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व्यंग्य: भारत रत्न और भारतीयों की आकांक्षाएं

भारत सरकार ने इस वर्ष भारत रत्न के लिए महामना मदनमोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को चुना है. हर बार देखा गया है कि भारत रत्न की घोषणा होते ही लम्बे-चौड़े विवाद खड़े हो जाते हैं. इक्का-दुक्का बयानों को छोड़ इस बार ऐसा होता नहीं दिखा, जो साफ दर्शाता है कि भारत रत्न इस बार सुपात्रों के नाम के पहले सुशोभित होगा.

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भारत सरकार ने इस वर्ष भारत रत्न के लिए महामना मदनमोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को चुना है. हर बार देखा गया है कि भारत रत्न की घोषणा होते ही लम्बे-चौड़े विवाद खड़े हो जाते हैं. इक्का-दुक्का बयानों को छोड़ इस बार ऐसा होता नहीं दिखा, जो साफ दर्शाता है कि भारत रत्न इस बार सुपात्रों के नाम के पहले सुशोभित होगा. वाजपेयी और मालवीय को भारत रत्न

भारत रत्न की घोषणा होते ही हर साल शुरू हो जाने वाले विवादों की मूल वजह बुद्धिजीवी हैं. तारीख गवाह है, भारतभूमि वीरों और बुद्धिजीवियों से कभी खाली नहीं रही. यहां वीर इतने बसते हैं, जो सात दिन के नेटपैक के दम पर अकेले यूनान, मिस्त्र, रोमां मिटाने और बुद्धिजीवी इतने कि ‘नेता जी’ कहना सही है या ‘नेताजी’ इस बात पर भी चार पन्ने रंगने का हौसला रखते हैं. आप एक नाम रखिये और सामने से बुद्धिजीवी दस और नाम लाकर पूछेगा बताओ ये क्यों नहीं?

भारत रत्न पर खड़े होने वाले विवाद की दूसरी वजह भारत का इतिहास और समृद्ध भूगोल रहा है. इतनी पुरानी सभ्यता, लम्बे-चौड़े भू-भाग में फैला देश और देश के लिए कुछ भी कर जाने का जज्बा, कुल जमा इस देश में महापुरुषों के उभरने और करने के लिए हर क्षेत्र में हमेशा काफी कुछ रहा है. और जब इतना कुछ करने के बाद किसी रोज भारत रत्न की मांग भी कर दी जाए, तो सिर हिलाने के पहले भी सोचना पड़ जाता है. हजार-पांच सौ किलोमीटर में फैले तीन-चार सौ साल पुराने विकसित देशों के साथ ये समस्या नहीं होती क्योंकि उनके पास उंगलियों पर गिने जा सकने लायक महापुरुष ही होते हैं और वहां महान कामों को पुरुस्कारों में तौलने की प्रथा इस कदर भी न है. देश का ज्यादा महान होना भी कभी-कभी मुसीबत बन जाता है.

लेकिन विवादों की असल वजह होती हैं भारतीयों की आकांक्षाएं. अटल जी को भारत रत्न मिलते न मिलते चार जने पीछे से मुलायम सिंह यादव और कांशीराम का नाम लेकर आ जायेंगे. कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि हर बार नेताओं को ही भारत रत्न क्यों? आप कहें पर सचिन तो खिलाड़ी थे, तो बदले में राज्यसभा की सदस्यता दिखा दी जाएगी. कई बार राजनीतिक दल ऐसे-ऐसे लोगों के नाम पर भारत रत्न मांगने बैठ जाते हैं, जिनके नाम गूगल सर्च पर भी नहीं मिलते. ऐसे में आम आदमी के अन्दर भी भारत रत्न की लेकर अकुलाहट शुरू हो जाती है. भारत रत्न पर टीवी डिबेट देख-देख सब्जी लेते हुए मुफ्त धनिए और मिर्च के साथ भारत रत्न भी मांग बैठता है. ये हंसने की बात नहीं, आम आदमी का सन्देश है और सन्देश बिलकुल साफ है- किसी चीज को इतना भी आम न बनाइए कि वो अपना महत्व खोने लगे.

(आशीष मिश्र पेशे से इंजीनियर और फेसबुक पर सक्रिय व्यंग्यकार हैं.)

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