यह तो होना ही था. भारतीय राजनीति काजल की कोठरी है. इसमें जो भी जाता है, दाग-धब्बों के बगैर बाहर नहीं निकल पाता है. जब अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई तो उन्हें इस बात का फक्र था कि वह एक ऐसी पार्टी बना चुके हैं, जिसकी पूंजी ईमानदारी और पारदर्शिता है. उनके व्यक्तिगत ट्रैक रिकॉर्ड को देखकर विश्वास भी हुआ, लेकिन इस खेल में बैठे महारथियों की मंशा और उनके तरीकों से शायद वह अनजान थे. नतीजा एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिये सामने आया, जिसने उनकी ही नहीं, इस देश के उन तमाम लोगों की नींद उड़ा दी, जो राजनीति में ईमानदारी और पारदर्शिता की तलाश कर रहे थे. अब केजरीवाल के आठ सहयोगी संदेह के घेरे में आ गए हैं.
खुफिया कैमरों के जरिये उनकी ऐसी बातें रिकॉर्ड करने का दावा किया गया, जो उनके सिद्धांतों के विपरीत है. इनसे आम आदमी पार्टी की छवि को धक्का लगना और उन पर उंगलियां स्वाभाविक है. अब पार्टी चाहे कुछ भी कहे, नुकसान तो हो चुका है. स्टिंग करने वालों की विश्वसनीयता और इरादों पर भले ही पार्टी संदेह करे, एक बात तो तय है कि जो टीवी चैनलों पर दिखा, वह कोई सुखद नहीं था और उसने भविष्य के बारे में निराशाजनक संकेत ही दिए.
अब यह बहस चलती रहेगी कि इस स्टिंग में कितना सच है और कितना झूठ. लेकिन एक बात तो पक्की है कि राजनीति में शुचिता की बात अब शायद काफी समय तक न की जाए. भारतीय राजनीति अपनी उसी चाल से चलती रहेगी, जिससे वह चलती रही है, यानी हमें सिर्फ इतना ही सोचना होगा कि कौन कम भ्रष्ट है और किसके दामन में कितने कम दाग हैं. आम आदमी पार्टी के लिए अब आगे का रास्ता कठिन है, इस चुनाव में उससे काफी उम्मीदें थीं और चुनाव पूर्व सर्वेक्षण कुछ ऐसा ही बता रहे थे. पार्टी की छवि घूमिल होने का फायदा किसे हुआ, यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन फिलहाल नुकसान जनता का हुआ.