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108 घंटे बाद निजाम की सेना ने किया था सरेंडर, ऐसी है भारत में हैदराबाद के विलय की कहानी

अंग्रेजों के जमाने में भी हैदराबाद का अपना अलग सिक्का, कागज के नोट और स्टाम्प था. निजाम की अपनी सेना और सरकार थी. तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के सेक्रेटरी और चर्चित आईसीएस ऑफिसर वीपी मेनन अपनी किताब The story of the integration of the Indian states में लिखते हैं कि हैदराबाद की 85 फीसदी आबादी हिन्दू थी, लेकिन सिविल सर्विस, पुलिस और आर्मी में मुस्लिम महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए थे.

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हैदराबाद का चारमीनार (फोटो-पीटीआई)
हैदराबाद का चारमीनार (फोटो-पीटीआई)

  • 15 अगस्त 1947 को बिना हैदराबाद के आजाद हुआ भारत
  • हैदराबाद में संप्रभु राज्य बनाना चाहते थे निजाम
  • अमेरिका के राष्ट्रपति से की मध्यस्थता की अपील
आज हमारे सपनों का भारत आजाद हुआ था. 15 अगस्त 1947 को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने 'Tryst with Destiny' के चर्चित भाषण में सदियों बाद विश्व पटल पर साकार हो रहे जिस भारत की चर्चा की थी कि उसका भौतिक स्वरूप तब वैसा न था, जैसा आज है.

भारत जब स्वाधीन हुआ तो आजाद हिन्दुस्तान के नक्शे में हैदराबाद शामिल नहीं था. हैदराबाद को भारतीय गणराज्य में शामिल कराने के लिए एक साल से ज्यादा लंबी जद्दोजहद चली. इस प्रक्रिया में कूटनीति के दांव पेच चले गए, ताकत का इस्तेमाल हुआ कुछ लोगों को जान गंवानी पड़ी तब हैदराबाद भारत का हिस्सा बना.

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15 अगस्त 1947 के आसपास हैदराबाद की आबादी 1 करोड़ साठ लाख थी. हैदराबाद संपन्न रियासत थी और इस राज्य से निजाम को सालाना 26 करोड़ की आय होती थी. तब निजाम मीर उस्मान अली हैदराबाद पर शासन कर रहा था. तत्कालीन हैदराबाद 82 हजार वर्ग मील में फैला था. ये क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था.

अंग्रेजों के जमाने में भी हैदराबाद का अपना अलग सिक्का, कागज के नोट और स्टाम्प था. निजाम की अपनी सेना और सरकार थी. तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के सेक्रेटरी और चर्चित आईसीएस ऑफिसर वीपी मेनन अपनी किताब The story of the integration of the Indian states में लिखते हैं कि हैदराबाद की 85 फीसदी आबादी हिन्दू थी, लेकिन सिविल सर्विस, पुलिस और आर्मी में मुस्लिम महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए थे.

3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटेन ने घोषणा की कि 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान को आजादी मिलेगी. भारत में सत्ता कांग्रेस को ट्रांसफर की जाएगी जबकि मुस्लिम लीग को पाकिस्तान दिया जाएगा. लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद नवाब ने फरमान जारी किया कि 15 अगस्त को वे हैदराबाद को स्वतंत्र संप्रभु राज्य घोषित करेंगे.

रियासतों के सामने था भारत या पाकिस्तान चुनने का विकल्प

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बता दें भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने रियासतों को यह विकल्प दिया कि वे भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकती हैं या एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य के रूप में खुद को स्थापित कर सकती हैं. तब लगभग 565 के करीब की ये रियासतें 48 फीसदी भारतीय भूभाग और 28 फीसदी जनसंख्या कवर करती थीं. ये रियासतें भले ही कानूनी रूप से ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा नहीं थीं. लेकिन पूर्णयता ब्रिटिश क्राउन का हिस्सा थीं. तब नवाब की इच्छा थी कि हैदराबाद को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा मिले और हैदराबाद ब्रिटिश कॉमनवेल्थ का सदस्य बने.

वीपी मेनन के अनुसार लॉर्ड माउंटबेटन ने हैदराबाद के लिए डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा सिरे से खारिज कर दिया. अब तक निजाम की ओर से धमकियां दी जाने लगी थी कि अगर भारत में विलय के लिए उनपर जोर दिया गया तो वे पाकिस्तान में शामिल होने की सोच सकते हैं.

8 अगस्त 1947 को निजाम ने लॉर्ड माउंटबेटेन को लिखा कि वे हैदराबाद को न तो भारत में और ना ही पाकिस्तान में शामिल करना चाहते हैं. भारत 15 अगस्त 1947 को बिना हैदराबाद के आजाद हो गया.

निजाम ने ठुकराया जनमत संग्रह का ऑफर

सरदार पटेल के जिम्मे सभी रियासतों के एकीकरण का जिम्मा था. पटेल, वीपी मेनन किसी भी हालत में हैदराबाद को भारत से दूर करने के पक्ष में नहीं थे. भारत के गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने आजादी के बाद एक बार फिर से निजाम के साथ एकीकरण का मुद्दा उठाया, उन्होंने निजाम को जनमत संग्रह का ऑफर दिया, लेकिन 85 फीसदी हिन्दू आबादी पर राज कर रहे निजाम ने इस ऑफर को ठुकरा दिया.

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हैदराबाद ने चेकोस्लोवाकिया को 30 लाख पाउंड हथियार का दिया ऑर्डर

निजाम की मंशा ठीक नहीं थी. निजाम धीरे-धीरे हथियार जमा कर रहे थे. लॉर्ड माउंटबेटन को पता चला कि हैदराबाद ने 30 लाख पाउंड स्टर्लिंग हथियार का ऑर्डर चेकोस्लोवाकियो को दिया है. इस खुलासे ने भारतीय खेमे में सरगर्मी बढ़ा दी.

इधर कासिम रिजवी की शह पर हैदराबाद में रजाकरों ने शहर में मार काट मचाना शुरू कर दिया. हैदराबाद की गैर मुस्लिम आबादी निशाने पर थी. कासिम रिजवी इत्तिहाद-ए-मुस्लिमीन नाम का संगठन चलाता था और कट्टरपंथ का रास्ता चुन रखा था. इसने 2 लाख रजाकरों की सेना बना रखी थी. रजाकरों ने गैर-मुस्लिम इलाकों में हमले शुरू कर दिए और हैदराबाद की आजादी के लिए अभियान चलाने लगे. इन सभी अत्याचारों पर निजाम उस्मान अली ने आंखें मूंद रखी थी.

आगे चलकर निजाम के रूख में और सख्ती आ गई. पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना खुलकर निजाम के साथ आ चुके थे. हैदराबाद से आ रही हिंसा की खबरों से पटेल चिंतित थे. देश भर में सरकार की इस बात के लिए आलोचना हो रही थी कि सरकार हैदराबाद से नरमी से पेश आ रही है.

गवर्नर जनरल बातचीत के जरिए ही मसला हल करना चाहते थे और निजाम को विलय के समझौते पर हस्ताक्षर करवाना चाहते थे, पंडित नेहरू भी बल प्रयोग के पक्षधर नहीं थे. लेकिन हैदराबाद रियासत उग्र हो गई थी, कासिम रिजवी हिंसा पर उतारू हो गया था. पूरे स्थितियों के आकलन के बाद सरदार पटेल आश्वस्त हो गए थे कि बिना सैन्य कार्रवाई के हैदराबाद हाथ आने वाला नहीं है. इस बीच 21 जून 1948 को लॉर्ड माउंटबेटन गवर्नर जनरल के पद से इस्तीफा देकर ब्रिटेन चले गए और सी राज गोपालाचारी भारत के नए गवर्नर जनरल बने.

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निजाम ने अमेरिका के राष्ट्रपति से की मध्यस्थता की अपील

अगस्त 1948 में हैदराबाद रियासत इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाना चाहती थी. हैदराबाद के निजाम ने अमेरिका के राष्ट्रपति को भी दखल देने के लिए चिट्ठी लिखी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने इससे इनकार कर दिया.

आखिरकार 9 सितंबर 1948 को भारत ने तय कर लिया कि हैदराबाद में अब सैन्य कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं है. सेना के दक्षिणी कमान को इसकी सूचना दे दी गई कि उन्हें 13 सितंबर (सोमवार) को तड़के हैदराबाद में प्रवेश करना है.

भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र सिंहजी और मेजर जनरल जयंतो नाथ चौधरी को इस ऑपरेशन की जिम्मेदारी दी गई. तब हैदराबाद में देशभर के मुकाबले सबसे अधिक पोलो ग्राउंड मौजूद थे, इसलिए इस सैन्य ऑपरेशन का नाम ‘ऑपरेशन पोलो’ रखा गया. हैदराबाद में भारतीय सेना को ज्यादा प्रतिरोध का सामना न करना पड़ा. 4 दिन तक चले सशस्त्र संघर्ष के बाद आखिरकार 17 सितंबर 1948 की शाम को हैदराबाद की सेना ने समर्पण कर दिया. 18 तारीख को मेजर जनरल चौधरी की अगुवाई में भारतीय सेना शहर में दाखिल हुई. कुल मिलाकर ये ऑपरेशन 108 घंटे चला और हैदराबाद भारत का अभिन्न अंग बन गया.

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