मेरे ऑफिस के वॉशरूम में एक महिला सफाई कर्मचारी है, जो अकसर मुझसे कोई न कोई सवाल करती रहती है. कभी मैं उसको जवाब देती हूं और कभी उसके सवालों को हंसी में टाल देती हूं. कभी वो मुझसे कहती है कि जिसके लिए धरती पर रहने के लिए जमीन नहीं उसे मरने के बाद ऊपर भी जगह नहीं मिलती. कभी वो ऑफिस की सारी प्रेग्नेंट लड़कियों से कहती है कि मैडम, अगर बेटा होगा तो मिठाई जरूर खिलाइएगा. कभी वो मुझसे कहती है कि लोग चोरी क्यों करते हैं, कभी वो पूछती है कि पता नहीं यहां पर सबको कामचोरी करने की आदत क्यों है, कभी पूछती है कि क्या सीमेंट में सोने से बुखार आता है?
तो रोज की तरह मैं आज भी जब वॉशरूम गई तो उसने मुझे मुस्कुराकर देखा और पूछने लगी,
''क्या बच्चे बड़े होने के बाद अपने मां-बाप को पूछते हैं?'
मैंने कहा, ''हां पूछते तो हैं, लेकिन कई बच्चे ऐसे हैं जो बड़े होने के बाद मां-बाप की सुध तक नहीं लेते हैं.''
मेरी बात सुनकर वो बहुत हैरान हुई. फिर बोली, ''ऐसा थोड़ी होता है. जिन बच्चों का पेट हम अपना पेट काटकर भरते हैं वो बड़े होने के बाद ऐसे निर्मोही थोड़ी हो जाएंगे.''
मैंने कहा, ''सारे बच्चे एक जैसे नहीं होते, लेकिन वक्त जैसे-जैसे बदल रहा है और जिस तरह से सबके ऊपर तेजी से भागती जिंदगी का दबाव है उसके चलते न चाहते हुए भी बच्चे अपनों से ही पीठ मोड़ लेते हैं.''
मेरे इस प्रैक्टिकल से जवाब ने उसे परेशान कर दिया. उसकी परेशानी मैंने भांप ली और उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, 'परेशान होने की जरूरत नहीं है. अपने बच्चों को अच्छे संस्कार और शिक्षा दो. कुछ पैसा अपने लिए बचाकर रखो ताकि दुख बीमारी में किसी के आगे हाथ न फैलाने पड़े. ...और हो सके तो किसी को भी इन पैसों के बारे में मत बताओ.'
मेरी बात सुनने के बाद उसने पूछा, 'क्या आदमी भी अपनी औरत को पैसा देना बंद कर देते हैं?'
मैंने कहा, 'कई पति अपनी पत्नियों को घर चलाने के लिए पैसे देते हैं और कई नहीं भी देते हैं. लेकिन ऐसी नौबत ही क्यों आए कि किसी पत्नी को पति के पैसों पर निर्भर रहना पड़े. हर स्त्री को अपने पैरों पर खड़ा होना ही चाहिए.'
मेरी ये बात उसे पसंद नहीं आई. कहने लगी, 'मैडम, ये बात तो आपकी एकदम गलत है. पैसा आदमी ही कमाए तो अच्छा है. घर में अगर आदमी पैसा लाए तो बात कुछ और होती है.'
मैंने पूछा, 'औरत को क्यों पैसा नहीं कमाने चाहिए?'
उसने कहा, 'आदमी के हाथ के पैसे में बरकत होती है और घर की इज्जत बनी रहती है. लेकिन अगर औरत घर से बाहर निकले हैं तो लोग उसे बुरी-बुरी नजरों से देखते हैं. घर से बाहर जाकर पैसे कमाने वाली औरतों के साथ पराए मर्द दिल्लगी करते हैं और लोग ये समझते हैं कि इसे तो कुछ भी कहा जा सकता है.'
मैंने कहा, 'ये उन लोगों की प्रॉब्लम है जो अपने पैरों पर खड़ी किसी औरत के बारे में ऐसी बातें सोचते हैं. औरतों को इन बातों की परवाह किए बगैर आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि आर्थिक आजादी के बिना समाज में स्त्रियों को बराबरी का हक नहीं मिल सकता.'
मेरे इस जवाब को सुनकर ऐसा लगा कि जैसे उसकी आस्था और मान्यता को गहरी चोट पहुंची हो. आमतौर पर परेशान सी और दुखी-दुखी सी रहने वाली उस महिला को गुस्सा आ गया. अपने गुस्से को दबाते हुए बोली, 'मैडम, मैंने आपसे कहा न कि घर आदमी के पैसे से ही चले तो उसी में सबकी भलाई है और बरकत भी.'
अब मैंने पलटकर पूछा, 'फिर तुम क्यों कमाती हो?'
उसने कहा, 'मेरी तो मजबूरी है जो सुबह-सुबह मुझे घर से कमाने के लिए आना पड़ता है.'
उस औरत का मानना था कि कमाना मर्दों का काम है फिर भी वह काम करने आ रही थी, आखिर अपनी मान्यताओं को तोड़ कर काम पर आने की उसकी ऐसी क्या मजबूरी रही होगी?
मैं उसकी बात सुनकर सोचते हुए वॉशरूम से बाहर निकल आई.