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बर्फ की चादर ओढ़ सरजमीं से लिपटा रहा जवान, 18 साल बाद मिला शव

18 साल पहले दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में 15 राजपूत बटालियन के हवलदार गया प्रसाद जवानों के लिए सप्लाई इकट्ठा करने गए थे. लेकिन उत्तरी सियाचिन ग्लेशियर से वापस नहीं लौटे.

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Symbolic Image
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18 साल पहले दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में 15 राजपूत बटालियन के हवलदार गया प्रसाद जवानों के लिए सप्लाई इकट्ठा करने गए थे. लेकिन उत्तरी सियाचिन ग्लेशियर से वापस नहीं लौटे. खोजबीन के बाद 38 साल के इस जवान को सेना जब नहीं ढूंढ़ पाई, तो यह मान लिया गया कि गया प्रसाद किसी गहरी बर्फीली खाई में गिर गए होंगे, जिससे उसकी मौत हो गई होगी. लेकिन इसकी पुष्टि 18 साल बाद 3 दिन पहले हुई.

रविवार को सेना के जवान उत्तरी ग्लेशियर के खंडा और डोलमा पोस्ट के बीच गश्त कर रहे थे. इसी दौरान उन्हें गया प्रसाद का शव बर्फ में ढका मिला. कहा जा सकता है कि कुदरत ने देश के प्रहरी के शव को सुरक्षित रखा था. शव के एक पॉकेट में जवानों को एक पत्र भी मिला. यह पत्र कंपनी कमांडर ने कमांडिंग ऑफिसर को लिखा था.

गौरतलब है कि हर महीने सियाचिन ग्लेशियर की इन चौकियों पर नई बटालियन जिम्मेदारी संभालती है. लेकिन पत्र की वजह से प्रसाद की पहचान करना मुश्किल नहीं था. सेना के अधिकारियों ने कहा कि गया प्रसाद के शव से मिले पत्र में बटालियन का जिक्र था, इसलिए उनकी पहचान करना मुश्किल नहीं था.

अधिकारी ने कहा, 'एक बार हमें यूनिट की जानकारी मिल गई, तो उनकी जड़ का पता लगाना मुश्किल नहीं था.' इसके बाद उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के कुरैदया गांव में गया प्रसाद के परिजनों को सूचना दी गई.

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'गया प्रसाद ग्लेशियर में गिरे कैसे यह आज भी रहस्य है, लेकिन जब तक उनका शव नहीं मिला था, उन्हें ग्लेशियर में कठिन परिस्थितियों में देश की सेवा करते हुए युद्ध में मारे गए जवान का दर्जा प्राप्त था.' मंगलवार को गया प्रसाद का शव स्नो स्कूटर पर रखकर उस क्षेत्र में ले जाया गया, जहां से उसे एयरलिफ्ट किया जा सके. इसके बाद आर्मी के चीता हेलीकॉप्टर से लेह के जनरल हॉस्पिटल ले जाया गया.

सूत्रों के मुताबिक गया प्रसाद का शव उनके पैतृक गांव भेजे जाने से पहले चंडीगढ़ ले जाया जाएगा. इटावा जिले के रिटायर्ड सूबेदार मेजर और गया प्रसाद के साथी बादशाह सिंह ने कहा, 'लखनऊ कैंटोनमेंट के राजपूत रेजीमेंट के हेडक्वार्टर को इस बारे में सूचित कर दिया था कि गया प्रसाद के परिवार को सूचना दी जाए.' गया प्रसाद के गुम होने के समय बादशाह सिंह उनके साथ थे. बादशाह सिंह की पोस्टिंग सियाचिन के चुनार और शैला कॉम्प्लेक्स पोस्ट पर थी.

सिंह ने कहा, 'दिसंबर 1996 में वह प्रसाद और अन्य साथियों के साथ ड्यूटी पर थे. दोपहर में अचानक प्रसाद बर्फीली खाई में गिर गए. उनकी खोज के लिए सर्च ऑपरेशन चलाया गया, अन्य राज्यों के अधिकारी भी इसमें शामिल हुए. लेकिन प्रसाद को ढूंढ़ा नहीं जा सका.' गहन खोज अभियान के बाद गया प्रसाद को मृत घोषित कर उनके परिवार को इसकी सूचना दी गई.

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दिसंबर 1999 में प्रसाद के परिजनों को सेना प्रमुख के हस्ताक्षरों वाला सम्मान प्रमाणपत्र मिला, जिसमें लिखा था, 'पाकिस्तानी सेना के खिलाफ 'ऑपरेशन मेघदूत' के दौरान गया प्रसाद मारे गए.'

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