदी बारिश ज्यादा रिकॉर्ड की गई है. दक्षिण भारत की बात करें तो यहां पर भी मॉनसून के काले बादल 46 फीसदी ज्यादा बरसे हैं. केवल पूर्वोत्तर भारत में इस बार जून के महीने में मॉनसून की बारिश सामान्य से 45 फीसदी कम रही है.

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इस बार मॉनसून उत्तर-पश्चिम भारत में समय से पहले पहुंच गया. इस वजह से तमाम इलाकों में जरूरत से ज्यादा बारिश हुई. यानी मॉनसून ने इस बार सारे पूर्वानुमान बिगाड़ के रख दिए हैं. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक जुलाई और अगस्त में मॉनसून की स्थिति अच्छी रहने का अनुमान है और ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा इस बार मॉनसून सामान्य से ज्यादा ही रह सकता है.

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