अखबार का चस्का क्या नहीं करवा सकता. राजस्थान में नागौर जिले के छोटी खाटू गांव के बालाप्रसाद जोशी और जुगल किशोर जैथलिया को भी अखबार और साहित्यिक किताबें पढ़ने का ऐसा ही शौक था.
इसके जुगाड़ में वे इधर-उधर हाथ-पांव मारते रहते. 40-50 किताबें इकट्ठी होने के बाद उन्होंने तीन रु. महीने के किराये पर एक कमरा लिया. उसके बाहर के बरामदे में एक तख्ता रखा. रोज शाम को वे दोनों आते और किताबें फैला लेते. खुद भी पढ़ते और दूसरों को भी बिठा-पकड़कर पढ़वाते.
किताबें खुले में रखे होने से लोगों की भी नजर पड़ती ही. 1958 में दूरदराज के एक गांव में इस तरह खुला एक पुस्तकालय आज यहां के लोगों के लिए गर्व का विषय बन गया है. अब बुजुर्ग हो चले जैथलिया बताते हैं, ''हम जानते थे कि यह खास पहचान बनाएगा क्योंकि इसे शुरू करने से पहले हमने इन वजहों पर गौर किया था कि पुस्तकालय आखिर बंद क्यों होते हैं?''
आज इस दो मंजिला पुस्तकालय की 15,000 से ज्यादा किताबें और हर महीने आने वाली पचासों पत्र-पत्रिकाएं राजस्थान के दूरदराज के, करीब 10,000 की आबादी वाले एक गांव के लोगों के लिए पढ़ने का अच्छा-खासा माहौल बना रही हैं. यहां कई ऐसी दुर्लभ किताबें भी हैं, जिनके लिए गुजरात और पश्चिम बंगाल तक के लेखक-पाठक संपर्क साधते हैं.
व्यवस्थापक छोटूलाल वैष्णव बताते हैं, ''पिछले दिनों गुजरात के एक साहित्यकार ने फोन करके देशिक शास्त्र की प्रति मांगी.'' साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, जैनेंद्र कुमार, नरेंद्र कोहली और राजस्थानी साहित्यकार कन्हैयालाल सेठिया जैसे साहित्यकार यहां आ चुके हैं.
उत्तर प्रदेश के मौजूदा राज्यपाल बी.एल. जोशी, जो यहीं के बाशिंदे हैं, भी अपना खाली वक्त यहां बिताते रहे हैं. मुख्य सड़क मार्ग से कटा होने की वजह से यहां आना किसी के लिए भी कष्टकर ही होता है लेकिन एक बार पुस्तकालय में वक्त बिताने के बाद कोई भी दोबारा आने की कहकर जाता है.
वक्त के साथ पुस्तकालय बड़ा आकार लेने लगा. 1967 में एक भामाशाह ने इसके लिए जमीन दी तो कइयों ने पैसे दिए. जोधपुरी पत्थरों से बने भवन में फर्नीचर के लिए भी गांव वालों ने हाथ खोलकर दान दिया. लेकिन कहीं पर किसी का नाम नहीं गोदा गया.
पुस्तकालय के प्रभारी कपूरचंद बेताला बताते हैं, ''नाम न लिखे जाने की शर्त पर ही लोगों से आर्थिक मदद ली गई है. पैसे वाले तो पैसे देकर नाम लिखवा लेते हैं लेकिन उन लोगों का क्या, जिन्होंने इसके लिए अपना पसीना बहाया, मेहनत की.'' सरकार से भी मदद की चिट्ठी आई लेकिन प्रबंध समिति के लोगों ने इसे लेने से साफ इनकार कर दिया क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इसकी दशा भी दूसरे सरकारी पुस्तकालयों जैसी हो. इस पुस्तकालय की ओर से पिछले 21 साल से हर साल दीनदयाल उपाध्याय साहित्य सम्मान और पिछले दो साल से कन्हैयालाल सेठिया मायड़ भाषा सम्मान भी दिया जा रहा है.
इस पर कभी रुपए-पैसे को लेकर कोई आरोप न लगे, इसके लिए पुस्तकालय का हर साल ऑडिट करवाने और हिसाब-किताब की पारदर्शिता बनाए रखने की व्यवस्था की गई. आय-व्यय का हर साल पर्चा छपवाकर गांव में सार्वजनिक जगहों पर चिपका दिया जाता है. यानी सही मायनों में दूरदराज का एक आदर्श पुस्तक-आलय.