समाजवाद को जीवन का मूलमंत्र मानने वाले दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर बदलते राजनीतिक और वैश्विक परिदृश्य के मद्देनजर समाजवाद के तात्कालिक स्वरूप में बदलाव लाना चाहते थे.
समाजशास्त्री कमलेश मानते हैं कि चंद्रशेखर ऐसा समाजवाद चाहते थे जिसमें अमीरी गरीबी का अस्तित्व न हो, जिसमें सभी को बराबर हक मिले और असमानता न हो.
वह कहते हैं ‘‘आज नक्सलवाद जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए चंद्रशेखर के विचार प्रासंगिक हो जाते हैं. वह मानते थे कि असमानता कई समस्याओं की जड़ है और समाजवाद की पहली जरूरत इसी असमानता को खत्म करना है.’’
चंद्रशेखर के पुत्र और बलिया के सांसद नीरज शेखर कहते हैं ‘‘पहले समाजवाद की परिकल्पना समतामूलक समाज और सबके लिए समान अवसर के इर्दगिर्द घूमती थी. आजादी के बाद कांग्रेस से लेकर सभी राजनीतिक दलों ने कहीं न कहीं समाजवाद पर नजर जरूर डाली लेकिन उदारीकरण के बाद इसमें बदलाव आने लगा.’’
नीरज शेखर के अनुसार, चंद्रशेखर भी चाहते थे कि बदलते राजनीतिक और वैश्विक परिदृश्य के मद्देनजर समाजवाद के तात्कालिक स्वरूप में बदलाव होना चाहिए. खास तौर पर वह 1991 के बाद के हालात में इस बदलाव को जरूरी मान रहे थे.
वह कहते हैं ‘‘चंद्रशेखर मानते थे कि उदारीकरण और वैश्वीकरण के लाभ कम और हानियां अधिक हैं . उनका कहना था कि अगर विदेशी कंपनियों को देश में आने की अनुमति दी जाएगी तो इससे उन्हें लाभ और देश की कंपनियों को नुकसान होगा.’’
प्रो आनंद कुमार के अनुसार, यह विडंबना है कि भारतीय लोकतंत्र में फैले अवसरवाद के इस दौर में आज चंद्रशेखर की कोई विरासत उल्लेखनीय रूप से नहीं बची है. फिर भी सांप्रदायिकता, जनतंत्र विरोध, गरीबों की उपेक्षा और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के हर मौके पर चंद्रशेखर एक अच्छे नेता के रूप में याद किये जाएंगे.
एक जुलाई 1927 को उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी में जन्मे चंद्रशेखर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक की डिग्री हासिल की थी. उन्हें छात्र राजनीति का तेजतर्रार नेता माना जाता था.
वह प्रखर समाजवादी आचार्य नरेन्द्र देव के सम्पर्क में आए और समाजवाद का ककहरा सीखा. वह वर्ष 1964 में कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन उन्हें इंदिरा गांधी की गतिविधियों से कड़ा एतराज था. वह वर्ष 1975 में पार्टी से अलग हो गए. चंद्रशेखर को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया था.