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शरिया अदालतों के प्रस्ताव पर BJP बोली- ये 'इस्‍लामिक रिपब्लिक ऑफ इंडिया' नहीं है

ऑल इंडिया मुस्लिम लॉ बोर्ड (AIMPLB) की ओर से देश में हर जिले में शरिया अदालतें (दारुल कजा) खोलने की योजना पर सियासत शुरु हो गई है. बीजेपी से लेकर सपा तक मुस्लिम लॉ बोर्ड के इस फैसले के खिलाफ खड़ी हैं

शरिया अदालत: प्रतीकात्मक फोटो शरिया अदालत: प्रतीकात्मक फोटो

ऑल इंडिया मुस्लिम लॉ बोर्ड (AIMPLB) की ओर से देश में हर जिले में शरिया अदालतें (दारुल कजा) खोलने की योजना पर सियासत शुरू हो गई है. बीजेपी से लेकर सपा तक मुस्लिम लॉ बोर्ड के इस फैसले के खिलाफ खड़े हैं. बीजेपी का मानना है कि देश के गांवों और जिलों में शरिया अदालतों का कोई स्‍थान नहीं है. वहीं सपा कहती है कि देश में एक संविधान है और उसी का पालन होना चाहिए.

बता दें कि AIMPLB ने पूरे देश में शरिया अदालतों का विस्तार करने की योजना बनाई है. इस संबंध में 15 जुलाई को दिल्ली में होने वाली बोर्ड की बैठक में शरिया अदालतों के प्रस्ताव पर चर्चा की जाएगी.

बोर्ड की इस महत्वपूर्ण बैठक में वकीलों, न्यायाधीशों और आम लोगों को शरिया कानून की रूप रेखा के बारे में बताने वाले कार्यक्रमों का सिलसिला तेज करने पर विचार-विमर्श करेगा. जबकि ये बैठक पहले लखनऊ में होने वाली थी.

इसपर सियासी हमले भी शुरू हो गए हैं. बीजेपी प्रवक्‍ता मीनाक्षी लेखी का कहना है 'आप धार्मिक मामलों पर चर्चा कर सकते हैं लेकिन इस देश में न्‍यायपालिका का महत्‍व है. देश के गांवों और जिलों में शरिया अदालतों का कोई स्‍थान नहीं है. देश की अदालतें कानून के अंतर्गत कार्य करती हैं. हमारा देश इस्‍लामिक रिपब्लिक ऑफ इंडिया नहीं है'.

बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने  देश में शरीयत अदालतों के विस्तार की योजना बनाने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की निंदा की है. उन्होंने कहा कि AIMPLB सिर्फ एक गैर सरकारी संगठन है. देश में एक कानून है, जिसे हर किसी को पालन करना चाहिए. AIMPLB का महिला विरोधी दृष्टिकोण है और इसने केवल मुस्लिम महिलाओं का शोषण किया है.

बीजेपी के साथ-साथ सपा भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले के पक्ष में नहीं है. सपा प्रवक्ता जुही सिंह ने कहा कि देश में एक संविधान है जिसका हर किसी को पालन करना चाहिए.

हर जिले में शरिया कोर्ट बनाए जाने पर AIMIM के अध्यक्ष और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट करके कहा कि ये कोर्ट के समानान्तर नहीं है. इसे दारुल कजा कहा जाता है और 1993 से काम कर रहे हैं. मंत्रीजी सुप्रीमकोर्ट द्वारा विष्णु लोचम मामले में दिए गए फैसले को कृपया पढ़िए, जब आपकी सहयोगी संस्था विहिप इस मसले को लेकर कोर्ट गई थी.  संबंधित विभाग का एक मंत्री होने के नाते आपको इस मामले की जानकारी रखनी चाहिए.

ऑल इंडिया मुस्लिम लॉ बोर्ड के सदस्‍य जफरयाब जिलानी ने कहा, 'हम इन्‍हें शरिया अदालत नहीं कहते. ये दारुल कजा हैं. इनमें काजी लोगों के वैवाहिक मतभेद और झगड़े सुलझाता है और अगर मामले का निपटारा नहीं हो पाता तो अलग होने के रास्‍ते सुझाता है.

हर जिले में शरिया अदालतों (दारुल-क़ज़ा) खोलने की बोर्ड की योजना के बारे में पूछे जाने पर जिलानी ने कहा कि दारुल-कज़ा कमेटी का मकसद है कि हर जिले में शरिया अदालतें हों, ताकि मुस्लिम लोग अपने शरिया मसलों को अन्य अदालतों में ले जाने के बजाय दारुल-कज़ा में सुलझायें.

जफरयाब जिलानी ने यह भी कहा कि ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस तरह की व्‍यवस्‍था 1993 में शुरू की थी. यह कोई नई बात नहीं है. केंद्र सरकार का इससे कोई लेना देना नहीं है'. उनका कहना है कि इसे सुप्रीम कोर्ट ने भी जारी रखने की अनुमति दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने पाया था कि यह को समानांतर कोर्ट नहीं है.            

सुन्नी मौलाना सुफियान निजामी AIMPLB के कदम का समर्थन करते हुए कहा कि शरिया अदालतों के विस्तार से शरीयत के तहत आने वाले मुद्दों को आसानी से सुलझाया जाएगा. जबकि बोर्ड के इस कदम को लेकर शिया समुदाय के मौलाना सैफ अब्बास विरोध में है.

AIMPLB ने दावा किया है कि उत्तर प्रदेश में करीब 40 दारुल-कज़ा हैं. एक अदालत पर हर महीने कम से कम 50 हजार रुपये खर्च होते हैं. अब हर जिले में दारुल-कज़ा खोलने के लिये संसाधन जुटाने पर विचार-विमर्श होगा.

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