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पेशावर के स्कूल में फंसे एक बच्चे का अपनी अम्मी को खुला खत

डियर अम्मी, मैं 'सेवंथ ए' के सामने वाले वॉशरूम में खुद को बंद किए हुए हूं. बाहर से गोलियों और बच्चों के चिल्लाने की आवाजें रह-रहकर आ रही है. पेशाब और शायद खून की मिली-जुली बदबू मेरे जेहन में घुसी आ रही है. मैं बेहद अकेला और बेहद डरा हुआ हूं.

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Pakistan Attack Pakistan Attack

डियर अम्मी,
मैं 'सेवंथ ए' के सामने वाले वॉशरूम में खुद को बंद किए हुए हूं. बाहर से गोलियों और बच्चों के चिल्लाने की आवाजें रह-रहकर आ रही है. कई बार लगता है कि इनमें से कुछ आवाजें मैं पहचानता हूं. पर दिमाग इतना भारी हो चुका है और ये आवाजें भी इतनी मिली-जुली हैं कि मैं इन्हें अलग-अलग पहचान नहीं पा रहा. पेशाब और शायद खून की मिली-जुली बदबू मेरे जेहन में घुसी आ रही है. मैं अकेला और बेहद डरा हुआ हूं.

बच्‍चों का कत्‍ल-ए-आम: सपनों का यूं मर जाना

अम्मी, जब ये बंदूक वाले अंकल हमारे क्लासरूम का दरवाजा तोड़कर घुसे ना, उससे ठीक पहले अमीना मैम ने हमें एक बढ़िया जोक सुनाया था और सब बच्चे बहुत जोर से हंस रहे थे. मेरी खूबसूरत आंखों वाली दोस्त इनायत भी. वो हंस रही थी और मैं उसे देख रहा था. तभी कोई चिल्लाया कि 'हमला हुआ, हमला हुआ'. अमीना मैम ने फुर्ती से कमरा बंद कर लिया. वे बोल रही थीं कि किसी को कुछ नहीं होगा, लेकिन थोड़ी देर में ही बहुत बड़ा ब्लास्ट हो गया अम्मी और सब कुछ खत्म हो गया. वो गन वाले अंकल ना, बिल्कुल भी अच्छे नहीं हैं. उनकी बंदूकों से कान फोड़ देने वाला शोर निकलता है. उन्होंने हमारी मैम को बालों से पकड़कर घसीटा और हमारे सामने आग के हवाले कर दिया. वे बहुत नापाक लोग हैं. अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भी जगह नहीं देगा. हां अम्मी, मैंने मैम को अपनी आंखों से जलते हुए देखा. जलते शरीर के साथ वह क्लासरूम में इधर-उधर भागीं और फिर गिर पड़ीं.

शुक्रिया... मुझे लाश बनाने के लिए

मेरा जिस्म कांप रहा है ये लिखते हुए. मैंने अपने दोस्तों को शहीद होते देखा. रोते हुए बच्चों की आंखों-दिमागों में गोलियां मार दीं उन्होंने. मेरी अच्छी आंखों वाली दोस्त इनायत को भी. खून से उसका हिजाब लाल हो गया. ब्लैक बोर्ड पर जो लाल छींटे हैं, वह उसी का खून है. मैं पता नहीं क्यों और कैसे, बेंच के नीचे लेटा रहा और बंदूक वाले अंकल के जाते ही भागकर वॉशरूम में आ गया. यहां दरवाजे के की-होल से मुझे आरिफ की लाश दिख रही है. हां वही, लंबी नाक वाला मेरा क्रिकेटर दोस्त. जिसे हम लोग शोएब अख्तर कहते थे. उसकी चेस्ट में गोली लगी है.

...और हमेशा के लिए गुम हो गईं किलकारियां

अम्मी, अगर ये चिट्ठी आपको मिल जाए तो हामिदा आंटी को कहिएगा कि उनकी आंखों के नूर की लाश गुलाब की क्यारियों में पड़ी हुई है. उसे वहां गिरते हुए मैंने खुद देखा है. मेरे दोस्तों को किस बात की पनिशमेंट मिली, मैं नहीं जानता. कुछ भी करके मुझे बचा लेना अम्मी. चॉकलेट, आइसक्रीम, टॉयज, क्रिकेट किट, कुछ भी नहीं चाहिए मुझे. मुझे आप लोग चाहिए. मैं मरने से डरता हूं अम्मी. ये बंदूक वाले बहुत नापाक लोग हैं. अल्लाह इन्हें जहन्नुम में भी जगह नहीं देगा.

(यह खुला ख़त यह भावनाओं के आवेग को व्यक्त करने की कोशिश और लेखक की कल्पना मात्र है. निदा फाजली और बशीर बद्र के इन अशआर की तरह: )

खून के नापाक ये धब्बे खुदा से कैसे छिपाओगे
मासूमों की कब्र पर चढ़कर कौन सी जन्नत जाओगे

उठ उठ के मस्जिदों से नमाजी चले गए,
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया

वही तख़्त है वही ताज है वही ज़हर है वही जाम है,
ये वही खुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है
यहां एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें
तेरा कीर्तन अभी पाप है, अभी मेरा सजदा हराम है

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