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पंजाब में अकाली-बसपा में हुए सीटों के बंटवारे में किसे फायदा-किसे हुआ नुकसान 

पंजाब की 117 सीटों में से 97 सीटें अकाली और 20 सीटें बसपा मिली हैं. सीट शेयरिंग फॉर्मूला के तहत बसपा को 20 सीटों में से अधिकतर वह सीटें मिली हैं, जहां पर कांग्रेस के विधायक हैं और अकाली कभी खुद चुनाव नहीं लड़ी है. बीजेपी इन सीटों पर किस्मत आजमाती रही है. बसपा के जनाधार वाली सीटें, उसे नहीं मिली जबकि अकाली को अपनी परंपरागती सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

बसपा के सतीष चंद्र मिश्रा और अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल बसपा के सतीष चंद्र मिश्रा और अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पंजाब में बसपा और अकाली दल का गठबंधन
  • बसपा को 20 सीटें, जहां अकाली नहीं लड़ी चुनाव
  • बीजेपी वाली सीटें अकाली ने बसपा को दी

पंजाब में अगले साल शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए शिरोमणि अकाली दल ने मायावती की पार्टी बसपा के साथ हाथ मिला लिया है. राज्य के कुल 117 सीटों में से 97 सीटें अकाली और 20 सीटें बसपा मिली हैं. सीट शेयरिंग फॉर्मूला के तहत बसपा को 20 सीटों में से अधिकतर वह सीटें मिली हैं, जहां पर कांग्रेस के विधायक हैं और अकाली कभी खुद चुनाव नहीं लड़ी है. बीजेपी इन सीटों पर किस्मत आजमाती रही है. बसपा के जनाधार वाली सीटें, उसे नहीं मिली जबकि अकाली को अपनी परंपरागती सीटों पर चुनाव लड़ेगी. ऐसे में देखना है कि 2022 के चुनाव में बसपा-अकाली की जोड़ी क्या करिश्मा दिखाती है.

बसपा का कांग्रेस से होगा मुकाबला

शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने बसपा के साथ समझौता करके बड़ी सियासी चाल चली है. माना जा रहा है कि अकाली ने गठबंधन कर पंजाब के 32 फीसदी दलित मतदाता के बीच अपनी पैठ बनाने की कवायद की है.इस कदम से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के लिए चिंता बढ़ा दी है. शिरोमणि अकाली दल ने जिन 20 सीटों को बसपा के लिए छोड़ा है उसमें से 18 सीटों पर कांग्रेस के विधायक है. इस तरह से बसपा को पंजाब के रणभूमि में कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी के साथ दो-दो हाथ करने होंगे. 

बंटवारे में बसपा को मिली ये 20 सीटें

बसपा को जो 20 सीटें मिली हैं, जिनमें  करतारपुर, जालंधर वेस्ट, जालंधर नॉर्थ, फगवाड़ा, कपूरथला, होशियारपुर, टांडा, दसूहा, श्री चमकौर साहिब, बस्सी पठाना, महल कलां, नवांशहर, लुधियाना नॉर्थ, पठानकोट, सुजानपुर, भोआ, मोहाली, अमृतसर नार्थ, अमृतसर सेंट्रल और पायल शामिल हैं. करतारपुर, फगवाड़ा और नवांशहर में ही पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन ठीकठाक रहा है. वहीं, बाकी सीटों पर तो बसपा अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराने में सफल नहीं रही. 

पंजाब में बसपा फिल्लौर, आदमपुर, बंगा, गढ़शंकर, बलाचौर, चब्बेवाल, शाम चौरासी, जालंधर कैंट, नकोदर, फगवाड़ा की सीटों पर अपनी मजबूत पकड़ बताती रही है, लेकिन यह सीटें अकाली के खाते में गई हैं. यहां दलित मतदाता अच्छी खासी संख्या में है. अमृतसर शहरी, लुधियाना शहरी, मोहाली, पठानकोट, जालंधर शहरी, दसुआ, भोआ आदि सीटों पर बसपा का प्रदर्शन कभी अच्छी नहीं रही है और अकाली दल भी कभी इन सीटों पर उम्दा प्रदर्शन नहीं कर पाई है. यह शहरी क्षेत्र की सीटें हैं, जहां ढाई दशक से कांग्रेस बनाम बीजेपी का मुकाबला होता रहा है.  

बसपा वाली सीटों पर अकाली नहीं लड़ी चुनाव

सीट समझौते के तहत बसपा के खाते में अधिकतर ऐसी सीटें आई हैं, जिन पर अकाली दल खुद नहीं लड़ता था. ऐसे में यहां पर अकाली का जनाधार भी कोई खास नहीं है. यह शहरी क्षेत्र की सीटें है, बीजेपी के खाते में शामिल थीं. बसपा को जो सीटें दी गई है उसमें से आठ एसी सीटें है जहां पर बीजेपी का जनाधार अच्छा खासा माना जाता है. पठानकोट, सुजानपुर, जालंधर उत्तरी,जालंधर पश्चिमी, दसुहा, होशियारपुर, फगवाड़ा और भोआ शामिल है. हालांकि इसमें से वर्तमान में महज सुजानपुर ही ऐसी सीट है जहां पर बीजेपी का विधायक है. इसमें से अगर भोआ की सीट को छोड़ दिया जाए तो सारी सीटें ही शहरी क्षेत्र में आती है. 

बसपा को खाते में गठबंधन के तहत जो 20 सीटें मिली हैं, उसमें 8 सीटें रिजर्व और 12 सामान्य सीटें हैं. इससे साफ संकेत मिलते है कि बसपा पंजाब में केवल दलित सीटों पर ही सिमट कर नहीं रहना चाहती है. हालांकि, 1997 के चुनाव के बाद से बसपा पंजाब में अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी. इसके पीछे वजह यह है कि दलित वोटर पंजाब में अकाली और कांग्रेस के बीच बंटता रहा है. 

पंजाब में दलित सीटों का समीकरण

बता दें की देश का सबसे ज्यादा दलित मतदाता पंजाब में है. प्रदेश में दलित समुदाय  के लिए 117 सीटों वाली विधानसभा में 34 सीटें रिजर्व है. 2017 के चुनाव नतीजों पर नजर डाले ते दलित सीटों पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का बोलबाला रहा. कांग्रेस ने 34 में से 21 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि 9 सीटों पर आम आदमी पार्टी जीती थी. बीजेपी के खाते में एक और अकाली दल के खाते में 3 सीटें आई थी. वो भी सारी दोआबा की थी जबकि मालवा और माझा में अकाली दल का खाता भी नहीं खुल पाया था.

2019 में फगवाड़ा से विधायक रहे सोम प्रकाश के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सीट खाली होने पर कांग्रेस ने इस सीट को जीत लिया था. जिसके बाद कांग्रेस के पास 22 दलित विधायक हो गए थे. अकाली दल की नजर कांग्रेस और आप के उसी वोट बैंक पर है. वहीं, अकाली दल ने दोआबा की 8 सीटें बसपा को दी है, क्योंकि दोआबा में दलितों का दबदबा है. ऐसे में दोआबा में दलित राजनीतिक के समीकरण का असर पूरे प्रदेश पर पड़ता है. 

वहीं, पंजाब के आगमी विधानसभा के लिए बसपा से हाथ मिलाकर शिरोमणि अकाली दल ने एक ही तीर से कई निशाने भी साधने की कोशिश की है. एक तरफ उन्होंने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के दलित वोटबैंक में सेंधमारी करने की कोशिश की है तो वहीं, उसने उस आरोपों को भी खारिज करने की कोशिश की कि गठबंधन टूटने के बावजूद अकाली दल और बीजेपी अंदरखाने एक है. उसने बीजेपी से सीधे मुकबला करने के बजाय बसपा को सामने पेश कर दिया है. इतना ही नहीं शहरी सीटें देकर बसपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई को बना दिया है. 

 

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