आम धारणा है कि मां के कामकाजी होने से वे बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पातीं और उनकी सही देखभाल नहीं हो पाती, लेकिन समाजशास्त्रियों की राय इससे कुछ जुदा है. उनका मानना है कि आज के दौर में मां का कामकाजी होना बच्चों की बेहतर परवरिश और अच्छी शिक्षा में मददगार साबित होता है.
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सेंटर फॉर सोशल रिसर्च में निदेशक रंजना कुमारी ने कहा कि आजकल महिलाएं एक ओर मां की भूमिका निभाती हैं और दूसरी ओर ऑफिस भी संभालती हैं. मां का कामकाजी होना कहीं न कहीं बच्चे की अच्छी परवरिश में मददगार ही है.
उन्होंने कहा, ‘‘आज की मां के कामकाजी होने के पीछे कई कारण हैं. परिवारों की आर्थिक जरूरतें बढ़ गईं हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य चीजों पर खर्चा इतना बढ़ गया है, तो काम करना महिला की जरूरत बन गया है. इससे जहां एक ओर महिलाओं को तिहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है, वहीं दूसरी ओर इसके कई फायदे भी हैं.’’
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रंजना ने कहा, ‘‘बाहर काम करने से महिला के व्यक्तित्व में निखार आता है, उसका बाहरी दुनिया से संपर्क बढ़ता है, रोजगार के नए नए अवसर खुलते हैं जिसका फायदा निश्चित रूप से परिवार और बच्चों को ही मिलता है. इससे उसे कार्यालय, परिवार और बच्चों की तिहरी जिम्मेदारी जरूर उठानी पड़ती है, लेकिन साथ ही उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है.’’
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जेएनयू में समाजशास्त्र के प्रोफेसर सुरेन्द्र एस जोधक ने कहा कि महिलाओं के कामकाजी होने का फायदा बच्चों और परिवार को ही मिलता है दरअसल अधिकांश मामलों में वे उनके लिए ही तो काम करती हैं.
उन्होंने कहा, ‘‘महिलाओं के काम करने के कई कारण हैं. एक तो आजकल की शिक्षित महिला अपनी पहचान चाहती है व अपने कॅरियर के प्रति काफी सजग है जिसे किसी भी नजरिए से गलत नहीं कहा जा सकता. दूसरा इसके पीछे मौजूद आर्थिक कारणों को भी नकारा नहीं जा सकता. मध्यम और निम्न वर्ग की महिलाएं आर्थिक कारणों से काम करतीं हैं तो उच्च वर्ग की महिलायें अपनी अलग पहचान के लिए.’’ प्रोफेसर जोधक ने कहा, ‘‘मां का कामकाजी होना बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए बेहतर ही है. इससे उन्हें अच्छे स्कूलों में शिक्षा, बेहतर सुविधाएं आदि मिलतीं हैं और ऐसा नहीं है कि जो महिलाएं काम करतीं हैं, वे अपने बच्चों से प्यार नहीं करतीं, वे उनके लिए ही तो काम करतीं हैं.’’
रंजना ने कहा, ‘‘महिलाओं के कामकाजी होने का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनतीं है और उनके खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में कमी देखने को मिलती है.’’