वो तारीख भुलाए नहीं भूलती, वो तारीख मिटाए नहीं मिटती, वो तारीख एक टीस है, वो तारीख एक तीर है जो आज भी योग गुरु बाबा रामदेव के कलेजे में तीर की तरह चुभी हुई है.
इस तारीख के दर्द का हिसाब चुकता करने के लिए बाबा आज भी बेचैन हैं. जी हां हम बात कर रहे हैं 4 जून 2011 की जब आधी रात को दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा पर चली थीं पुलिस की लाठियां.
करीब पांच महीने बाद बाबा ने बुधवार को एक बार फिर सरकार के खिलाफ हुंकार भरी है और तारीख दी है चार जून 2012. बाबा रामदेव ने फिर हुंकार भरी है और कहा कि इस बार फिर होगा आंदोलन और तारीख भी वही होगी, 4 जून.
रामदेव फिर ललकार, एक बार फिर उसी तारीख का जिक्र औऱ फिर वही आंदोलन की बातें. वो आंदोलन जिसे बाबा महीनों बीतने के बाद भी भूल नहीं पा रहे हैं. वो आंदोलन जिसका आगाज़ बाबा ने जोश से किया था लेकिन जिसके अंजाम ने उनके होश उड़ा दिए.
रामदेव को 4 जून सिर्फ अपने आंदोलन की खातिर याद नहीं है. ये वो तारीख थी जब रामदेव को रामलीला मैदान में ताकत का तांडव दिखाया गया था. महज़ 24 घंटे के अंदर उनके आंदोलन को कुचल दिया गया.
रामदेव को मौके से जान बचाकर भागना पड़ा. वो भी महिलाओं के कपड़े पहनकर. अपने इस अपमान को रामदेव शायद भूल नहीं पा रहे हैं और शायद भूलना भी नहीं चाहते, इसीलिए उन्होने एक बार फिर महाआंदोलन के लिए उसी तारीख को चुना जो उनके लिए किसी नासूर से कम नहीं.
बाबा ने कहा कि 4 जून 2012 को महाआंदोलन होगा. उस घटना के बाद लोगों में आक्रोश है, गुस्सा है.
लोगों से कहीं ज्यादा ये खुद रामदेव का गुस्सा है. केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके रामदेव ने तय कर लिया है कि अगली 4 चार जून को वो फिर दिल्ली को ही महाआंदोलन के लिए चुनेंगे.
बाबा कहते हैं कि उनके आंदोलन में सब दूध का दूध और पानी का पानी है और कोई भी गुप्त एजेंडा नहीं है, लेकिन इस महाआंदोलन के एलान में उन लोगों को एक खुली चुनौती नजर आ रही है जिन्होने 4 जून की स्याह रात उन्हें वहां से भागने पर मजबूर कर दिया था.
तो क्या एक बार फिर दिल्ली के किसी मैदान में 4 जून की तारीख, एक नया इतिहास लिखने की तैयारी की जा रही है.