पत्रकार तीन तरह से सटीक शीर्षक लगाता हैः गहरी सोच, सूझ-बूझ, और अच्छी किस्मत. इन तीनों में से सूझ-बूझ ज्यादा भरोसेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि इसमें शक की गुंजाइश नहीं रहती. मीडिया ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के बीच जंग की एक खास विस्फोटक घड़ी में दुश्मनी के ठहराव को बयान करने के लिए एक पसंदीदा शब्द ''ट्रच्स'' (युद्धविराम) का इस्तेमाल किया. शब्द का बिल्कुल सटीक इस्तेमाल.
ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में 'ट्रच्स' की सारगर्भित परिभाषा दी गई हैः ''दुश्मनों या विरोधियों के बीच एक निश्चित अवधि तक लड़ाई रोकने के लिए समझौता.'' युद्धविराम का मतलब जंग खत्म होना नहीं होता, और इस मामले में भी ऐसा नहीं हुआ है. अलबत्ता कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चाहेंगी कि अगले आम चुनाव, या डॉ. मनमोहन सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में अपने बेटे राहुल गांधी की ताजपोशी, इनमें से जो भी पहले हो, तक यह युद्धविराम जारी रहे.
दोनों दावेदार राहुल के शासनकाल में अप्रासंगिक हो जाएंगे, प्रणब इसलिए अप्रासंगिक होंगे क्योंकि वे सेवानिवृत्त होना चाहते हैं, और चिदंबरम इसलिए होंगे क्योंकि अब वे काफी विवादास्पद हो गए हैं. लेकिन प्रणब-चिदंबरम युद्धविराम को, जिसे इतनी सफाई के साथ बहुस्तरीय बैक चैनलों के जरिए अंजाम दिया गया कि देश को उससे ईर्ष्या होगी, बैंडेज की बजाए बैंड-एड से जोड़ा गया. वह हमेशा से मुलम्मा ही था, और वह चंद दिनों के भीतर ही भहरा गया.
गुमराह करने वाली खबरें दिल्ली की पार्टी के भीतर अंदरूनी जंग का तोपखाना है; जंग का मैदान अमूमन अखबारी कागज है; पहले पहल हताहत होने वाले नौकरशाह हैं, खासकर जिनके नाम पर पसंदीदा पद के लिए विचार चल रहा था. सामंतवादी जमाने की एक कहावत हैः अगर राजा को तबाह करना चाहते हैं तो पहले उसके तोते को मार डालो.
मंत्रियों के करीबी अधिकारियों की यही नियति है; वे विपक्ष की लगाई जहरीली घास-पात के जाल में फंस जाते हैं. किसी भी युद्ध की तरह क्षति का दायरा हमेशा लक्ष्य के दायरे से बड़ा होता है. व्यक्ति विशेष की तरह संस्थाएं भी तबाह हो जाती हैं. जब लड़ाई में वित्त और गृह जैसे मंत्रालय शामिल हों तो सरकार निष्क्रिय हो जाती है. यहां छिपकर गोली नहीं दागी जा रही है, यह गृह युद्ध है, जो काफी गंभीर बीमारी का लक्षण है.
सत्ता में स्थिरता महज संख्या की विशेषता, और विधायिका में समर्थन का स्तर नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति को सीनेट में बहुमत की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन बराक ओबामा की चूलें हिल गई हैं. अभी तक डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल को कोई खतरा नहीं है, लेकिन उनके गठबंधन ने अपने आकर्षण का केंद्र गंवा दिया है. उसका बहुमत जवाबदेही टालने की मजबूरी से टिका हुआ है, हालांकि किसी लोकतंत्र में यह मौज अनिश्चित काल तक नहीं रह सकती. सरकार का बने रहना तय हो सकता है, लेकिन शासन अनिश्चित हो जाता है. कोई सरकार अनुशासन और दिशा गंवा दे तो वह बहुत उत्सुकतापूर्ण तरीकों से अपना नुक्सान कर सकती है.
हाल की मिसाल के तौर पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने गरीबी के घाव पर इतने जोश से नमक डाला है कि मतदाता मंत्रियों की दुश्मनी भुलाने के लंबे अरसे बाद भी उसे याद रखेंगे. उनके अर्थशास्त्रियों ने जरूर गुणा-भाग किया होगाः जिंदा रहने के लिए जरूरी न्यूनतम कैलोरी जोड़ा, उसकी लागत का हिसाब लगाया और रोजाना की शहरी जरूरत की 32 रु. की परिभाषा तैयार की जो अब कुख्यात हो गई है. आंकड़े किसी न किसी असंवेदनशील दिमाग के फंदे होते हैं. वे नीति के लिए जरूरी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें राजनीति में मानवीय पुट के साथ तैयार किया जाना चाहिए. यह ऐसा आंकड़ा है जिस पर अहलूवालिया एक-दो बार विचार कर सकते हैं. वे लुटियंस की दिल्ली में सत्ताधारी वर्ग के कुलीन लोगों के लिए कई एकड़ में बने महलों की कतार में भारत के, संभवतः एशिया के सबसे खास आवासीय जोन में रहते हैं. अगर सरकार ने कभी अहलूवालिया के बंगले को बेचने का विचार बनाया तो उससे 400 करोड़ रु. या उससे भी ज्यादा रकम मिल सकती है. योजना आयोग के अर्थशास्त्रियों के पास ऐसे कंप्यूटर हैं, जो गिनती कर सकते हैं और भाग लगा सकते हैं. वे जोड़ सकते हैं कि अहलूवालिया के विस्तृत, मुफ्त में मिले सरकारी आवास में घास के हर पत्ते की कीमत 32 रु. से ज्यादा होगी.
उसी तरह के महल में रहने वाले राजनीतिक कम से कम चुनाव के समय में जवाबदेह होते हैं, और उन्हें मालूम है कि निष्ठुरता की कीमत हार से चुकानी होती है. अहलुवालिया आज जिस मुकाम पर हैं, वहां सिर्फ एक वोट, प्रधानमंत्री के वोट की वजह से हैं. डॉ. मनमोहन सिंह दरियादिल नियोक्ता हैं. अहलूवालिया का इकलौता प्रयाश्चित एक दोस्ताना रवैया रखने वाले टेलीविजन चैनल के जरिए छद्म-प्रयाश्चित के रूप में सामने आया. वह टिप्पणी उस पार्टी के लिए ज्यादा महंगी साबित होगी जिसने उन्हें नियुक्त किया था.
बांग्लादेश युद्ध के हमारे जीवित नायक जनरल जैकब ने मुझे बताया था कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनकी कमान में अंग्रेज जवान एक लंदनिया कविता सुनाया करते थेः अमीर गुलछर्रे उड़ाते हैं, गरीब दोषी ठहराए जाते हैं, दुनियाभर में यही हाल है, है न यह बेतुकी बात!
विश्व युद्ध खत्म होने के कुछ महीनों के भीतर ही गरीब लंदनवासियों ने उस चुनाव में प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल, वह जीनियस जिसने उनके राष्ट्र को बचाया था, को सत्ता से बाहर कर दिया जो एक हिमस्खलन बन गया, क्योंकि वे एक ओर नवाबों या शासकों के शैंपेन उड़ाने और दूसरी ओर खुद पर दोष मढ़े जाने से आजिज आ चुके थे. किसी लोकतंत्र में गरीब की खिल्ली उड़ाने से ज्यादा गुस्सा किसी और बात पर नहीं आता.