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...तो पता कैसे चलेगा ये 'मर्द' सोचते क्या हैं?

निर्भया कांड के दोषी ही क्यों? तेजपाल, पचौरी और गंगेले के मामले का हर पहलू भी सामने आना चाहिए. यदि आरोप सही हैं तो खबरें भी पूरी आएं. दोषियों की बात भी. कि आखिर ऐसे लोगों के दिमाग में चलता क्या है?

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निर्भया कांड
निर्भया कांड

निर्भया केस पर बनी बीबीसी डॉक्युमेंट्री 'इंडियाज डॉटर' (भारत की बेटी) दुनियाभर में प्रसारित की जा चुकी है. भारत में बैन था, इसलिए इसे यूट्यूब पर शेयर कर दिया गया. गुरुवार को दिनभर हजारों लोगों ने इसे देखा. शाम को सरकार ने आपत्ति दर्ज कराई. लेकिन लोग शेयर करते गए. सरकार का विरोध और कोर्ट की पाबंदी इसलिए थी कि इसमें दुष्कर्मी मुकेश ने निर्भया और महिलाओं को लेकर आपत्तिजनक बातें की हैं.

...लेकिन हकीकत कुछ और ही है. ट्विटर पर लोगों ने मुकेश के बयान से ज्यादा उनके पैरोकारों पर आंखें लाल की हैं. एक ऐसी सोच पर जो अब भी चाहती है कि महिलाएं घर में रहें और बाहर जाएं तो पिता, भाई या पति के साथ.

दुष्कर्मियों के वकील एमएल शर्मा कहते देखे गए कि हमारा कल्चर बेस्ट है. लेकिन उसमें महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है. महिलाएं फूल की तरह हैं. उन्हें नाली के पास रखोगे तो वे खराब हो जाएंगी. मंदिर में रखोगे तो वे पूजी जाएंगी. वे हीरे की तरह हैं. सड़क पर रखोगे तो कुत्ते उठा ले जाएंगे.

इसी तरह दोषियों के दूसरे वकील एपी सिंह कहते हैं कि लड़कियों को अंजान ब्वॉय फ्रेंड के साथ नहीं जाना चाहिए. उन्हें आठ-साढ़े आठ बजे तक घर लौट आना चाहिए. निर्भया कांड के दोषियों को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद दिए गए अपने बयान पर सिंह अब भी कायम हैं. वे दोहराते हैं कि यदि मेरे परिवार की कोई लड़की शादी से पहले अंजान पुरुषों से संबंध रखे, रिश्ता बनाए तो मुझे उसे अपने फार्म हाउस पर ले जाकर पेट्रोल डालकर आग लगा देने में संकोच नहीं होगा.

अब आप शर्मा और सिंह को क्या कहेंगे? ट्विटर पर तो इन्हें खूब लताड़ा जा रहा है. यहां तक कह दिया गया है कि बीबीसी की डॉक्युमेंट्री पर बैन लगाकर देश की इस पुरुष प्रधान सोच की भद्दी सच्चाई को सामने आने से रोका गया है. लोगों को पता चलना चाहिए कि विकृति सिर्फ आरके पुरम की गंदी बस्ती में ही नहीं पनपती है. जहां निर्भया के दोषियों का घर है. वह तो आलीशान कोठियों में भी उसी ठप्पे के साथ रह रही है.

जेल में दुष्कर्मियों को मनोवैज्ञानिक उपचार देने वाले डॉ. संदीप गोयल बताते हैं कि तिहाड़ जेल में 200 रेप करने वाले कैदी भी हैं. उन्होंने इससे ज्यादा भी रेप किए होंगे, लेकिन उन्हें याद 200 तक ही हैं. इन कैदियों का कहना है कि किसी के पास पैसा है तो वह अपनी मर्जी से अपनी इच्छा पूरी कर लेता है. हमारे पास नहीं है, तो हम अपनी हिम्मत से ऐसा करते हैं.

इस पूरी बातचीत में कॉमन यह है कि सभी का महिलाओं को लेकर अपना-अपना नजरिया है. और वे ही तय कर रहे हैं कि महिलाओं को क्या करना चाहिए. तो वे ही तय करते रहेंगे. फिर कोई घटना हो जाएगी तो महिलाएं सिर्फ विरोध प्रदर्शन करेंगी. कुछ जज्बाती पुरुष उनका साथ देंगे.

यही वजह है कि खबरें रुक नहीं रही हैं. तरुण तेजपाल के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस एसके गंगेले और अब पर्यावरणविद आरके पचौरी. इल्जाम ही सही, पर बड़े ओहदे पर बैठे ये महाशय इसीलिए चर्चा में हैं कि उन्होंने अपनी साथी महिलाओं के साथ बेहद बुरा बर्ताव किया.

तेजपाल को जो करना था, कर दिया. ये पीडि़त के मीडिया में जाने का ही डर था कि ईमेल पर उनका माफीनामा आ गया. पचौरी का प्रेमालाप एफआईआर में है. जस्टिस गंगेले को लेकर राज्यसभा सांसदों ने महाभियोग की मांग की है. कार्रवाई जो भी हो, तेजपाल, पचौरी और गंगेले की बात भी सामने आनी चाहिए. यदि आरोप सही हैं तो खबरें पूरी आनी चाहिए. दोषियों की बात भी. कि आखिर ऐसे लोगों के दिमाग में चलता क्या है?

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