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Modi@4: पांच मौके जब करप्शन पर घिरी मोदी सरकार, 'ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा' का था नारा

नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों को हालांकि मोदी सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ बड़ा कदम बताती है लेकिन खासकर विजय माल्या और पीएनबी घोटाले ने वित्तीय अनियमितताओं के मामलों पर सरकार की सख्ती को सवालों के घेरे में खड़ा किया.

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

यूपीए-2 के आखिरी दिनों में लगातार भ्रष्टाचार के खुलासों के माहौल में 2014 के आम चुनाव हुए थे. अपने चुनावी अभियान में पीएम मोदी ने देश से वादा किया था- 'ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा '. इस वादे पर देश ने भरोसा किया और 30 साल में पहली बार देश में पूर्ण बहुमत की कोई सरकार आई. भले ही पिछले 4 सालों में पीएम मोदी पर करप्शन का कोई सीधा आरोप नहीं लगा हो लेकिन कई मंत्री और बीजेपी नेताओं या उनके संबंधियों पर आरोप सामने आते रहे जिसने पार्टी को असहज किया.

नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों को हालांकि मोदी सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ बड़ा कदम बताती है लेकिन खासकर विजय माल्या और पीएनबी घोटाले ने वित्तीय अनियमितताओं के मामलों पर सरकार की सख्ती को सवालों के घेरे में खड़ा किया.

1. पीएनबी घोटाला और बैंक एनपीए का मामला

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पीएनबी में हजारों करोड़ के घोटाले का खुलासा मोदी सरकार के चौथे साल में हुआ. इसका खुलासा हीरा कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी द्वारा फ्रॉड कर बैंकों को चूना लगाने और विदेश भाग जाने के बाद हुआ. इसके बाद तमाम बैंकों से कारोबारियों के लोन लेकर फरार हो जाने और बैंक अधिकारियों की मिलीभगत के मामले खुलने लगे और तब सामने आया देश में बैंकों का 9 लाख करोड़ के एनपीए का गंभीर होता मामला. एनपीए मतलब बैंकों के लोन का वो पैसा जिसे डूबा हुआ मान लिया गया हो.

नीरव मोदी को छोटा मोदी बताते हुए विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने सीधे पीएम मोदी को घेरा और कहा कि विदेशों से काला धन वापस लाने का वादा था और अब दोस्त फ्रॉड कर यहां का पैसा लेकर विदेश भाग जा रहे हैं. यूपीए शासन में 2011 से शुरू हुआ नीरव मोदी का घोटाला मोदी सरकार के आने के 3 साल बाद तक यानी 2017 तक कैसे चलता रहा, इसे लेकर बीजेपी घिर गई. 2019 के चुनाव से पहले पीएम मोदी के लिए नीरव मोदी-मेहुल चोकसी को भारत वापस लाना बड़ी चुनौती बन गई है. इस मामले का खुलासा हुए करीब 3 महीने हो गए हैं लेकिन अब तक जांच एजेंसियां नीरव मोदी की लोकेशन तक पता नहीं लगा सकी हैं.

2. माल्या का विदेश भागना

सरकारी बैंकों का 9000 करोड़ लेकर देश से फरार किंगफिशर के मालिक और उद्योगपति विजय माल्या 2 मार्च 2016 से लंदन में हैं. जब माल्या ने देश छोड़ा तब कर्नाटक से वे राज्यसभा सदस्य थे. राज्यसभा के रिकॉर्ड के मुताबिक विजय माल्या 1 मार्च 2016 को राज्यसभा में उपस्थित थे, और उसके अगले दिन ही 2 मार्च को वह देश से भागने में कामयाब हो गए. माल्या ने डिप्लोमैटिक पासपोर्ट पर लंदन तक की यात्रा की. वहां से माल्या ने राज्यसभा की सदस्यता से अपना इस्तीफा भेज दिया.

भारत सरकार ने विजय माल्या को भगोड़ा घोषित कर पिछले साल ब्रिटेन सरकार को भारत-ब्रिटेन प्रत्यर्पण संधि के तहत प्रत्यर्पण का औपचारिक आग्रह किया था. इस मामले पर ब्रिटेन की अदालत में सुनवाई जारी है. ईडी और सीबीआई की टीमें अपना केस साबित करने के लिए वहां हरसंभव कोशिश कर रही है.

माल्या के मामले को खुद पीएम मोदी ने अपने ब्रिटेन दौरे में वहां की पीएम के साथ उठाया. लेकिन माल्या आराम से विदेशों के दौरे कर रहा है ब्रिटेन में शादी की तैयारियों में जुटा है. फरार होने के बाद 2 साल बाद भी उसे देश वापस नहीं ला पाना मोदी सरकार के लिए मुश्किल भरे सवाल खड़े कर रहा है.

3. ललित मोदी को देश लाने का मुद्दा

24 अप्रैल, 2010 को आईपीएल का तीसरा संस्करण खत्म होने के कुछ हफ्तों के भीतर कारोबारी और आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी ने देश छोड़ दिया. तब से वे लंदन में हैं और वापस नहीं लौटे. लेकिन उनका कारोबार जारी है और सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार वे अपने ऊपर लगे आरोपों पर प्रतिक्रियाएं देते रहते हैं. देश में क्रिकेट मैनेजमेंट में वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े करीब दो दर्जन मामले ललित मोदी पर दर्ज हैं लेकिन किसी में भी वे भगोड़ा घोषित नहीं हैं.

मोदी सरकार के लिए ललित मोदी को लेकर तीन चुनौतियां हैं. एक तो ललित मोदी का मोदी टाइटल विपक्ष को मौका देता है आरोपों से घेरने का. दूसरा राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे से उनकी नजदीकी और ललित मोदी के वकीलों की टीम में सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी स्वराज का होना और तीसरा है- ललित मोदी को देश वापस लाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाना. यहां तक कि सुषमा स्वराज में उल्टे ललित मोदी को ब्रिटेन से बाहर जाने और दुनिया भर में घूमने की इजाजत दिलवा दी, जिसपर विपक्ष ने मोदी सरकार को घेरा और सुषमा को संसद में सफाई देनी पड़ी.

4. जय शाह पर लगे आरोप

द वायर नाम की न्यूज वेबसाइट ने पिछले साल दावा किया कि एनडीए के सत्ता में आने के एक साल के अंदर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी का कारोबार 16,000 गुना बढ़ गया. इस रिपोर्ट के अनुसार, एक साल में कंपनी की आय 50,000 रुपये से बढ़कर 80 करोड़ रुपये हो गई. जय शाह ने रिपोर्ट को झूठा बताते हुए इस लेख की लेखिका रोहिणी सिंह के खिलाफ 100 करोड़ का आपराधिक मानहानि मुकदमा दायर किया हुआ है.

अमित शाह ने इसे सिरे से खारिज किया और मोदी सरकार के तमाम मंत्रियों ने भी मोर्चा संभाल कर इसे विपक्ष की साजिश करार दिया. अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुनवाई के बाद ही इसकी सच्चाई सामने आएगी. लेकिन ये आरोप मोदी सरकार और बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को बड़ा हथियार दे गया. गुजरात और फिर कर्नाटक के चुनावों में विपक्ष ने इसे खूब उछाला. करप्शन फ्री सरकार का नारा देने वाले पीएम मोदी के खिलाफ 2019 के चुनाव में भी विपक्ष इसे मुद्दा बनाने से नहीं चूकेगा.

5. पीयूष गोयल पर लगे आरोप

विपक्षी दल कांग्रेस ने सबसे ताजा आरोप मोदी सरकार के प्रभावशाली मंत्री पीयूष गोयल पर लगाया है. पीयूष गोयल अभी रेल मंत्री हैं और अरुण जेटली के अस्वस्थ होने की वजह से वित्त मंत्रालय का प्रभार भी संभाल रहे हैं.

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि गोयल ने दस रुपये कीमत के शेयर 9,950 रुपये में ऐसी कंपनी को बेचे, जो ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी रही है. ऐसा तब हुआ जब वह ऊर्जा मंत्री थे. कांग्रेस ने पीयूष गोयल पर आरोप लगाया कि ऊर्जा मंत्री रहते कंपनियों, शेयर और अघोषित संपत्ति की जानकारी भी गोयल ने छुपाई और अपने पद का दुरुपयोग किया.

इसके अलावा मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले को लेकर भी बीजेपी सरकार घिरी. शिवराज सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एसआईटी बनाई, मामला उसके बाद सीबीआई के पास भी पहुंचा लेकिन जांच में अब तक कुछ ठोस सामने नहीं आ पाया. मध्य प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा बीजेपी के लिए और 2019 के लिए ब्रांड मोदी के लिए मुसीबत बना रहेगा.

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