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राफेल सौदे पर उठे वे सवाल जिनको CAG रिपोर्ट में भी किया गया स्वीकार

राफेल सौदे पर संसद में पेश CAG की रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी सरकार की डील यूपीए की डील से कुल 2.86 फीसदी सस्ती है. हालांकि इस रिपोर्ट में सीएजी ने भी कई ऐसे बिंदुओं को स्वीकार किया है, जिनका इस सौदे को लेकर सवाल उठाने वाले लोग संकेत करते रहे हैं.

राफेल पर सीएजी की रिपोर्ट संसद में पेश (फोटो: रायटर्स) राफेल पर सीएजी की रिपोर्ट संसद में पेश (फोटो: रायटर्स)

राफेल पर संसद में पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट को जहां सरकार अपनी जीत बता रही है, वहीं विपक्ष अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि इस सौदे में गड़बड़ नहीं हुई है. CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी सरकार ने जो डील की है, वह यूपीए की डील से कुल 2.86 फीसदी सस्ती है. हालांकि इस रिपोर्ट में सीएजी ने भी कई ऐसे बिंदुओं को स्वीकार किया है, जिनका इस सौदे को लेकर सवाल उठाने वाले लोग संकेत करते रहे हैं. कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं-

1. कीमतों की तुलना मुश्किल

सबसे पहले यह बात समझ लें कि सीएजी ने राफेल पर अपनी ऑडिट रिपोर्ट की शुरुआत में ही यह साफ कर दिया है कि यूपीए और एनडीए, दोनों सौदों में कीमत की बिल्कुल सही तुलना नहीं हो सकती. इसकी वजह यह है कि यूपीए के दौरान जो प्रस्तावित सौदा था, उसमें विमानों के भारत में उत्पादन के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को लाइसेंस देने की बात थी. लेकिन मोदी सरकार के सौदे में ऐसा कुछ नहीं है.

सीएजी ने कहा है, '2007 और 2015 के ऑफर की तुलना करने में कई कठिनाइयां है, जैसे 2007 वाले प्रस्ताव में भारत में 108 विमानों के लाइसेंसी उत्पादन की कीमत भी शामिल थी, जबकि 2015 के प्रस्ताव में सिर्फ फ्लाइअवे विमान की बात की गई है. इसलिए तुलना सिर्फ 18 फ्लाइअवे विमानों के कीमत की हो सकती है.

2. यूरोकाफ्टर ने की थी 20 फीसदी सस्ता देने की पेशकश

रिपोर्ट के अनुसार जब यूपीए सरकार के सौदे में गतिरोध आ गया था तो उसके बाद नई सरकार बनने के बाद जुलाई 2014 में यूरोकाफ्टर बनाने वाली कंपनी ईएडीएस ने राफेल से 20 फीसदी कम कीमत पर विमान देने की पेशकश की थी. लेकिन रक्षा मंत्रालय ने कुछ वजह बताकर उसका यह ऑफर स्वीकार नहीं किया.

3. 57 फीसदी कम कीमत के ऑफर को बताया अव्यावहारिक

भारत की तरफ से निगोशिएशन करने वाली टीम ने डिस्काउंट की उम्मीद, मार्केट स्टडी और दसॉ एविएशन की सालाना रिपोर्ट में बताई गई बिक्री कीमत के आधार पर जो बेंचमार्क कीमत तय की थी वह फ्रांसीसी कंपनी के शुरुआती प्रस्ताव से करीब 57 फीसदी कम था. हालांकि सीएजी ने भी इस कीमत को अव्यावहारिक बताया है.

4. न तो बैंक गारंटी और न ही सॉवरेन गारंटी

रिपोर्ट में कहा गया कि पहले तय किया गया था कि फ्रांसीसी कंपनी सौदे पर 15 फीसदी की बैंक गारंटी देगी. कानून एवं न्याय मंत्रालय ने यह सुझाव दिया था कि सौदे पर फ्रांस तरफ से बैंक और सॉवरेन गारंटी ली जाए. लेकिन न तो कंपनी इस पर बैंक गारंटी देने को तैयार हुई और न ही फ्रांस की तरफ से कोई सॉवरेन गारंटी दी गई. इसकी जगह एक 'लेटर ऑफ कॉम्फर्ट' प्रदान किया गया.

5. बैंक गारंटी न मिलने से दसॉ को बचत

रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंक गांरटी और बैंक चार्ज न देने की वजह से जो पैसा वेंडर यानी दसॉ का बच रहा है वह रक्षा मंत्रालय को मिलना चाहिए. रक्षा मंत्रालय ने सीएनजी के इस अनुमान को स्वीकार किया कि कंपनी की इस मद में कितनी बचत हो रही है. पर मंत्रालय ने कहा कि नए प्रस्ताव में यह लागू नहीं है. लेकिन सीएजी का कहना है कि यह 2007 की तुलना में दसॉ एविएशन को एक तरह की बचत ही है.

6. समय से आपूर्ति पर संदेह

सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय निगोशिएशन टीम ने इस बारे में संदेह किया था कि विमानों की आपूर्ति 71 महीनों के तय अवधि में हो पाएगी. टीम ने कहा था कि दसॉ हर साल 11 विमान का उत्पादन करती है और बैकलॉग को देखते हुए ऐसा लगता है कि यही गति रही तो आपूर्ति में सात साल से ज्यादा समय लग जाएगा. इस पर रक्षा मंत्रालय ने कहा कि दसॉ के प्रोजेक्ट समय पर चल रहे हैं और इसकी एक अंतर सरकारी द्विपक्षीय टीम के द्वारा गहराई से निगरानी की जा रही है.

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