संसद से पास होने के बाद नागरिकता संशोधन विधेयक का बंगाल, असम, मेघालय और कुछ अन्य राज्यों में पुरजोर विरोध हुआ. शुक्रवार को राष्ट्रपति ने स्वीकृति मिलने से अब यह एक्ट बन गया. इस एक्ट से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हुए गैर कानूनी अप्रवासियों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी, यदि वे हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन या पारसी धर्म से ताल्लुक रखते हों. यह छह धर्म इन तीन देशों में अल्पसंख्यक हैं.
अब इससे यह सवाल उठता है कि भारत में इन देशों से आए लोगों की आबादी है कितनी? इंडिया टुडे की डेटा इंटेलिजेंस यूनिट (डीआईयू) ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि भारत से बाहर पैदा हुए लोगों की संख्या देश की आबादी का 0.4 प्रतिशत भी नहीं है. इसका मतलब यह कि हर 1000 में से 4 लोग ही देश के बाहर जन्मे हैं.
जनगणना के आंकड़े यह भी बताते हैं कि बाहर पैदा होने वाले लोग कौन से देश से आए. जनगणना में दो तरीके से बाहर से आई आबादी को दर्शाया गया है. एक, जो भारत के बाहर पैदा हुए और दूसरे, जिनका पिछला आवास भारत से बाहर था. हमने उन लोगों के आंकड़ों को देखा जिनका पिछला आवास पाकिस्तान या बांग्लादेश में था और पाया कि उनकी ज्यादातर आबादी तो 1990 से भी पहले भारत आ चुकी थी.
क्या कहते हैं आंकड़े
साल 2011 की जनगणना के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में कुल 55 लाख लोग ऐसे थे जिनका पिछला आवास भारत के बाहर था जो कि देश की आबादी का मात्र 0.44 प्रतिशत ही है. इनमें से 23 लाख (42 प्रतिशत) बांग्लादेश से आए और 7 लाख (12.7 प्रतिशत) पाकिस्तान से आए. अफगानिस्तान से आए अप्रवासियों की संख्या 6596 ही थी.

इन आंकड़ों से साफ है कि देश में बाहर से आई आबादी का 55 प्रतिशत तो और पाकिस्तानी और बांग्लादेशी अप्रवासी ही हैं. इन दोनों देशों से आए लोग भारत की कुल आबादी का 0.24 प्रतिशत ही हैं. जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि देश में आए अप्रवासी कितने सालों से यहां रह रहे हैं. इससे कुछ हद तक मालूम होता है कि कितने सालों में कितने लोग बाहर से देश में आए.
हमारे विश्लेषण में पाया गया कि देश में अधिकतम आप्रवासी 1947 के विभाजन और 1971 में हुए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद ही आ गए थे. 1991 से पहले और बाद अप्रवासियों के आगमन का समय जानने के लिए हमने जनगणना 2011 के दौरान उनके भारत में रहने की अवधि को परखा. सेन्सस इस अवधि को पांच भागों में बांटता है - अप्रवासी जिनको भारत में रहते हुए एक साल भी नहीं हुआ था, जो एक से 4 साल से भारत में रह रहे हैं, जो पांच से नौ साल से भारत में रह रहे थे, दस से उन्नीस साल से भारत में रह रहे थे और 20 से ज्यादा सालों से भारत में रह रहे थे.
साल 2011 को मापदंड मानते हुए हम इन आंकड़ों को साल के हिसाब से देखते हैं. इससे हमें पता लग जाएगा 2011 में, 2007 से 2010, 2002 से 2006, 1992 से 2001 और 1991 और उससे पहले कितने अप्रवासी भारत में इन देशों से आए. हमारे आंकलन में पाया गया कि बांग्लादेश की 76 प्रतिशत और पाकिस्तान की 79 प्रतिशत अप्रवासी आबादी तो साल 1990 से पहले ही आ गई थी.
साल 1991 के बाद आए इन देशों के अप्रवासियों की संख्या 21 प्रतिशत भी नहीं रह जाती. 2011 में ही लगभग 22 हजार बांग्लादेशियों ने देश में प्रवेश किया था. यह बांग्लादेश से आए कुल अप्रवासियों की संख्या का एक फीसदी भी नहीं है. साल 2011 में ही 6405 लोग पाकिस्तान से आए थे, यह भी उनकी कुल आबादी का एक प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है.
भारत में आवास
सेंसस के आंकड़ों में यह भी बताया गया है कि देश में कौन से राज्य में कहां के अप्रवासी रहते हैं. 23 बांग्लादेशी अप्रवासियों में से 95 प्रतिशत उन इलाकों में रहते हैं जो बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करते हैं. बांग्लादेश से आए अप्रवासियों की संख्या पश्चिम बंगाल में 82 प्रतिशत, त्रिपुरा में 9 प्रतिशत और असम में 3 प्रतिशत है. पाकिस्तान से आए 28 प्रतिशत अप्रवासी पंजाब में रहते हैं, 17 प्रतिशत दिल्ली में, 15 प्रतिशत हरियाणा में और 9 प्रतिशत राजस्थान में रहते हैं.

पाकिस्तान से आए अप्रवासी महाराष्ट्र (8 प्रतिशत) और गुजरात (4 प्रतिशत) में भी रहते हैं. केवल 2 प्रतिशत पाकिस्तानी आप्रवासी जम्मू कश्मीर में रहते हैं. हमारे आकलन में यह भी पाया गया कि बांग्लादेश के अप्रवासियों के लिए पश्चिम बंगाल ही सबसे लोकप्रिय जगह था.
जनगणना की खामियां
जनगणना की सबसे बड़ी खामी यही है कि इसे हर दस साल में किया जाता है. इसलिए हमारे पास आगंतुकों की लैटेस्ट संख्या मौजूद नहीं है. हालांकि, जनगणना में देश में मौजूद हर व्यक्ति को गिना जाता है लेकिन इससे यह साफ नहीं हो पाता कि इनमें से कितने अप्रवासी गैर कानूनी तरीकों से देश में घुसे. जुलाई 2019 में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोक सभा में एक प्रश्न का जवाब देते हुए कहा था कि गैर कानूनी तरीकों से आने वाले अप्रवासियों का कोई ठोस डेटा नहीं है.

रिफ्यूजी की संख्या
यूनाइटेड नेशंस कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी (UNHCR) से हमें देश में आने वाले शरणार्थियों की संख्या के बारे में पता चलता है. इन आंकड़ों में भी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की संख्या 1- 4 के बीच ही थी. बांग्लादेश से आने वाले रिफ्यूजियों का जिक्र नहीं था. ऐसा इसलिए है क्योंकि मोटे तौर पर किसी को तब रिफ्यूजी का दर्जा दिया जाता है, जब वह अपने देश को छोड़कर इसलिए भाग रहे हों क्योंकि वहां धर्म, जातीयता, राजनीतिक कारणों से उनको प्रताड़ित किया जा रहा था. बांग्लादेश के अधिकतम अप्रवासी आर्थिक कारणों से भारत आते हैं, जिससे वे रिफ्यूजी नहीं कहे जा सकते.
arnigie इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर बांग्लादेशी भारत में गैर कानूनी तरीकों से आते हैं, वह भी छोटे- मोटे काम धंधे के लिए. यदि बांग्लादेशी शरण ले भी रहे हैं तो वे ज्यादातर यूरोप के इटली में जाकर शरण लेते हैं - यह भी UNHCR के डेटा से स्पष्ट हो गया.