जसवंत सिंह चार महीने से कोमा में थे. लंबे इलाज के बाद आखिर वे स्वस्थ होकर घर लौट गए. ऐसा ही कुछ एक दुर्घटना में घायल हुए मशहूर फॉर्मूला वन कार रेसर माइकल शूमाकर के मामले में हुआ, जो छह महीने कोमा में रहने के बाद होश में आए. लेकिन कोमा में पहुंचे कुछ लोगों की कहानियां ऐसी हैं, जिसमें वे जीवित तो नहीं रहे लेकिन मौत से हुए उनके संघर्ष ने दुनिया को चौंकाया-
एलेन एस्पोसितो
6 अगस्त 1941 को छह साल की एलेन एस्पोसितो को अपेंडिक्स के सामान्य से ऑपरेशन के लिए अस्पताल लाया गया. लेकिन ऑपरेशन की बेहोशी से वे कभी बाहर नहीं आ पाईं. पूरे 37 साल 111 दिन वह कोमा में ही रही. 1978 में उसकी उसी अवस्था में मौत हो गई. तब गिनीज़ बुक में दर्ज हुई एलेन को 'स्लीपिंग ब्यूटी' भी कहा गया.
टेरी शियावो
टेरी की खबर जब मीडिया में आई, तब ज्यादातर अमेरिकी कोमा के बारे में नहीं जानते थे. 1990 में टेरी अपने घर में हार्ट फेल होने की वजह से गिरी और परमानेंट कोमा में चली गई. दस साल ऐसे ही रहने के बाद उसके पति ने डॉक्टरों से कहा कि वे उसका लाइफ सपोर्ट निकाल दें. इसका टेरी के परिवार वालों ने विरोध किया. टेरी के बारे में कई वीडियो मीडिया में आए, जिनमें डॉक्टरों के सवालों से उसके शरीर में हरकत दिखाई दे रही थी. समाज में बहस छिड़ी कि यदि उसका लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा दिया जाएगा तो इच्छा मृत्यु को मान्यता मिल जाएगी. टेरी का मामला अमेरिकी कांग्रेस तक गया, जहां इस पर जमकर बहस हुई. कोई फैसला लिया जाता, उसके पहले ही 18 मार्च 2005 को टेरी का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा लिया गया. उसकी 31 मार्च को मौत हो गई.
एरियल शेरॉन
इजराइल के पूर्व सेना प्रमुख और प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन का मामला विचित्र है. वे आतंकी धमकियों का ये कहकर मजाक उड़ाते थे कि वह किसी के डर से बुलेटप्रुफ जैकेट नहीं पहनना चाहते. और उनकी छाती के आकार की ऐसी कोई जैकेट बनी ही नहीं है. लेकिन 4 जनवरी 2006 को उन्हें जबरदस्त हार्ट अटैक हुआ. जिसकी वजह से कोमा में चले गए. जनवरी 2014 में उनकी मृत्यु हो गई. आठ साल बाद.
एंथोनी ब्लैंड
15 अप्रैल 1989, ब्रिटेन के 17 वर्षीय एंथोनी अपनी फेवरेट लिवरपूल फुटबॉल टीम को चियर करने स्टेडियम में पहुंचे थे. लेकिन हिल्सबरो हादसे का शिकार हो गए. खचाखच भरे स्टेडियम में भगदड़ मची और 95 लोगों की मौत हो गई. इसी भगदड़ में एंथोनी बेहोश हुए और शियावो की तरह परमानेंट कोमा में चले गए. शियावो के मामले में तो अमेरिकी कांग्रेस फैसला नहीं ले पाई, लेकिन एंथोनी के परिवार वालों की मांग पर ब्रिटेन की हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि उसकी फीडिंग ट्यूब उसके इलाज का हिस्सा है और उसे हटाया जा सकता है. एंथोनी की 3 मार्च 1993 को मौत हो गई.
केरेन एन क्विनलेन
न्यूजर्सी निवासी केरेन का केस शियावो से भी पहले का है. 14 अप्रैल 1975 को एक शाम उसने दोस्तों के साथ ज्यादा शराब पी ली. 21 वर्षीय केरेन को सांस लेने में तकलीफ हुई और वह कोमा में चला गया. पांच महीने इलाज के बाद डॉक्टरों ने बताया कि वह परमानेंट कोमा में है. हारकर केरेन के माता-पिता ने उसका लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की बात कही. लेकिन डॉक्टरों ने इनकार कर दिया. माता-पिता कोर्ट गए, जहां से उन्हें इजाजत मिल गई. अमेरिकी इतिहास में इच्छा मृत्यु का यह पहला मामला होता, लेकिन केरेन की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा लिए जाने के बाद वह दस साल और जीवित रहा. 11 जून 1985 को उसकी हार्ट फेल होने से मौत हुई.
...और भारत में अरुणा शानबाग, जो 40 साल से कोमा में हैं
जूनियर नर्स के रूप में जब अरुणा शानबाग परेल (मुंबई) के अस्पताल में नौकरी कर रही थीं, तभी वहीं के एक कर्मचारी ने उनका यौन शोषण करने की कोशिश की. इस कोशिश में उसने अरुणा का गला दबा दिया. लंबे समय तक सांस न ले पाने के कारण अरुणा बेहोश हो गईं और तब से अब तक होश में नहीं आईं. 40 साल के इस संघर्ष से निजात दिलाने के लिए अरुणा की दोस्त और वकील पिंकी विरानी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में इच्छा मृत्यु की इजाजत देने से इनकार कर दिया.