देश के दो सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और राजस्थान. उत्तर प्रदेश का गोरखपुर और राजस्थान का कोटा. गोरखपुर का बीआरडी मेडिकल कॉलेज और कोटा का जेके लोन अस्पताल. दोनों ही सरकारी अस्पताल. दोनों ही अस्पतालों में इलाज के लिए बच्चों का आना काल बन गया. बीआरडी मेडिकल कॉलेज ने अगस्त 2017 तो जेके लोन अस्पताल ने दिसंबर-जनवरी 2019-20 में चंद दिनों में कई बच्चों की जिंदगी छीन ली.
राजस्थान के कोटा में 23-24 दिसंबर को 48 घंटे की अवधि के दौरान जेके लोन सरकारी अस्पताल में 10 बच्चों की मौत के बाद नवजात शिशुओं की मौत की संख्या बढ़ती ही जा रही है. चंद दिनों में एक के बाद करके 100 से ज्यादा बच्चों की मौत ने करीब 2 साल पहले गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 5 दिनों के अंदर 60 से ज्यादा बच्चों की मौत की उस वीभत्स और दर्दनाक घटना की याद दिला दी.
29 महीने बाद फिर लौटा काल
गोरखपुर में बच्चों के लिए काल बने अगस्त महीने के करीब 29 महीने बाद अब कोटा का सरकारी अस्पताल बच्चों के लिए काल बन गया है. पिछले 10-12 दिनों में एक सरकारी अस्पताल में बच्चों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. अब तक 104 बच्चों की मौत हो चुकी है. बच्चों की मौत पर राजस्थान में राजनीति भी चरम पर पहुंच गई है.
गोरखपुर में 2 साल पहले जब बच्चों की मौत की घटना हुई तब राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने इस घटना पर बीजेपी सरकार की जमकर आलोचना की, लेकिन राजस्थान में कांग्रेस राज में मौत की यह घटना हुई तो बीजेपी गहलोत सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है और मुख्यमंत्री से इस्तीफा तक मांग रही है.
CAA पर ध्यान हटाने की कोशिशः गहलोत
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कहना है कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ पूरे देश में जो माहौल बना हुआ है, उससे ध्यान हटाने के लिए इस मुद्दे को उठाया जा रहा है. मैं पहले ही कह चुका हूं कि इस साल शिशुओं की मौत के आंकड़ों में पिछले कुछ सालों की तुलना में काफी कमी आई है.
जबकि विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री गहलोत से इस्तीफा मांगा है. इससे पहले बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सांसदों की एक समिति गठित की थी. बीजेपी सांसदों की समिति ने इसके लिए प्रदेश के अशोक गहलोत सरकार को जमकर लताड़ लगाई.
कोटा के जेके लोन अस्पताल में दिसंबर में 100 बच्चों की मौत हुई जबकि नए साल के शुरुआती 2 दिनों में 4 और बच्चों की मौत हो गई.
गोरखपुरः 5 दिनों में 64 मौतें
कोटा से इतर गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज की बात करें तो 2017 के अगस्त महीने में महज 5 दिनों में 64 नैनिहालों की मौत हो गई थी. 5 दिनों में एक के बाद 60 से ज्यादा बच्चों की मौत के बाद 12 अगस्त को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस प्रकरण पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि ऑक्सीजन की कमी से मौत का मामला जघन्य है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.
मुख्यमंत्री योगी की ओर से तब दिए गए आंकड़ों के अनुसार 7 अगस्त से लेकर 11 अगस्त 2017 तक कुल 64 बच्चों की मौत हुई. 7 अगस्त को 9, 8 अगस्त को 12, 9 अगस्त को 9, 10 अगस्त को 23 और 11 अगस्त को 11 बच्चों की मौत हुई थी. हालांकि इसके बाद 12 अगस्त को 7 और 13 अगस्त को 6 बच्चों की मौत हुई थी. गोरखपुर से इस सबसे बड़े अस्पताल में चंद दिनों में 75 से ज्यादा बच्चे मारे गए.
ढाई साल पहले मौत की घटना के दौरान बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भयावह स्थिति रही
ऑक्सीजन की सप्लाई ठप होने से हुई मौत!
इस प्रकरण पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई बच्चों की मौत अस्पताल के अंदर चल रही राजनीति की वजह से हुई, न कि ऑक्सीजन की कमी से. 23 अगस्त 2017 को मुख्य सचिव की जांच रिपोर्ट में भी ऑक्सीजन संकट का जिक्र नहीं था.
हालांकि शुरुआत में मौत की वजह सामने आई कि 69 लाख रुपये का भुगतान नहीं होने की वजह से ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली फर्म ने ऑक्सीजन की सप्लाई ठप कर दी जिसकी कमी से बच्चों की मौत होने लगी.
गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संसदीय क्षेत्र है और वह मुख्यमंत्री बनने से पहले 1998 से लेकर लगातार 2017 तक गोरखपुर से ही सांसद रहे थे.
गोरखपुर का बीआरडी मेडिकल कॉलेज
हर साल अगस्त में मरते हैं बच्चेः स्वास्थ्य मंत्री
मुख्यमंत्री के संसदीय क्षेत्र गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 5 दिनों में 63 बच्चों की मौत के बाद घटना का जायजा लेने आए प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा था कि हर साल अगस्त में बच्चों की मौत होती है. अस्पताल में नाजुक बच्चे आते हैं. साल 2014 में 567 बच्चों की मौत हुई. सीएम के दौरे पर गैस सप्लाई को लेकर बात नहीं हुई. अलग-अलग कारणों से बच्चों की मौत हुई. गैस की कमी से बच्चों की मौत नहीं हुई.
यहां तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बच्चों की मौत के लिए गंदगी को जिम्मेदार ठहरा दिया था. आदित्यनाथ ने कहा था कि गोरखपुर में हो रही मौत के पीछे भी गंदगी एक बड़ी वजह है. सेप्टी टैंक लोग घरों में बनाते हैं, जगह की कमी की वजह से गंदगी फैलती है और फिर यह भयावह रूप ले लेता है.
गोरखपुर और कोटा के एक अस्पताल में दर्जनों की संख्या में नौनिहालों के काल के समा जाने के बावजूद कोई भी अपनी जिम्मेदारी नहीं लेने को तैयार है, यहां तक गोरखपुर की तरह कोटा में विपक्षी दलों ने सत्ता पक्ष पर लापरवाही के लिए जिम्मेदार माना जबकि सत्ता पक्ष जिम्मेदारी लेने से बचता रहा. दोनों अस्पतालों में हुई मौत के आंकड़ों को जोड़ लिया जाए तो यह संख्या 200 के करीब बैठता है और इन दो घटनाओं ने कई माताओं की गोंद सूनी कर दी. सरकारें जब तक सबक लेने को तैयार नहीं होंगी और प्रशासन लापरवाही नहीं छोड़ेगा तब तक ऐसी घटनाएं कहीं से भी सुनाई दे सकती है.