दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि उन लोगों के प्रति किसी तरह की सहानुभूति नहीं दिखायी जा सकती जो जानबूझकर किराया देने में देरी करते हैं. न्यायालय ने यह फैसला सुनाते हुए एक शख्स से कहा कि वह नयी दिल्ली महानगरपालिका परिसर (एनडीएमसी) को खाली करे.
न्यायाधीश कैलाश गंभीर ने हाल में एक फैसले में कहा ‘‘सभी लाइसेंसधारक या आवंटी और यहां तक कि कोई अनधिकृत कब्जा करके रखने वाला उस वक्त तक मासिक लाइसेंस फीस देने को मजबूर है जब तक वह परिसर का इस्तेमाल कर रहा है और ऐसे लोगों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखायी जा सकती जो किराए के भुगतान में जानबूझकर और आदतन देरी करते हैं.’
न्यायाधीश ने यह भी कहा ‘‘याचिकाकर्ता (कुमार) किराए या क्षतिपूर्ति के भुगतान के मामले में आदतन बकाएदार था और नतीजतन भारतीय संविधान की अनुच्छेद 226 के तहत यह अदालत किसी याचिकाकर्ता के हक में अपनी कार्य स्वाधीनता का इस्तेमाल नहीं कर सकती.’ उच्च न्यायालय ने विजय कुमार नाम के एक शख्स की याचिका पर यह फैसला सुनाया.
विजय ने एनडीएमसी ने 1997 में बनी नयी नीति के तहत उसे आवंटित परिसर को नियमित करने के आवेदन को रद्द कर दिए जाने के फैसले को चुनौती दी थी.
हालांकि, न्यायालय ने आर के आश्रम मार्ग स्थित पालिका प्लेस, यूजी-40 खाली करने के लिए विजय को 15 दिन की मोहलत दी और एनडीएमसी को निर्देश दिया कि वह विजय के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई न करे.