देश की आजादी के 70 साल पूरे हो गए हैं लेकिन इस आजादी के साथ भारत को एक दर्द भी मिला था. विभाजन का दर्द. आज जब हम आजादी के जश्न की तैयारी कर रहे हैं तो उन कारणों पर भी गौर करना जरूरी है जिनकी वजह से हमें विभाजन का दंश झेलना पड़ा. आखिर क्या थे वो कारण, कौन थे वो लोग जो त्रासदी को टाल सकते थे लेकिन या तो उन्होंने चुप्पी साध ली या वो सरेंडर की मुद्रा में आ गए.
जाने-माने समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया उस समय युवा थे और देश की आजादी और बंटवारे के घटनाक्रम को बहुत करीब से देख रहे थे. 1960 में उनकी 'guilty men of india's partition’ नाम से एक किताब प्रकाशित हुई. यह किताब हिंदी में ’भारत विभाजन के गुनहगार’ नाम से उपलब्ध है. किताब में लोहिया ने विभाजन के आठ मुख्य कारण गिनाए हैं. 1-ब्रितानी कपट, 2-कांग्रेस नेतृत्व का उतारवय (ढलान), 3-हिंदू-मुस्लिम दंगों की प्रत्यक्ष परिस्थिति, 4-जनता में दृढ़ता और सामर्थ्य का अभाव, 5-गांधी की अहिंसा, 6-मुस्लिम लीग की फूटनीति, 7- अवसरों से लाभ उठा सकने की असमर्थता और 8-हिंदू अहंकार.’
ब्रितानी कपट
किताब में लोहिया ब्रितानी कपट के बारे में चर्चा करते हुए उसे तो दोष देते ही हैं लेकिन साथ ही साथ जवाहरलाल नेहरू और दूसरे कांग्रेसी नेताओं के उस कपट में फंसने के लिए भी जोरदार खिंचाई करते हैं. वो लिखते हैं, 'श्री नेहरू ने अपने राजनीतिक मतलबों के लिए लेडी माउंटबेटन का इस्तेमाल किया था. लेडी माउंटबेटन और उनके लार्ड ने भी उसी तरह अपने राजनीतिक मतलबों के लिए श्री नेहरू का इस्तेमाल किया. पारस्परिक लाभ के ऐसे रिश्तों में स्वाभाविक रूप से एक हद तक कोमलता पनप ही आती है.’
कांग्रेस नेतृत्व का उतारवय (ढलान)
साल 1946 के आसपास नोआखाली (नोवाखाली, ये मौजूदा बांग्लादेश के चटगांव मंडल में एक जिला है) में नेहरू से लोहिया की मुलाकात हुई थी. लोहिया के मुताबिक इस मुलाकात के लिए महात्मा गांधी ने उन्हें विवश किया था. इस मुलाकात में नेहरू ने लोहिया से कहा कि वो भारत देश से पूर्वी बंगाल को अलग कर देना चाहते हैं. नेहरू की इस बात का लोहिया के मानस पर गहरा असर पड़ा और वो अपनी किताब में लिखते हैं, 'ये लोग बूढ़े हो गए थे और थक गए थे. वो अपनी मौत के निकट आ गए थे या कम से कम ऐसा उन्होंने सोचा जरूर ही होगा. यह भी सच है कि पद के आराम के बिना ये अधिक दिनों तक जिंदा भी नहीं रहते.’
हिंदू-मुस्लिम दंगों की प्रत्यक्ष परिस्थिति
साल 1946 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण समय था. जहां एक तरफ इस वक्त आज़ादी मिलने की खुशी लोगों में शुरू गई थी और अंग्रेजों का देश से जाना पक्का था वहीं दूसरी तरफ देश का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक दंगे में जल रहा था. महात्मा गांधी और उनके साथ खुद लोहिया दिल्ली से दूर बंगाल के हिंसाग्रस्त इलाकों में शांति के लिए प्रयास कर रहे थे.
गांधी की अहिंसा
लोहिया, महात्मा गांधी से गहरे प्रभावित थे. इस किताब में एक जगह वो कहते हैं कि नेहरू की कुछ बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता लेकिन गांधी की किसी बात पर शक करने की कोई गुंजाइश ही नहीं है. लोहिया चाहते थे कि बंटवारे को लेकर गांधी सख्त रुख लें. वो नेहरू और पटेल को ऐसा करने या ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार करने से न केवल रोकें बल्कि उन्हें ऐसा न करने की कड़ी हिदायत दें. लेकिन गांधी ने ऐसा कुछ नहीं किया. उन्होंने नेहरू से असहमत होने के बाद कांग्रेसजनों से अपने नेताओं की बात मानने के लिए कहा जिससे लोहिया को गहरा धक्का लगा था.
मुस्लिम लीग की फूटनीति
लोहिया ने अपनी किताब में लिखा है कि जिन्ना, मौलाना आजाद से बढ़िया मुसलमान नहीं थे फिर भी भारतीय मुसलमानों ने उन्हें अपनी अगुवाई के लिए चुना. वो लिखते हैं, 'मौलाना आजाद मुस्लिम हितों के मिस्टर जिन्ना से अधिक अच्छे सेवक थे, लेकिन मुसलमानों ने उनकी सेवा को ठुकरा दिया.
हिंदू अहंकार
लोहिया बंटवारे के लिए हिंदूवादी संगठनों को भी जिम्मेदार मानते थे. किताब की भूमिका में वो लिखते हैं. 'अखंड भारत के लिए सबसे अधिक व उच्च स्वर में नारा लगाने वाले, वर्तमान के जनसंघ और उसके पूर्व पक्षपाती जो हिंदूवाद की भावना के अहिंदू तत्व के थे, उन्होंने ब्रिटिश और मुस्लिम लीग की देश के विभाजन में सहायता की.’
जनता में दृढ़ता और सामर्थ्य का अभाव
लोहिया ने अपनी किताब की भूमिका में देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार आठ कारणों में इसका जिक्र किया है लेकिन आगे किताब में साफ तौर से इस वजह के बारे में कोई जिक्र नहीं मिलता है. एक दो जगह उन्होंने जरूर यह कहा है कि अगर जनता एक दूसरे के आपने-सामने न होती और पूरी मजबूती से इस मुश्किल वक्त को पार कर जाती तो हालात दूसरे होते. शायद लोहिया यह कहना चाहते थे कि अगर किसी भी बहकावे की वजह से देश में दंगे नहीं होते और जनता अपने वर्षों पुराने मूल्यों के प्रति मजबूती से खड़ी रहती तो हालात कुछ और होते.
अवसरों से लाभ उठा सकने की असमर्थता
इस किताब में लोहिया ने जो लिखा है उसके मुताबिक भारतीय नेताओं ने अवसरों का फयदा सही से नहीं उठाया. इसके लिए वो नेहरू, पटेल, मौलाना अजाद और दूसरे नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं. लोहिया के मुताबिक अगर भारतीय कांग्रेस के नेता आजादी के लिए जल्दी में नहीं होते तो शायद वो उन अवसरों को देख, पहचान पाते जिनसे बंटवारे को टाला जा सकता था.