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खतरे में राजपूत गौरव की विरासत खेतड़ी

जिस रियासत ने कभी स्वामी विवेकानंद और नेहरू खानदान की मदद की थी, आज उसकी शानदार विरासत सरकारी संरक्षण में मुकदमों के जाल में उलझकर तबाह होने के कगार पर है.

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बहुत-से लोगों ने दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में 170 किमी दूर और जयपुर से उत्तर-पूर्वी दिशा में 150 किमी दूर स्थित खेतड़ी के बारे में सुना भी नहीं होगा. यह मनोरम स्थान राजपूत गौरव का इतिहास-स्थल है जो आज अतीत की लोक कथाओं और किस्सों में सिमट कर रह गया है. यह वही खेतड़ी है जिसकी ओर कभी नरेंद्रनाथ दत्त नाम का शख्स (उसे उस समय स्वामी बिबिदिशानंद के नाम से जाना जाता था) आर्थिक मदद के लिए बार-बार रुख करता और तात्कालिक शासक अजित सिंह बहादुर को लंबे-लंबे पत्र लिखकर अपने विचारों से रू-ब-रू कराता था. अजित सिंह स्वामी के शिष्य थे और उन्होंने ही विवेकानंद नाम सुझाया था. शिकागो में सितंबर 1893 में विश्व धर्म संसद में अपना मशहूर व्याख्यान देने के बाद स्वामी विवेकानंद लौटकर सबसे पहले खेतड़ी ही आए थे.

खेतड़ी ही वह जगह है जहां बचपन में मोतीलाल नेहरू को लेकर उनके बड़े भाई नंदलाल आए थे. नंदलाल वहां के राजा फतेह सिंह के दीवान बनने से पहले शिक्षक थे. इसी खेतड़ी में नंदलाल ने 1870 में फतेह सिंह की मौत की खबर को छिपा लिया था और पास स्थित अलसीसर से अजित सिंह को नौ साल की उम्र में गोद लेकर उनका उत्तराधिकारी बनवाया था. बाद में नंदलाल आगरा चले गए और अंत में वकालत करने के लिए इलाहाबाद में बस गए, जिनकी विरासत को उनके छोटे भाई मोतीलाल और फिर बाद में मोतीलाल के बेटे जवाहरलाल ने आगे बढ़ाया.

विवादों की पोटली
आज करीब 150 साल बाद भी खेतड़ी उत्तराधिकार के मुकदमों का गवाह बना हुआ है जहां अंदाजन 2,000 करोड़ रु. से ज्यादा कीमत की संपत्ति के मालिकाना हक पर जंग छिड़ी हुई है, जिनमें एक तीन सितारा हेरिटेज होटल है, जयपुर का खेतड़ी हाउस है और शहर में पहाड़ी पर स्थित गोपालगढ़ का किला है जो लावारिस पड़ा हुआ है. यह सारी संपत्ति 1987 में खेतड़ी के आखिरी शासक राय बहादुर सरदार सिंह की मौत के बाद से राज्य के संरक्षण में है. सरदार सिंह तलाकशुदा थे जिनका कोई बच्चा नहीं था, जिसकी वजह से उनके निधन के बाद राज्य सरकार को 1956 में बनाया गया लेकिन शायद ही कभी इस्तेमाल किया कानून राजस्थान एस्चीट्स रेगुलेशन ऐक्ट लागू करना पड़ा और उत्तराधिकारी के अभाव में सारी प्रॉपर्टी पर कब्जा लेना पड़ा. तब से कानूनी जंग चली आ रही है. यह लड़ाई तीन पक्षों के बीच है—एक खेतड़ी ट्रस्ट है जिसे सरदार सिंह के वसीयतनामे के हिसाब से बनाया गया था और ट्रस्ट की वेबसाइट के मुताबिक शिक्षा और अनुसंधान कार्यों के लिए सारी प्रॉपर्टी वसीयत में उसे दे दी गई थी. दूसरा पक्ष कानूनी उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में सरदार सिंह के परिजनों का है और तीसरा पक्ष राज्य का है.

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कोर्ट में लड़ाई
इस रियासत से अपनी निकटता का दावा करने वालों को हालांकि अदालतों में बहुत कामयाबी नहीं मिली है. दिल्ली हाइकोर्ट ने 2012 में खेतड़ी ट्रस्ट को बड़ा झटका देते हुए 1987 की उसकी याचिका के खिलाफ फैसला सुनाया, जिसमें सारी शाही संपत्ति को सरकार की ओर से उसे दिए जाने की बात कही गई थी. याचिका पर 30 साल के दौरान 25 जजों ने सुनवाई की और अंत में सरदार सिंह के 1985 के वसीयतनामे की कानूनी वैधता पर फैसला देते हुए अदालत ने कहा कि उसे वसीयतनामे की असलियत पर शक है. इस फैसले के खिलाफ ट्रस्ट की अपील को एक खंडपीठ ने मंजूर कर लिया था लेकिन उस पर फैसला आने में अभी कई और साल लग जाएंगे. नवंबर 2012 में राजस्थान हाइकोर्ट ने अलसीसर के गज सिंह की याचिका को खारिज कर दिया था, जिन्होंने दावा किया था कि वे सरदार सिंह के दत्तक पुत्र होने के नाते उत्तराधिकारी हैं. उन्होंने तो यहां तक दावा किया था कि सरदार सिंह की मौत के बाद अप्रैल, 1987 में उन्होंने ही पारंपरिक ‘पाग दस्तूर’ (उत्तराधिकारियों मनोनीत करने की परंपरा) की रस्म निभाई थी. हाइकोर्ट के दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने हालांकि अगले साल इसमें संशोधन कर डाला, जिसके बाद जुलाई 2014 में जयपुर के कलेक्टर कृष्ण कुणाल ने खेतड़ी की संपत्ति पर कानूनी उत्तराधिकारियों के दावों को दाखिल किए जाने के लिए उन्हें नोटिस जारी किया. मुकदमों की इस फेहरिस्त से रामकृष्ण आश्रम भी अछूता नहीं रह सका, जिसे 1958 में सरदार सिंह ने अपने दादा अजित सिंह बहादुर और स्वामी विवेकानंद की स्मृति में एक भव्य भवन और कई अन्य सुविधाएं दान में दी थीं ताकि राजस्थान में आश्रम का पहला केंद्र वहां खोला जा सके. बीते जून में खेतड़ी ट्रस्ट ने रामकृष्ण मिशन के सचिव स्वामी आत्मनिष्ठानंद के खिलाफ एफआइआर दर्ज करवाते हुए उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने वहां से ट्रस्ट का दफ्तर खाली करवाया है. बाद में ट्रस्ट को उसका दफ्तर सारे सामान के साथ वापस लौटा दिया गया.

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कौन है मालिक?
खेतड़ी हाउस को फर्जी हलफनामों के रास्ते कई बार बेचा गया है. एक बार तो महाराष्ट्र के एक कारोबारी नेता ने सार्वजनिक विज्ञापन देकर उसे बेच डाला था जिसका दावा है कि वह विवादित संपत्ति के कारोबार में है. विडंबना ही है कि यह संपत्ति आधिकारिक तौर से सरकार की हिफाजत में है. फिलहाल मौजूदा ट्रस्टियों में जोधपुर के तत्कालीन महाराजा गज सिंह, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अजित सिंह शेखावत और पृथ्वीराज सिंह अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावशाली लोग हैं लेकिन यह विवाद जितना बड़ा है, उस लिहाज से ये लोग भी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं. इसके अलावा, इन संपत्ति पर इनका कोई आधिकारिक हक नहीं है, इसलिए गज सिंह के मुताबिक, उन्होंने फर्जी खरीदारों, बेचने वालों और अतिक्रमण-कारियों के खिलाफ 10 एफआइआर दर्ज करवाई हैं और वे मानते हैं कि सिर्फ ट्रस्ट ही इनका ख्याल रख सकता है ताकि शिक्षा के प्रसार में इनका इस्तेमाल किया जा सके. पहले विश्व युद्ध में खेतड़ी से 14,000 सैनिकों को लडऩे के लिए भेजा गया था, जिनमें 2,000 ने अपनी जान दे दी थी. आज वही खेतड़ी लापरवाही, भ्रम, छल-कपट और अंतहीन मुकदमों की चपेट में अपनी ढह रही शाही विरासत को बचाने की जंग लड़ रहा है.

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