1 जनवरी 2023! नया साल मनाकर थके हुए लोग जब सो रहे थे, तभी कंझावला की सड़कों पर एक लड़की कार के पहियों के नीचे घसीटी जा रही थी. एक किलोमीटर. दो किलोमीटर. 13 किलोमीटर. घर से नई गुलाबी जैकेट पहनकर निकली ये लड़की मांस का लोथ बनने तक सड़क पर लिथड़ती रही.
अंजलि...! कंझावला कांड...! नए कैलेंडर का नया पूरा महीना इन दो शब्दों के इर्दगिर्द फड़फड़ाता रहा.
तीन साल में दुनिया में कई बादशाहतें बदल गईं. कई नक्शे बदलने को हैं. खुद दिल्ली में कई इमारतें उग आईं, तो कई जंगल गायब हो गए. लेकिन कंझावला केस के पीड़ित वहीं अटके हैं. घर का पता बदलने के बाद भी उनकी पहचान वही रही! उतना ही हिस्सा जिंदा है, जिसमें मरी हुई बेटी की बात या उसकी याद हो, बाकी तमाम जिंदा परिवार लगभग मर चुका.
करण विहार के घर से अब मंगोलपुरी के एक कमरे में शिफ्ट हो चुके बचे-खुचे परिवार से मिलने जब हम पहुंचते हैं तो बेहद घनी बस्ती में भी उनका एड्रेस लोग जानते हैं. वे खुद गाड़ी को यहां-वहां मोड़ने का इशारा करते हैं.
शाम का वक्त. सीधी गली की शुरुआत कबाड़ी की दुकान से होती है. आसपास कोई पेड़ या पंक्षी नहीं. बिजली के तारों से भरी छतों वाली संकरी गली में कोई मौसम नहीं उतरता. न ठंड-न गर्मी और न बसंत.
कुछ घर फर्लांगते ही अंजलि की मां रेखा का मकान है. एक कमरा. कोने में धूल फांकती गैस जैसे दिनों से कुछ न पका हो. बीचोबीच एक बिस्तर, जिसपर बाकी बचा परिवार सोता है. एक मां और दो बेटे. अंजलि के बाद एक और बेटी अशिका भी खत्म हो चुकी.
दुख अमरबेल की तरह रूम में पसरा हुआ दिखता है. ऐसे कि भीतर जाते ही बाहर निकलने की छटपटाहट हो जाए.
तीन साल में तीन सौ से भी ज्यादा बार अलग-अलग माइक्स देख चुकी रेखा सामने ही इंतजार करती दिखीं.
41 साल की मां, जिसकी 20 और 17 बरस की दो बेटियां जा चुकीं, उसके पास कहने को कुछ अलग नहीं. वे टू-द-पॉइंट बोलती हैं, जैसे शब्द नहीं, डेटा की बात हो रही हो.

'अंजलि थी, तो दुनिया अलग थी. उसे सारे शौक थे. काम भी वैसा ही चुना. वेडिंग प्लानर बनने के बाद तिनका-तिनका जोड़कर घर के लिए फ्रिज खरीदा. क्रॉकरी का भी बहुत शौक था. कहती कि मम्मी खीर-हलवा खाओ तो कांच के बर्तन में स्वाद बढ़ जाता है. ये जितने नाजुक बर्तन दिख रहे हैं, सब उसी ने जोड़े.'
'खुद भी किसी नाजुक बर्तन की तरह सुंदर लगती. अपने लिए ड्रायर खरीदा. उसके बाल हल्के थे. मुझसे जिद करती रहती कि फलां तरह की चोटियां गूंथ दो कि बाल भारी लगें. मौत की रात भी नई तरह के बाल बनवाकर निकली थी. अब तो उसके होने से ज्यादा उसके नहीं होने की याद जमा हो चुकी.'
ठिठुरन वाली सर्दी में भी रेखा की आवाज गर्म, जैसे बुखार का ताप उतर आया हो. अंजलि की मौत के वक्त भी उनका डायलिसिस चल रहा था.
अब क्या हाल है?
डायलिसिस तो अब भी होता है हफ्ते में तीन दिन. लेकिन फ्री का बंद हो चुका. अब मैं नजफगढ़ जाती हूं. पहले बड़ी ले जाती थी. फिर छोटी ले जाने लगी. अब वो भी 'एक्सपायर' हो गई तो छोटा बेटा अस्पताल जाता है. वही घर भी संभालता है कि क्या लाना है, या क्या बनाना है, अगर कभी कुछ बना तो!
अंजलि के साथ अशिका यानी दूसरी बेटी का जिक्र आप ही आप चला आता हुआ.
उन्हें क्या हुआ था!
क्या पता बहन. अंजलि हमारे घर की अकेली कमाऊ सदस्य थी. उसकी मौत के बाद अशिका को लगने लगा कि वो कुछ कमाए तो खर्च बंटेगा. हादसे के बाद सरकार से 10 लाख रुपये मिले थे, उसी से गुजारा हो रहा है. अशिका जोर देने लगी कि मैं उसे नौकरी करने दूं. मैं मना करती रही. 10वीं का पेपर ही दिया था उसने. छोटी थी. अंजलि की तरह धूप-छांव नहीं देखी थी. वो कैसे बाहर की दुनिया में टिकती.
इसी साल जून की दोपहर. छोटे बेटे को मैंने रिश्तेदारी में सोनीपत भेज दिया था. मैं और बड़ा बेटा किसी काम से बाजार गए. लौटे तो किवाड़ बंद था. दोपहर थी. कूलर में सो रही होगी, ये सोचकर हम इंतजार करते रहे. कई बार खटखटाने पर भी दरवाजा नहीं खुला. बेटे ने जंगले से झांककर देखा तो अशिका फंदे पर लटकी हुई थी.
वो भी चली गई...मेरे सामने बैठी ये मां एक साथ तीन मौतों को रो रही थी. अशिका के साथ अंजलि दोबारा मर गई. 
एक बेटी के बाद काम के फेर में दूसरी बेटी भी एक्सपायर हो गई. यहीं इसी पलंग पर हमने उसकी लाश को रखा था. हफ्ते में तीन डायलिसिस करा रही मां की आवाज भारी, जैसे आसपास की सारी नमी, सारी ठंड सोखकर जम रही हो.
हादसों और हादसों की यादों से भरे कमरे के एक कोने में अंजलि की फोटो लगी हुई. छोटी बेटी अशिका कहीं नहीं दिखती.
आंखों का इशारा समझते हुए रेखा बताती हैं- दो जवान मौतों के बाद लोगों ने कहा कि घर को कुछ लग गया होगा. पूजा करवा लो. हम बालाजी गए. वहां से लौटे तो पूजा करवाई और दोनों ही फोटो हटा दी. कुछ रोज पहले मीडिया वाले आए थे, तो अंजलि की फोटो वापस निकाली.
पास ही छोटा बेटा बैठा हुआ. वो पूछता है- दीदी की फोटो देखेंगी! कौन सी लाऊं! एक्सपायर्ड या जिंदा वाली!
लगभग 11 साल का बच्चा. पिता के बाद दो बड़ी बहनों को खो चुका भाई. वो एक्सपायर्ड शब्द ऐसे बोलता है, जैसे रसोई में रखे किसी मसाले की बात हो रही हो, या ब्रेड के बासी पैकेट की. इस घर में या तो मौत की बात होती है, या मौत का इंतजार.
अशिका की तस्वीर सामने है. उसे लगभग दुलराते हुए रेखा अपनी गोद में रख लेती हैं. ऊंगलियां फ्रेम के पार उसकी नाक-आंखों-गाल को सहलाती हुई. अंजलि दुबली-पतली थी, और हमारी अशिका एकदम लड्डू जैसी. उसे खाने-पीने का भी भारी शौक था. मौत के बाद मैं तो गुम हो गई थी. वही अपने शौक जता-जताकर खींचकर लाई थी मुझे. अब दो बेटे बाकी हैं. वे ठीक रहें बस...
बाकी मांओं की तरह ये मां बच्चे के इंजीनियर बनने या डॉलर कमाने के सपने नहीं देखती. उसका ख्वाब बस अपने बच्चों को साबुत-सांस लेता हुआ देखना है.
इंसाफ?
ऐसा कोई शब्द तीन सदस्यीय परिवार को नहीं पता. मां कहती हैं- हमने तो दोषियों के लिए फांसी मांगी थी, लेकिन वे जिंदा हैं, अपने घर पर ही रहते हैं.
आपको कैसे पता!
गली के लोग उन्हें जानते हैं. एक पास ही रहता है. फेरी वाले आते-जाते मुझे बताते रहते हैं कि आज वो यहां दिखा, आज वहां दिखा.

एक सहेली भी थी, जिसके साथ अंजलि उस रात थी. मेरी बेटी तो चली गई. उसने शादी भी कर ली. आप लोगों से ही पता चला कि वो ड्रग सप्लायर भी थी. मेरी भोली-भाली अंजलि पता नहीं कैसे उसकी दोस्त बन गई. किसी समय पर मेरा घर चिड़ियाघर लगता था. अब यहां कोई टिक नहीं पाता. बैठो तो खुद ही बाहर भागने का जी करता है.
रेखा से मिलने के बाद हम सुल्तानपुरी पुलिस थाने भी गए.
केस के इनवेस्टिगेशन ऑफिसर की पोस्टिंग दूसरी जगह हो चुकी. नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी कहते हैं- हिट एंड रन नहीं, वो तो सीधा-सीधा हिट एंड ड्रैग केस था. उन्हें पता था कि गाड़ी के नीचे कोई है, फिर भी वे किलोमीटर तक उसे घसीटते रहे. रुकते तो शायद जान बच जाती. केस तो चल रहा है. पुलिस ने तीन महीनों के भीतर सब काम कर दिया था. बाकी जब फैसला आना होगा, आएगा.
केस में एक सहेली गवाह थी. बाद में वो कोर्ट आने से बचने क्यों लगी?
ये तो अक्सर होता है. गवाह समय के साथ होस्टाइल हो जाते हैं. कोई दबाव में आ जाता है, कोई लालच में, और कोई अपनी जिंदगी में रम जाता है. इन्हीं लोगों की वजह से केस खिंच जाता है.
क्या था कंझावला केस...
31 दिसंबर और 1 जनवरी के बीच रात डेढ़ बजे दिल्ली के कंझावला में स्कूटी से लौटती अंजलि को कार सवार युवकों ने टक्कर मार दी. हादसे से बाद आरोपी कार लेकर भाग निकले. पीड़िता कार के नीचे फंसे हुए करीब 13 किलोमीटर तक घिसटती रही. सभी आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए. चार महीनों के भीतर पुलिस ने 800 पेज की चार्जशीट दाखिल की थी. रोहिणी कोर्ट में फिलहाल केस चल रहा है. इसी साल अक्तूबर में मोटर एक्सिडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने परिवार को 36.69 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है.
36 लाख रुपये! दिल्ली या दुनिया की बाकी खबरों से बेखबर पीड़िता की मां को ये बात पता है.
वे कहती हैं- 'कल पैसे मिलेंगे, इसी उम्मीद में हम आज कर्ज ले पा रहे हैं. वरना हफ्ते में तीन दिन ढाई हजार रुपए सिर्फ डायलिसिस के कहां से आते.' कमरे के किराए से लेकर बच्चों की पढ़ाई और गोली-दवा का खर्च जुटाती मां की आवाज अंधेरे कमरे में उगे उस पौधे की तरह, जिसके लिए झरोखे से छनकर आती रोशनी ही अकेला सहारा हो.
कल...कल जब पैसे आ जाएंगे! वे कई बार दोहराती हैं.