इस 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन 30 जनवरी यानी महात्मा गांधी की पुण्यतिथि जैसा अहसास हुआ. अहिंसा पर राज्य प्रायोजित हमला गोडसे की बंदूक से ज्यादा खतरनाक है.
महात्मा गांधी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अहिंसा के प्राचीन भारतीय चिंतन को आधुनिक भारत की सामाजिक, राजनीतिक अवधारणा के केंद्र में ला दिया. हमारी राष्ट्रीय चेतना में बसी ये अहिंसा ही थी जिसने आजादी के लंबे और कठिन सफर में हमें डिगने नहीं दिया.
शारीरिक हिंसा के विलोम से कहीं आगे की चीज है. यह गुलामी के वास्तविक स्परूप को पहचानने की हमारे पूर्वजों की अद्भुत समझ से उपजी है.
दासता के वातावरण में हर कोई कैदी हो जाता है. शोषित वर्ग भय, अभाव, असहायता का, तो शोषक वर्ग सत्ता की लालसा और अपनी कथित आवश्यकता का. शोषण से पैदा गुस्सा, बदले की भावना और हिंसा का जवाब हिंसा से देने पर समाज का माहौल खराब होता जाता है. अहिंसा हमें हर हाल में दमन से लड़ने का हौसला देती है. अहिंसा का रास्ता न दमन करने देता है और ना ही दमन सहने देता है.
अहिंसा हमेशा हमें मानवता के प्रति सजग करती है. डर, लालसा, नफरत और भेदभाव के चक्र को तोड़ती है. अहिंसा ’स्व’ पर ’राज’ यानि पूर्ण नियंत्रण का रास्ता है. ये ऐसी अवस्था है जिसमें शोषित को शोषक से और शोषक को शोषण की आदत से छुटकारा दिलाती है. शोषित और शोषक, दोनों को ही दमन का चक्रव्यूह तोड़ना सिखाती है.
हर किसी को सत्य की खोज की आजादी मिले, इसीलिए भारतीय अध्यात्म की बारीक नजर ने शुरू से ही अहिंसा को अपनाया है. अहिंसा राजनीति को संवेदनशील बनाती है. अहिंसा समाज की संरचना को पुनर्निर्मित करती है. ताकि सबसे कमजोर के हाथ में सत्ता और उसके सहभाग के आधार पर समाज अपनी उपलब्धि का आकलन कर सके. यह अहिंसा ही है जो राजनीतिक इच्छाशक्ति के केंद्र में सत्ताहीन, हाशिये पर धकेले गए लोगों और अल्पसंख्यकों के लिए जगह बनाती है.
अहिंसा एक ऐसी राजनीतिक शुचिता को स्थापित करती है जहां सबसे कमजोर के संरक्षण और समावेश को निहित किया गया हो. ताकि किसी भी परिस्थिति में यह आधारभूत मूल्य खंडित न होने पाए. अहिंसा सत्ता में करुणा, संवेदना लाती है. ताकि सत्ता एक-दूसरे के शोषण का हथियार बनकर न रह जाए. सत्ता हमारे सांझे भविष्य को संवारने का माध्यम बन सके. आजादी के आंदोलन से अहिंसा के प्रति समर्पित नेतृत्व हमें विरासत में मिला. हमारे संवैधानिक मूल्यों का चुनाव अहिंसा की ताकत का शक्तिशाली आगाज़ है.
हमारे देश का संविधान निर्माण घोर गरीबी और असमानता के दौर में हुआ. एक तरफ गरीब, बेसहारा, अशिक्षित आबादी थी. उत्पीड़न से उभरते, संस्थागत सामाजिक भेद से जकड़े, राजनीतिक सहभागिता से वंचित गरीब थे, तो दूसरी तरफ एक अपेक्षाकृत छोटा शक्तिशाली वर्ग था, जिसके हाथ में पूंजी थी, भूमि, शिक्षा और प्रभुत्व था. विभाजन के भयंकर सांप्रदायिक दंगे और लाखों लोगों की मौत की त्रासदी से भारत अभी उभर भी नहीं पाया था.
सामान्यतया ऐसे में सत्ता का तर्क होता कि संप्रभुता संपन्न उस थोड़े से वर्ग को ही मौके का फायदा उठाकर राष्ट्र पर अपने एकाधिकार को मजबूत करना चाहिए. सत्ता में बैठे लोग कह सकते थे कि हमारी एक मात्र प्राथमिकता पूंजी निर्माण होनी चाहिए. हम जन भागीदारी से उपजती अक्षमता को बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे.
वे अपनी पैरवी में यह भी कह सकते थे कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिकने और प्रतिभा संपन्न होने की राह में गरीब, बेसहारा, अशिक्षित आबादी के हवाले राष्ट्रीय दिशा निर्देशन कर देना बड़ी बाधा है. हमें यह बहुत भारी पड़ेगा. विभाजन की वीभत्सता को वे डर और भेदभाव फैलाने के लिए इस्तेमाल कर सकते थे. अपनी सुविधा के मुताबिक कुछ खास समुदायों पर इसका दोष मढ़, उन्हें खतरे का पर्याय बताकर, उनको समता के लिए अयोग्य, अपात्र घोषित कर सकते थे.
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ये लोग प्राचीन ग्रंथों के हवाले से महिलाओं और सर्वहारा वर्ग को हाशिये पर धकेलने की प्रक्रिया को न्यायसंगत ठहरा सकते थे. परंतु जो कुछ हुआ वो इसके ठीक उलट था. अपने प्रभाव का इस्तेमाल सत्ता हथियाने या ऐसे सतही तर्क प्रस्तुत करने के बजाय नेतृत्वकर्ताओं ने भारत को समता की राह प्रदान की थी. एक ऐसी राह जिसने एक लघु विशिष्ट वर्ग से उसके बेतहाशा आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक सत्ता को असंख्य बेजुबान जन के बीच हस्तांतरित किया. परिणामतः हमें एक ऐसा संविधान मिला जो कि मानव इतिहास में सशक्तिकरण और शांतिपूर्ण सामाजिक क्रांति का महत्वाकांक्षी प्रयत्न करने को दृष्टिगत, वैधानिक आधार देता है.
संविधान का हरेक प्रावधान, चाहे एक व्यक्ति एक मत एक मूल्य, सभी वयस्कों के लिए मताधिकार, मौके और प्रभाव की समता, हाशिये पर खड़े लोगों के प्रति सकारात्मक संरक्षण, राष्ट्र राज्य को एकल धर्म से निरपेक्ष करना आदिवासी जन के विशिष्ट अधिकारों को मान्यता हो या वैज्ञानिक आधुनिक विचारों की पैरवी हो, इसकी पुष्टि करता है. इसका असर क्रांतिकारी था और सभी परंपरागत भेदमूलक ढांचों पर सीधा प्रहार भी था.
हमारे पूर्वजों के इन प्रबुद्ध चुनावों के पीछे कई कारण रहे होंगे. मगर सबसे अहम बात यह थी कि संविधान की रचना अहिंसा से परिपूर्ण राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना के माहौल में हुई. आमतौर पर किसी बुजदिल को डिगा देने जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों और प्रलोभनों के रहते हुए भी देश और उसका प्रतिनिधित्व करते नेताओं के पास यह विवेक, बड़प्पन और विनय था कि वो 33 करोड़ आजाद भारतीयों की कल्पना को पंख दे सकें.
उसको साकार करने का अवसर दे सकें. यह मात्र अहिंसा की मूल भावना के कारण सुनिश्चित हो सका. ऐसा करके उन्होंने देश को न केवल मुक्ति के पथ पर अग्रसर किया, बल्कि फासीवाद, औपनिवेशिक दासता और विश्व युद्धों के परिणाम में से कराहते विश्व को भी करुणा का रास्ता दिखाया.
इस पीढ़ी ने निःसंदेह अपने मुस्तकबिल का सामना डट कर किया. यह प्रदर्शित किया कि शिखर का नेतृत्व उग्रता आडंबर या फब्तियों से नहीं निखरता. वरन करुणा, विनय और बड़प्पन से सत्ता का संचालन किया जाता है. बड़ी दुःखद बात है कि सत्ता से हमारे वर्तमान संबंध इसके ठीक विपरीत हैं. चुनावी बहुसंख्या ने सभी लोकतांत्रिक स्थानों से मुस्लिमों के हटाये जाने का पुरजोर समर्थन किया है.
ज्यादातर उद्योगपति किसान की भूमि को पाने हेतु उनकी आवाज को कुचलने में कोई असुविधा नहीं महसूस करते. कुछ अदालतें वयस्क महिला के धर्म परिवर्तन पर हस्तक्षेप को अपना अधिकार और दायित्व मानती हैं. राज्य सरकारें आदिवासियों को भूमि से बेदखल करती हैं. उन्हें कोई मुआवजा देना तो दूर, उनकी अपनी पुश्तैनी जमीन को हथियाने से पहले उन्हें सुनवाई का मौका भी नहीं देतीं. सभी सामाजिक नेता भोजन अर्थात राशन को बंद कराने की धमकी देकर शौचालय निर्माण के अभियान को सुविधा से अपनी सहमति देते हैं.
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भारतीय नागरिक को मानव कवच बनाने को सेना अपना पुरुषार्थ समझती है. सूची अनवरत हो सकती है. यह लोग सबके प्रतिनिधि नहीं हैं. मगर निःसंदेह अहिंसा के लिए यह अमांगलिक काल है. हमारी ऐसी अधोगति कैसे हो गई? अहिंसा केन्द्रीकृत सत्ता को सदैव चुनौती देती रही है. विगत सरकारें भी कई बार अहिंसा के मार्ग से हटी हैं. मगर इस मौजूदा व्यवस्था के द्वारा हमारे सांझे चैतन्य से अहिंसा की निकासी का प्रयत्न हो रहा है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. इस परियोजना मे नैतिक सुकृत्य या तथाकथित पावनता उनका प्रबल अस्त्र है.
इस कृत्रिम नैतिक गौरव अभियान की वजह ऐसी बनाई जाती है, जिससे किसी का भी भेद नहीं हो सकता, कोई नकार नहीं सकता. ’क्या खुले में शौच से समाज को मुक्त नहीं होना चाहिए?’ क्या आतंकवाद को समाप्त नहीं होना चाहिए? क्या भ्रष्ट को दंडित नहीं किया जाना चाहिए? क्या हमारी बहन-बेटियों को सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए?’ इन प्रश्नों को मिलती हामी का इस्तेमाल किसी वर्ग को लक्ष्य कर किया जाता है.
उस लक्षित वर्ग को कमतर और करुणा के अयोग्य बताया जाकर उसे उसकी औकात में रखने की बात की जाती है. ताकि समाज की कथित तरक्की बाधित न हो. काला धन इकट्ठा करने वाले, खुले में शौच करने वाले, कर चोरी करते व्यवसायी, गोमांस भक्षक एवं वितरक, अहिंदी भाषी, वंदे मातरम् को नहीं गाने वाले, कश्मीरी पत्थरबाज, आजाद ख्याल छात्र, सत्यान्वेषी पत्रकार एवं महिलाएं जो तथाकथित भारतीय संस्कृति का पालन नहीं करती हैं, आदि लंबी सूची है. एक ऐसी सूची जो हर प्रकार के पूर्वाग्रह, भय और दिखावे को हवा देने के योग्य कही जा सकती है.
इनमें से प्रत्येक वर्ग को लक्ष्य बताकर हिंसक, लुभावने नैतिक अभियान को चलाया जाता है. लक्षित वर्ग को अनैतिकता का पर्याय और सुधार की परिधि से बाहर बताया जाता है. ताकि अपने गुनाहों के आत्मावलोकन का बोझ सुविधा से झटक दिया जाए, किसी पर भी अपना न्याय थोपने से पहले उसकी जगह स्वयं को रखकर देखने की मुसीबत से बचा जा सके. समस्या को जड़मूल से उखाड़ फेंकने के अंतिम अपरिहार्य एकमात्र अस्त्र के रूप में इस नैतिक युद्ध को पेश किया जाता है. इतने महत्व का अभियान की ’अंत भला तो सब भला’. यानि इच्छित नैतिक मंजिल को पाने के लिए भले ही किसी भी मार्ग का उपयोग क्यों न किया गया हो.
अतः नैतिक युद्ध से जुड़ाव, व्यक्ति को देशभक्त के तौर पर प्रमाणित करता है. इसमें व्यक्ति को खुद कुछ नहीं करना. केवल घृणा को अंगीकार करना है, हिकारत को अपनाना है, मूक तमाशबीन बनकर उत्साहित होकर तथाकथित दोषी वर्ग पर मानसिक कालिख मलना है. तात्पर्य यह कि इस नैतिक युद्ध में चाहे पल भर के लिए ही सही, हमें अहिंसा को मानस से उखाड़ फेंकना है. गांधी जी जिस अहिंसा को जिया करते थे और जिसके लिए खुद का त्याग कर गए, वह अहिंसा ऐसे एक लघु अभियान के जरिए हमारे अवचेतन मानस से हर बार शनैः शनै तिरोहित होती जा रही है.
गांधीजी ने देश के प्राचीन परंपरागत विवेक मार्ग का प्रयोग भारत रूपी राष्ट्र राज्य के निर्माण हेतु किया. एक ऐसा मार्ग जो कि मानव मात्र को अपने अपने सत्य शोधन की संपूर्ण आजादी प्रदान करे. इस मार्ग पर आज प्रहार हो रहे हैं. वे हमें हमारे अपने दंभ के पिंजरे में असुरक्षा, कृपणता की हथकड़ियों से लैस भयभीत बौने बनाकर रखना चाहते हैं. देश की बागडोर खुद के हाथ में रखना चाहते हैं.
इस गांधी जयंती पर बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि हम अपने भीतर की ’आत्मा’ को मलिन न होने दें. उसे महानता की ओर ले जाएं. ऐसा तब संभव है जब हम अपने अहं को भुलाकर मानव मात्र को गले लगाने लगेंगे. हम उनको भी गले लगाएं जो आज भी गोडसे के विचार वंशज हैं. उनको भी प्रेम, करुणा और विनम्रता से अंगीकार करें.
नाथूराम की गोलियों ने गांधी के मूल्यों को नहीं मारा. उसकी गोलियां जो न कर सकीं, वो घृणा का आज का वातावरण न कर पाए. यह तब जाकर कहीं सुनिश्चित होगा.
जय जगत.
(सचिन राव संस्था 'अहिंसा के रास्ते' (ahimsakeraste@gmail.com) से जुड़े हैं जो देश के अलग-अलग हिस्सों में संविधान, राष्ट्र और अहिंसा के बारे में परिचर्चाएं आयोजित कराती है.)