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विपक्षी खेमे में फूट से हुई रामनाथ कोविंद की राह आसान

राष्ट्रपति पद के लिए NDA के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के मुकाबले विपक्ष का उम्मीदवार कौन होगा, इसका फैसला 22 जून को होगा, जब कांग्रेस की अगुआई में तमाम विपक्षी पार्टियां जुटेंगी.

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कोविंद की राह आसान
कोविंद की राह आसान

राष्ट्रपति पद के लिए NDA के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के मुकाबले विपक्ष का उम्मीदवार कौन होगा, इसका फैसला 22 जून को होगा, जब कांग्रेस की अगुआई में तमाम विपक्षी पार्टियां जुटेंगी.

कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद ने ये साफ कर दिया है कि विपक्ष सर्वसम्मति से रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार नहीं मानेगा और मुकाबला होकर रहेगा. विपक्षी उम्मीदवार के नाम के तौर पर एम एस स्वामीनाथन, मीरा कुमार, गोपाल कृष्ण गांधी और सुशील कुमार शिंदे समेत कुछ और नाम चर्चा में हैं.

लेकिन इस बैठक से पहले ही यह बात साफ हो गई है कि विपक्ष की एकता में दरार पड़ चुकी है. रामनाथ कोविंद का नाम उछालकर बीजेपी ने विपक्षी पार्टियों के बीच में फूट डालने में सफलता पा ली है. विपक्ष की एकता की सबसे ज्यादा बात करने वाले नीतीश कुमार जब रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा होने के बाद उनसे मिलने और उन्हें बधाई देने के लिए पटना में राजभवन पहुंच गए, तभी यह बात साफ हो गई कि जेडीयू विपक्षी खेमे से खिसक सकता है.

नीतीश कुमार ने न सिर्फ रामनाथ कोविंद से मुलाकात की बल्कि यह भी कहा कि बिहार के राज्यपाल अगर देश के राष्ट्रपति बनते हैं तो उन्हें खुशी होगी. नीतीश कुमार की मुश्किल यह है कि रामनाथ कोविंद भले ही उत्तर प्रदेश के रहने वाले हो, लेकिन वह महादलित कोरी जाति से आते हैं, जिसे नीतीश कुमार ने अपनी राजनीति में एक प्रमुख वोट बैंक बनाया है. नीतीश कुमार को लगता है कि एक महादलित उम्मीदवार के खिलाफ दिखना और उसके राष्ट्रपति बनने की राह में रोड़े अटकाना उनके वोट बैंक को नाराज कर देगा.

सूत्रों के मुताबिक नीतीश कुमार चाहते हैं कि लालू यादव भी इस बात के लिए तैयार हो जाएं की रामनाथ कोविंद का विरोध नहीं किया जाए. लेकिन लालू यादव इसके लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि भले ही वह महादलित जाति से संबंध रखते हों, लेकिन वह RSS की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं.

उधर मायावती की मजबूरी यह है की रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश के कानपुर से रहने वाले हैं और उनका विरोध करना यह संदेश देगा कि मायावती उत्तर प्रदेश के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनने से रोकना चाहती हैं. यही नहीं गोविंद का दलित होना भी मायावती के लिए गले की हड्डी बन गया है, क्योंकि दलित राजनीति के दम पर अपनी पार्टी खड़ी करने वाली मायावती यह संदेश कभी नहीं दे सकतीं कि उनकी पार्टी एक दलित के राष्ट्रपति होने का विरोध कर रही है. मायावती जानती है कि कोविंद को उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने दलित कार्ड खेला है, जिसका फायदा उसे 2019 के लोकसभा चुनाव में भी मिलेगा. लेकिन चाह कर भी वह कोविंद का विरोध नहीं कर सकतीं, बशर्ते कि विपक्ष की तरफ से भी कोई दलित उम्मीदवार मैदान में उतरे.

रामनाथ कोविंद का उत्तर प्रदेश का होना ही एक बड़ा कारण है, जिसकी वजह से मुलायम सिंह यादव भी उनका समर्थन करने को मजबूर हैं. मंगलवार को मुलायम सिंह यादव ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी BJP के उम्मीदवार का समर्थन करेगी. समाजवादी पार्टी में फूट के बावजूद ये उम्मीद की जा सकती है कि पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी इसी लाइन पर चलेंगे.

बीजू जनता दल और एनसीपी पहले ही इशारा कर चुके हैं कि उन्हें BJP के उम्मीदवार से कोई एतराज नहीं होगा. एआईएडीएमके के भी एक धड़े ने भी कह दिया है कि वो रामनाथ कोविंद को समर्थन करने को तैयार है. ममता बनर्जी अभी तक बीजेपी विरोधी रुख पर कायम है, लेकिन उनको मनाने की जिम्मेदारी चंद्र बाबू नायडू को दी गई है.

मंगलवार को बिहार भवन में दिनभर रामनाथ कोविंद से मुलाकात करने वालों का तांता लगा रहा. उनसे मुलाकात करने के बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता अनंत कुमार ने भरोसे से कहा कि विपक्ष को मनाने के लिए मंथन किया जा रहा है और उन्हें उम्मीद है कि इससे अमृत निकलेगा.

ऐसी सूरत में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों को छोड़कर राष्ट्रपति के उम्मीदवार को लेकर विपक्ष की एकता में फूट साफ दिखाई दे रही है. 22 तारीख की बैठक में क्या होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. विपक्ष का उम्मीदवार अगर मैदान में होगा भी तो उसके पीछे कितनी विपक्षी पार्टियां खड़ी होंगी यह कहना मुश्किल है.

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