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वसुंधरा की तीसरी पारी पर भारी पड़ सकती है तीन नेताओं की सियासी 'यारी'

वसुंधरा राजे पहले 2003 में मुख्यमंत्री बनी थीं, इसके बाद जब 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया तो कमान वसुंधरा राजे को ही सौंपी गई. हालांकि, राजस्थान में हर बार सत्ता परिवर्तन होता है, लेकिन राजे इस बार फिर से सरकार में आने का दावा कर रही हैं.

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राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (फोटो- @YatraGaurav)
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (फोटो- @YatraGaurav)

राजस्थान का चुनावी रण अब टिकट वितरण के दौर तक पहुंच गया है, जिसके मद्देनजर शक्ति प्रदर्शन और दबाव की सियासत भी खुलकर सामने आ रही है. प्रमुख राजनीतिक दल जहां विजयी समीकरण पर माथापच्ची कर जीत सुनिश्चित करने की योजना बना रहे हैं, वहीं सत्ता को प्रभावित करने वाले बड़े जातीय संगठन भी सियासी गलियारों में अपनी भूमिका का एहसास करा रहे हैं. इस क्रम में राजस्थान के तीन बड़े वर्ग यानी ब्राह्मण, जाट और गुर्जर के तीन नेता विद्रोही अंदाज में नजर आ रहे हैं और विशेषकर सत्ताधारी दल को चुनौती देने की रणनीति पर काम करते दिख रहे हैं.

जैसे-जैसे चुनाव प्रचार जोर पकड़ रहा है और मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे इन तीन वर्गों के तीन नेताओं के भाषण भी तीखे होते जा रहे हैं. भींवसर से निर्दलीय विधायक और जाट नेता हनुमान बेनीवाल जहां अपनी पार्टी बनाकर सत्ता को उखाड़ फेंकने का दम भर रहे हैं, वहीं गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के संरक्षक कर्नल किरोणीसिंह बैंसला अपने समाज की मांग पूरा करने वाले दलों को समर्थन की बात कर रहे हैं. इसके अलावा बैंसला तीसरे मोर्चे को भी समर्थन देने को तैयार हैं. वहीं, बीजेपी का साथ छोड़ चुके घनश्याम तिवाड़ी राज्य के बड़े ब्राह्मण नेता हैं और अब अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं.

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इन तीनों ही नेताओं की नाराजगी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन इनका समर्थन किस ओर जाएगा इसे लेकर अभी संशय की स्थिति है. लेकिन ये तीनों ही समुदाय राजस्थान की राजनीति में इतना मजबूत दखल रखते हैं, कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों की नजर इन पर है.

राजस्थान में करी 272 जातियां हैं. इनमें 51 फीसद ओबीसी मतदाता है, जबकि सवर्ण वोटरों की संख्या 18 फीसद है. इसके अलावा अनुसूचित जाति (SC) 18 प्रतिशत और 13 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति (ST) वोटर हैं.

राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत करीब 91 जातियां आती हैं. इनमें जाट, गुर्जर और सैनी के अलावा मुस्लिम ओबीसी भी हैं. साथ ही कुमावत, यादव और विश्नोई भी हैं. जाट वोट 9%, गुर्जर वोट 5% और ब्राह्मण 7% है.

जाट नेता हनुमान बेनीवाल

ओबीसी में सबसे ज्यादा वोट जाट समुदाय का है. प्रदेश में जाट समुदाय का कुल वोट प्रतिशत करीब 9 फीसद है. सूबे की सियासत में बड़ी भागीदारी रखने वाला जाट समुदाय नागौर समेत दूसरे जिलों की करीब 50 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर निर्णायक की भूमिका अदा करता है. नागौर से आने वाले जाट नेता हनुमान बेनीवाल प्रदेश भर के दौरे कर समुदाय को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने 29 अक्टूबर को जयपुर में किसान हुंकार महारैली का आयोजन कर नई पार्टी का ऐलान करने की घोषणा कर दी है.

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बेनीवाल की जाट युवाओं में अच्छी-खासी पैठ है. वो पिछले एक साल से राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में रैलियां कर रहे हैं जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ आ रही है. बेनीवाल तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं और कांग्रेस व बीजेपी के विकल्प के रूप में उभरने के लिए नेताओं को एकजुट कर रहे हैं. बेनीवाल बीजेपी छोड़कर आए भारत वाहिनी पार्टी के नेता घनश्याम तिवाड़ी समेत दूसरे दलों से गठबंधन करने के प्रयास कर रहे हैं.

गुर्जर नेता बैंसला

राजस्थान में गुर्जर समुदाय भी ओबीसी कैटेगरी के तहत आता है. इन समुदाय का करीब 5 फीसदी वोट है. गुर्जर समाज आरक्षण की मांग को लेकर सरकार से नाखुश नजर आ रहा है और गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के संरक्षक के बतौर कर्नल किरोणीसिंह बैंसला इस अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं. सत्ता सुनिश्चित मानकर चल रही कांग्रेस का नेतृत्व सचिन पायलट कर रहे हैं. दिलचस्प है कि पायलट भी गुर्जर समुदाय से आते हैं, ऐसे में बैंसला के बयानों में भी सचिन का जिक्र हो रहा है.

हाल ही में बैंसला ने कहा है कि कांग्रेस की तरफ से सचिन पायलट को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश किया जा रहा है, ऐसे में गुर्जर समाज की सचिन पायलट से उम्मीद बढ़ रही हैं. उन्होंने सचिन पायलट से पूछा है कि अगर वह मुख्यमंत्री बनते हैं तो गुर्जरों को एसटी में आरक्षण देने पर क्या करेंगे. साथ ही मीणाओं के एसटी आरक्षण पर उनका क्या स्टैंड रहेगा. बैंसला ने सचिन पायलट को ये भी याद दिलाया कि उनके पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट ने हिमाचल प्रदेश में गुर्जरों को एसटी वर्ग के तहत आरक्षण दिलवाया था. बैंसला आरक्षण के मुद्दे पर गुर्जर, रेबारी और राजपूत समाज को सरकार के खिलाफ एकजुट करने की कवायद में भी जुटे हैं.

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ब्राह्मण नेता घनश्याम तिवाड़ी

घनश्याम तिवाड़ी बीजेपी के दिग्गज नेताओं में शुमार किए जाते थे. वह भैरोंसिंह शेखावत सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे हैं, लेकिन वसुंधरा सरकार से उनके वैचारिक मतभेद सार्वजनिक तौर पर देखने-सुनने को मिले. 6 बार विधायक निर्वाचित हुए, जिनमें से दो बार उन्हें मंत्री बनने का अवसर भी मिला. 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक मतों से जीत दर्ज करने वाले तिवाड़ी को उम्मीद थी कि वसुंधरा राजे उन्हें मंत्रिमंडल में निश्चित रूप से शामिल करेंगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसके बाद वह वसुंधरा के खिलाफ बयानबाजी करने लगे.

बीजेपी से अलग होकर तिवाड़ी ने 'भारत वाहिनी' नाम से राजनीतिक दल का गठन कर लिया है, जिसे चुनाव आयोग से भी मान्यता मिल गई है. वह ब्राह्मण समाज के बड़े नेता माने जाते हैं. राजस्थान के सवर्ण मतदाताओं में सबसे ज्यादा 7 फीसद ब्राह्मण समुदाय से हैं.

ये वो तीन नेता हैं, जो बीजेपी-कांग्रेस के खिलाफ गठित होकर जनता को तीसरा विकल्प देने का कदम उठा सकते हैं. वहीं, राजपूत करणी सेना भी एक बड़ी चुनौती है, जो आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर बीजेपी से नाराज चल रही है. बहरहाल, अभी राज्य में जमकर सियासी खिचड़ी पक रही है. लेकिन ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या बेनीवाल, बैंसला और तिवाड़ी एक मंच पर आकर वसुंधरा राजे को चुनौती पेश करेंगे.

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