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सख्ती के बाद नरमीः कश्मीर पर वाजपेयी के फॉर्मूले से आगे बढ़ने की कोशिश में मोदी?

मनमोहन सरकार ने कश्मीर में तीन गोलमेज सम्मेलन किए, ताकि इसमें कश्मीर से जुड़े सभी दल मिल बैठकर कोई कारगर तरीका निकाल सकें.

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मोदी सरकार ने कश्मीर समस्या पर बातचीत का किया फैसला मोदी सरकार ने कश्मीर समस्या पर बातचीत का किया फैसला

अलगाववादियों के प्रति अब तक सख्त रवैया अपनाने वाली मोदी सरकार ने साढ़े तीन साल बाद कश्मीर पर नया रुख अख्तियार किया है. कश्मीर में अमन-बहाली के लिए मोदी सरकार ने ऐलान किया है कि अब बातचीत की मेज पर सभी पक्षों को लाया जाएगा. पूर्व आईबी चीफ दिनेश्वर शर्मा को सरकार ने सभी पक्षों से बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी है.

मोदी सरकार से पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने भी कश्मीर में शांति कायम करने के लिए कई प्रयास किए. अब तक आक्रामक तेवर दिखाने वाली मोदी सरकार के बदले निर्णय से सवाल उठने लगे हैं कि क्या मोदी सरकार का यह प्रयास कश्मीर में कारगर साबित होगा?

ये था वाजपेयी का सुझाया फॉर्मूला

अब तक कश्मीर को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का सुझाया फॉर्मूला सबसे कारगर माना जा रहा था. रियासत की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी जब तब कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के बताए मार्ग पर चलने की बात करती रही हैं. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कश्मीर में शांति बहाली के लिए वाजपेयी ने ऐसा कौन से रास्ता बताया था जिस पर लगभग सभी दल चलने को तैयार थे.

इंसानियत, जम्‍हूरियत और कश्‍मीरियत

दरअसल, 18 अप्रैल 2003 को कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि 'अभी तक जो खेल होता रहा है मौत का और खून का, वो बंद होना चाहिए. लड़ाई से समस्या हल नहीं होती. आपके जो मसले हैं, वे बातचीत से हल हों. बंदूक से मसले हल नहीं होते. बंदूक से आदमी को मारा जा सकता है उसकी भूख नहीं मिटती'.

वाजपेयी की इसी इच्छाशक्ति के चलते बातचीत का यह दौर कारगिल हमले के बाद भी रुका नहीं. हालांकि, ये कोशिश किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी.  

सभी पक्षों की नुमाइंदगी की पैरवी

वाजपेयी ने कश्मीर में शांति के लिए सभी पक्षों के नुमाइंदों की पैरवी की थी. उन्होंने घाटी में अमन के लिए इंसानियत, जम्‍हूरियत और कश्‍मीरियत का नारा दिया था. वाजपेयी के इस प्रयास का कश्मीर में अलगाववादियों के चरमपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी और नरमपंथी धड़े के नेता मीरवाइज उमर फारुक ने भी समर्थन किया था. वाजपेयी के शासन में अमन की यह रेल सरपट दौड़ रही थी.

मनमोहन सरकार में गोलमेज सम्मेलन

मनमोहन सरकार के कार्यकाल में भी कश्मीर में शांति के प्रयासों में तेजी ही रही. मनमोहन सरकार ने कश्मीर में तीन गोलमेज सम्मेलन किए, ताकि इसमें कश्मीर से जुड़े सभी दल मिल बैठकर कोई कारगर तरीका निकाल सकें. लेकिन, अलगाववादियों को यह रास न आया. उन्होंने गोलमेज सम्मेलनों का बहिष्कार किया. मनमोहन सरकार में बाकायदा उन्हें निमंत्रण दिया जाता था कि वे सरकार के साथ बातचीत के लिए आएं. अलगाववादी नेताओं के इस सम्मेलन से दूरी बनाए रखने के कारण पूरी कवायद बेकार साबित हुई.

तीन प्रयास भी असफल रहे

कश्मीर में शांति बहाली के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में फरवरी 2006 में पहली बार गोलमेज सम्मेलन हुआ. इसमें विभिन्न दलों से लगभग 45 प्रतिनिधि शामिल हुए थे. इस सम्मेलन में कश्मीर में शांति कायम करने पर रायशुमारी की गई. इसके बाद 24-25 मई 2006 में दूसरा और फिर 24 अप्रैल 2007 में तीसरी बार गोलमेज सम्मेलन हुआ. मनमोहन सरकार इन सम्मेलनों के जरिए कश्मीर में शांति का रास्ता निकालने की कोशिश में थी, लेकिन अलगाववादी नेताओं के अड़ियल रवैये के चलते यह सफल नहीं हो सका.

मोदी सरकार में कसा शिकंजा

मनमोहन सरकार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू से ही अलगाववादियों के प्रति सख्त रवैया अपनाया हुआ था. 25 अगस्त 2014 को इस्लामाबाद में विदेश सचिव स्तर की वार्ता से ठीक पहले अलगाववादी नेताओं के पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित से मिलने के चलते मोदी सरकार ने वार्ता को ही रद्द कर दिया था. उसके बाद से अलगाववादी नेताओं पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया गया. टेरर फंडिंग के आरोप में बीते कुछ महीने से कई बड़े अलगाववादी नेताओं को जेल में डाला जा चुका है. एनआईए सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारुक पर भी शिकंजा कस रही है. लेकिन अब मोदी सरकार ने कश्मीर में शांति के लिए सभी पक्षों से बातचीत का इरादा जताकर बता दिया है कि कश्मीर में अमन-बहाली के लिए वह आक्रामक रवैये से साथ-साथ नरम रुख अपनाने को भी तैयार है.

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