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रुपहले पर्दे पर घटा दुष्कर्म, वास्तविक जीवन में बढ़ा

धुंधली रोशनी या अंधेरा कमरा, विलेन से घिरी बचाव के लिए चीखती हिरोइन और उसे बचाने आता है एक हीरो. 1950-80 के दशक में बॉलीवुड का यह एक तरह से 'फॉर्मूला' बन चुका था.

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धुंधली रोशनी या अंधेरा कमरा, विलेन से घिरी बचाव के लिए चीखती हिरोइन और उसे बचाने आता है एक हीरो. 1950-80 के दशक में बॉलीवुड का यह एक तरह से 'फॉर्मूला' बन चुका था.

हालांकि समय के साथ चलन बदला और सुखद बात यह है कि रजत पर्दे पर यह चलन बेहद कम हो चुका है लेकिन दूसरी तरफ उससे भी अफसोसजनक तथ्य यह है कि पर्दे की दुनिया से बाहर वास्तविक जमीन पर दुष्कर्म के मामले हाल के दिनों में बड़ी तेजी से बढ़े हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 1953 से 2011 के बीच भारत में दुष्कर्म के मामले में 873 प्रतिशत का इजाफा हुआ है.

क्या इसके लिए सिनेमा को कठघरे में खड़ा किया जाय? फिल्म इतिहासकार एस. एम. एम. औसजा कहते हैं कि दुष्कर्म को लेकर युवा मन को बहकाने में सिनेमा को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है.

फिल्म जगत के बीते दो दशक पर नजर डालें- अभिनेता प्राण से लेकर प्रेम चोपडा़ तक, शक्ति कपूर से लेकर रंजीत तक यानी लगभग सभी नकारात्मक किरदार निभाने वाले अभिनेताओं ने बार-बार दुष्कर्मी का किरदार निभाया है. निर्देशक महबूब खान की 'अमर', एन. एन. सिप्पी की 'घर' और राजकुमार संतोषी की 'दामिनी' इसके सटीक उदाहरण हैं.

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लेकिन परिवर्तन का दौर शुरू...
मौजूदा दौर के सिनेमा में दुष्कर्म के दृश्य न के बराबर होने लगे हैं, लेकिन 'मुन्नी बदनाम' और 'शीला की जवानी' जैसे द्विअर्थी गीत और बदन नुमाइशी मादक चित्रण वास्तविक जीवन में महिलाओं के खिलाफ सेक्सुअल अपराध को बढ़ावा देते हैं.

दिसंबर 2012 में हुए दिल्ली के जघन्य दुष्कर्म मामले ने सिनेमा और टीवी पर महिलाओं के चित्रण को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर लोगों के बीच एक गंभीर बहस को जन्म दिया है. फोर्टिस हेल्थकेयर के मशहूर मानोचिकित्सक समीर पारिख कहते हैं कि कुछ भी हो लेकिन महिलाओं के खिलाफ हिसा में सिर्फ सिनेजगत को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता है.

अपराध में बढ़ोतरी के लिए कोई ऐसा पैमाना कठघरे में नहीं रखा जा सकता है. लेकिन यह बात वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुकी है कि आक्रामकता देखना आक्रामकता को बढ़ावा देता है. समय की मांग है कि बदलाव हो, शायद तभी एक बार वरिष्ठ अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकत्री शबाना आजमी ने कहा कि अभिनेत्रियां 'अधिक बेहतर विकल्प देती हैं.'

ट्विटर पर शबाना आजमी ने लिखा कि 'द्विअर्थी गीत, रति दृश्य, लहराते स्तनों वाले विखंडित छवियां, मटकती नाभि, झूलते कूल्हे महिलाओं की स्वायत्तता का हनन करते हैं. ऐसे में हर वर्ग को कठघरे में खड़ा करने की अपेक्षा आरोपों की झड़ी लगाना बहुत आसान है. फिल्म जगत समेत समाज के हर वर्ग को विश्लेषण करने की जरूरत है कि हम कैसे इस अपराध का हिस्सा हैं.'

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