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राजनीति का संतानवाद: लाल को लॉन्‍च करेंगे लालू

लाल भरोसे लालू. यानी राष्‍ट्रीय जनता दल (आरजेडी) अध्‍यक्ष लालू प्रसाद यादव की सियासत अब अपने लाल तेजस्वी के इर्द-गिर्द घूम रही है. लालू अपने बेटे तेजस्वी को लॉन्‍च करने जा रहे हैं. यह पहला मौका नहीं है जब कोई नेता अपनी सियासी विरासत को अपने संतान के हाथों में सौंप रहा है.

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लाल भरोसे लालू. यानी राष्‍ट्रीय जनता दल (आरजेडी) अध्‍यक्ष लालू प्रसाद यादव की सियासत अब अपने लाल तेजस्वी के इर्द-गिर्द घूम रही है. लालू अपने बेटे तेजस्वी को लॉन्‍च करने जा रहे हैं. यह पहला मौका नहीं है जब कोई नेता अपनी सियासी विरासत को अपने संतान के हाथों में सौंप रहा है.

सियासत में संतानवाद की परंपरा काफी पुरानी रही है और करीब-करीब देश के हर सूबे में नेताओं की पूरी फौज मौजूद है, जिन्होंने अपनी संतान को सियासी विरासत सौंपी है या फिर सौंपने की तैयारी कर रहे हैं.

लालू अपने छोटे बेटे तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी बनाने जा रहे हैं. वे उन्‍हें अपनी सियासत की विरासत सौंपने जा रहे हैं. बुधवार को पटना में परिवर्तन रैली के दौरान तेजस्वी को लॉन्‍च किया जाएगा. दरअसल, लालू की नजर 2015 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव पर है और उम्मीदें युवा वोटरों पर टिकी हैं. ऐसे में लालू को लग रहा है कि तेजस्वी तुरुप का पत्ता साबित हो सकते हैं.

गांधी परिवार, ठाकरे परिवार और मुलायम परिवार की तरह ही लालू यादव का उत्तराधिकारी भी परिवार से ही आ रहा है. लालू अपने छोटे बेटे तेजस्वी को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने जा रहे हैं. लालू की प्लानिंग है कि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव तक तेजस्वी यूपी में अखिलेश यादव की तरह पार्टी का चेहरा बन जाए.

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आरजेडी अध्‍यक्ष लालू यादव का कहना है, 'चाहे अखिलेश हो या राहुल, कोई भी हो, राजनेताओं के बच्चे हैं तो वो अनुकरण तो करेंगे ही. काम करेगा, मेहनत करेगा तो आगे बढेगा ही.'

क्रिकेट के मैदान से सियासत के मैदान में उतरे तेजस्वी यादव की उम्र फिलहाल 23 साल है, शायद इसीलिए उन्होंने सबसे पहले यूथ कार्ड का दांव खेला है. तेजस्वी यादव अगले चुनाव में युवाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात कह रहे हैं.

तेजस्वी यादव का कहना है, 'लालूजी ने कहा कि आनेवाले विधानसभा में हम 40 से 50 फीसदी टिकट युवाओं को देंगे चाहे किसी भी जाति धर्म का हो जो भी मेहनती होगा जो भी समाज सेवा में यकीन रखता होगा हम लोग चर्चा करके, परख के उसको टिकट देगें.'

लालू प्रसाद के मुताबिक, 'पार्टी में जितने भी नेता हैं उनके रिश्तेदार पार्टी में रहते हैं. जिस पार्टी में परिवार के लोग होते हैं वे उसके प्रति वफादार होते हैं. अब मेरा बेटा है, बेटी है या पत्‍नी तो ये लोग आरएसएस या बीजेपी का गुणगान तो नहीं करेंगे. ये अपनी पार्टी को बढ़ाएंगे, पार्टी को सहयोग करेंगे.'

परिवार की सियासत के पक्ष में लालू प्रसाद यादव जो भी दलील दें दूसरी पार्टियां भी उनकी परिवर्तन रैली का मकसद समझ रही हैं. तभी तो बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं ये परिवर्तन रैली नहीं है, ये नेतृत्व परिवर्तन रैली है.

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90 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव की बिहार में सरकार थी तो उस वक्त संकट आने पर उन्होंने कमान अपनी पत्‍नी राबड़ी देवी को सौंप दी थी, लेकिन अब शायद समय बदल चुका है. हर तरफ युवाओं की बातें हो रही हैं, विकास की बातें हो रही हैं इसीलिए वो अपने बेटे के रूप में पार्टी को नया चेहरा देने की कोशिश कर रहे हैं.

छोटे बेटे तेजस्वी को लॉन्‍च करने के लिए लालू ने जोरदार तैयारियां की हैं. और तैयारियों की देखरेख की जिम्मेदारी खुद लालू का परिवार संभाल रहा है. रैली में भीड़ जमा करने के लिए बिहार के कोने-कोने से 13 ट्रेनें बुक की गई हैं, जिसपर करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.

लालू की दूसरी पीढ़ी सियासत में उतर रही है. लेकिन दोनों पीढ़ियों में जमीन-आसमान का फर्क है. एक तरफ हैं लोगों को पुचकारने, डांटने वाले लालू तो दूसरी तरफ हैं एकदम शांत और सौम्य स्वभाव वाले तेजस्वी. एक तरफ हैं ठेठ, गंवई अंदाज में लोगों को लुभाने वाले लालू तो दूसरी ओर हैं तकनीकी और सोशल मीडिया को अपना मंत्र बताने वाले तेजस्वी. ऐसे में सवाल ये कि क्या लालू अपनी पार्टी को पुराने अंदाज से निकालकर मॉर्डन लुक देना चाहते हैं.

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बिहार में लालू परिवार की दूसरी पीढ़ी सियासत में उतर ही है. जमीन तैयार कर दी गयी है, मंच भी तैयार है. लालू ने मई का मनपसंद महीना भी चुना है. लालू की ज्यादातर सफल रैलिया मई महीने में ही रही हैं शायद इसी वजह से बेटे के लिए भी उन्होंने यही महीना चुना. लालू यादव और तेजस्वी यादव की अगर तुलना करें तो बहुत कम ऐसी चीज मिलेंगी जो एक जैसी हों.

मसलन लालू यादव ने छात्र राजनीति से सियासत में कदम रखा, जबकि तेजस्वी को विरासत में मिली सियासत. लालू पटना विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे, वहीं तेजस्वी छात्र राजनीति के बजाय क्रिकेट के मैदान में किस्मत आजमाते रहे. लालू के रोल मॉडल जयप्रकाश नारायण रहे, जबकि तेजस्वी राहुल गांधी की राह पर चल रहे हैं. इमरजेंसी में लालू यादव ने लाठियां खाईं, जेल गए तो दूसरी तरफ तेजस्वी ने बंद कमरों में सियासत का पाठ पढ़ा. लालू यादव जहां ठेठ और देसी बातें करते हैं वहीं तेजस्वी नई पीढ़ी, कंप्यूटर और सोशल मीडिया को अपना मंत्र बता रहे हैं.

लालू से अपनी अलग सोच को तेजस्वी छिपा भी नहीं रहे हैं. वे कहते हैं, 'जाहिर सी बात है, हो सकता है हमारे और लालू यादव की विचारधारा में भी अंतर हो. मतलब आज जिस तरह का जेनेरेशन गैप है, आप आईटी को देख लीजिए, आज कितना एडवांस हो गया है. उस जमाने में ना तो मोबाइल फोन था ना ही लैपटॉप था, तो उतनी जानकारियां होती नहीं थी. आज के जेनेरेशन के पास कम टाइम है. सोशल मीड़िया की भूमिका बढती जा रही है तो हमारा ये प्रयास है कि सोशल मीड़िया के जरिए कि कैसे हम ज्यादा से ज्यादा युवाओं तक पहुंचे.'

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अपने राजनीतिक विरासत के तौर पर लालू यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी को आगे कर दिया है, मगर लोगों से मिलने का अंदाज दोनों का बिल्कुल अलग है. लालू जहां कार्यकर्ताओं को डांटने-फटकारने और पुचकारने के तौर पर जाने जाते हैं, वहीं तेजस्वी का चेहरा शांत और सौम्य है. ऐसे में तेजस्वी का ये अंदाज आरजेडी को कितना रास आता है ये आने वाला वक्त तय करेगा.

लालू प्रसाद यादव को भी अपने बेटे का ये अलग अंदाज बहुत पसंद है. उनका कहना है, 'तेजस्वी का अंदाज अलग है हर आदमी का अपना अंदाज मिजाज होता है. ये लड़का शांत है हमारे बच्चे शांत और शालीन है दोनों है.'

राजनीति में परिवारवाद पर भी तेजस्वी की राय बेबाक है और वो इसे गलत नहीं मानते.  तेजस्वी कहते हैं, 'कश्मीर से कन्याकुमरी तक आप देखिए तो जितने भी बड़े नेता है उनके पुत्र राजनीति में हैं. फिर चाहे उमर अब्दुल्ला हों, अखिलेशजी हों, राहुलजी हों, या जगनमोहन रेड्डी हों या करुणानिधि के बच्चे हों; सबने अच्छा किया है. कई नेता ऐसे हैं जो उतने सफल नहीं हो पाए हैं, लेकिन ये सब जनता के हाथ मे होता है, जो काम करेगा उसको जनता आगे बढाती है.'

कुल मिलाकर लालू का ये लाल पार्टी को पुराने तौर-तरीकों से निकालना चाहता है. लालू की लालटेन को वो कंप्यूटर से जोड़ने की तैयारी कर रहा है, मकसद साफ है, मिशन 2015.

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