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जमीन विवाद: ग्रेटर नोएडा में मत जाना

सर्वोच्च न्यायालय किसानों का पक्ष ले रहा है और नोएडा एक्‍सटेंशन में दो लाख मकान मालिकों की उम्मीदें पस्त हो गई हैं.

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सर्वोच्च न्यायालय ने 27 जून को उत्तर प्रदेश सरकार को खेती की बेशकीमती जमीन का अधिग्रहण करने के लिए ''अत्यावश्यकता'' की धारा का इस्तेमाल करने के खिलाफ यह कहते हुए चेतावनी दी कि अगर ऐसा करना जारी रहा, तो वह दखल देगा, क्योंकि वह 'और नंदीग्राम' नहीं चाहता.

ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में 157 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण की अधिसूचना खारिज करने के इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (जीनिडा) और रियल एस्टेट डेवलपरों की याचिका पर न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम और न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक ने टिप्पणी की, ''हम अपनी आंखें बंद नहीं रखेंगे. आप इसे (कृषि भूमि को) एक तरफ से लेते हैं और दूसरी तरफ दे देते हैं. इसे खत्म करना होगा. यह समाज के एक ही वर्ग का विकास है.''

यह फैसला छह बड़े डेवलपरों के 900 करोड़ रु. की लागत के 6,000 मकानों के निर्माण को प्रभावित करेगा, जो पहले ही 'बुक' किए जा चुके थे.

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आम बोलचाल में नोएडा एक्सटेंशन कहे जाने वाले इस इलाके में भूमि अधिग्रहण पर इलाहाबाद हाइकोर्ट के तीन पुराने फैसलों के साथ देखे जाने पर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से दीर्घकाल में दो लाख से ज्‍यादा मकानों के निर्माण के प्रभावित होने का अंदेशा है.

अदालती आदेशों की इस झ्ड़ी ने उन 30,000 लोगों को चिंतित कर दिया है, जिन्होंने नोएडा एक्सटेंशन में मकान बुक कराए. इनमें से 6,000 लोग अदालती आदेशों से सीधे तौर पर प्रभावित होंगे, क्योंकि उनके घर विवादित क्षेत्रों में हैं. डेवलपर खरीदारों को वैकल्पिक स्थानों की पेशकश कर रहे हैं, लेकिन उनके आश्वासनों से उनकी घबराहट कम नहीं हो पा रही है.

नोएडा एक्सटेंशन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा? कॅन्‍फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स ऑफ इंडिया (क्रेडाई), पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष और गौरसंस बिल्डर्स के प्रबंध निदेशक मनोज गौर कहते हैं, ''नोएडा एक्सटेंशन अभी भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का सबसे सस्ता इलाका है और दो लाख रिहायशी मकान इस क्षेत्र में बनेंगे.

लोगों को चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि डेवलपर उनको वैकल्पिक फ्लैट दे रहे हैं. हमें उम्मीद है कि जीनिडा भूमि अधिग्रहण के ज्‍यादा उचित तरीके अपनाएगा और अंततः लोगों को लाभ होगा.'' मई में जीनिडा की सीईओ रमा रमन ने कहा था कि नए सिरे से भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों से बात चल रही है. उन्होंने कहा था कि किसानों को राज्‍य की नई अधिग्रहण नीति के तहत लाभ दिए जाएंगे और कई किसानों ने अपनी जमीन नई दरों पर बेचने के लिए आवेदन दे दिए हैं.

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खरीदारों में मची घबराहट उन लोगों तक पहुंच रही है, जिन्होंने विवादित जमीन के आसपास फ्लैट बुक करवाए हैं. इंडो-एशियन फ्यूज गियर में एक्जीक्यूटिव 42 वर्षीय पवन कुमार गुप्ता ने रेडीकॉन इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड हाउसिंग के एक प्रोजेक्ट में दो फ्लैट जनवरी 2011 में बुक करवाए थे.

गुप्ता कहते हैं, ''कंपनी दावा करती है कि यह इलाका विवादित क्षेत्र में नहीं पड़ता, लेकिन मैंने देखा है कि निर्माण की गतिविधियां बहुत धीमी हैं. बुकिंग के समय मैंने एक फ्लैट के लिए दो लाख रु. दिए थे, अब बिल्डर एक और किस्त की मांग कर रहा है, लेकिन मैंने भुगतान करने से मना कर दिया है.''

30 वर्ष के प्रतीक अग्रवाल ने गौर सिटी में फ्लैट बुक करवाया था और आइडीबीआइ से कर्ज लिया था. वे आशंकित हैं कि उन्हें मकान पर कभी कब्जा मिलेगा भी या नहीं. अग्रवाल कहते हैं, ''मुझे जरा भी अंदाज नहीं है कि इस संपत्ति की कानूनी हैसियत क्या है. जीनिडा और बिल्डर को इस पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.''

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